जल्दबाजी का लॉकडाउन

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को 8 बजे राष्ट्र को संबोधित करते हुए अचानक 12 बजे रात से 21 दिनों को लॉकडाउन की घोषणा कर दी। लेकिन बहुत सी महत्वपूर्ण बिंदुओं को अनदेखा कर दिया। अचानक बस, ट्रेन, हवाई जहाज सारा कुछ बंद कर दिया गया। देश के विभिन्न औद्योगिक शहरों और महानगरों में लाखों लोग यातायात के अभाव में फंसे हुए हैं। हाइवे पर जत्थे के जत्थे सामान उठाए पैदल जाते दिखाई दे रहे हैं। कोरोना के भय से उन्हें ट्रकवाले भी नहीं बिठाएंगे। रास्ते में होटल ढाबे भी खुले नहीं मिलेंगे जहां उन्हें भोजन नसीब हो। पुलिस अलग से डंडे बरसाएगी। मोदी भक्त शिकायत करेंगे कि लोग लॉकडाउन का पालन नहीं कर रहे। उनकी कठिनाई को कोई नहीं समझेगा। क्या उन्हें उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाना सरकार की जिम्मेवारी नहीं है।

22 मार्च के जनता कर्फ्यू के बाद देश के 30 राज्यों और केंद्रशासित राज्यों के 100 जिलों में पहले से ही लॉकआउट चल रहा था। चार राज्यों में कर्फ्यू की घोषणा हो चुकी थी। निःसंदेह कोराना वायरस को परास्त करने के लिए यह जरूरी कदम था, जिसका शत-प्रतिशत पालन करना चाहिए। लेकिन इसे व्यवस्थित रूप से लागू किया जा सकता था। इस अफरा-तफरी का माहौल बनाने की कोई जरूरत नहीं थी।

भारत के पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि नवंबर 2019 में ही चीन के बुहान में कोरोना का संक्रमण शुरू हो गया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे महामारी घोषित कर चुका था। पूरी दुनिया में हेल्थ इमर्जेंसी की घोषणा हो चुकी थी इसके बावजूद मार्च के तीसरे सप्ताह तक भारत में अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें जारी रहीं। मास्क, सेनिटाइजर आदि का निर्यात होता रहा। भारत में वायरस संक्रमण का सही आकलन नहीं किया जा सका।

सरकार चार महीने तक इस ओर से लापरवाह बनी रही। जब कोरोना संक्रमण तीसरे चरण में पहुंचने लगा तो नोटबंदी की घोषणा की तरह इसकी घोषणा भी बिना पर्याप्त तैयारी के कर दी गई। नोटबंदी के समय तो गोपनीयता बरतने की जरूरत थी लेकिन कोरोना के मामले में तो ऐसी कोई विवशता नहीं थी। तीन सप्ताह के लॉकडाउन के पहले जिन बिंदुओं पर ध्यान दिए जाने की, जिन तैयारियों की जरूरत थी उनकी पूरी तरह अनदेखी की गई। प्रधानमंत्री ने अगर यह घोषणा दिन के समय भी की होती तो लोगों को दवा और राशन से लेकर आवश्यक चीजों की खरीदारी के लिए समय मिल जाता। जो लोग घरों के बाहर आसपास के शहरों में गए हुए थे उन्हें अपने घर वापस लौटने का समय मिल सकता था। प्रवासी मजदूरों को लेकर ट्रेनें और बसें रवाना हो सकती थीं। लॉकडाउन की अवधि बढ़ाने से पहले जरूरी इंतजाम तो कर लेने चाहिए थे। नियमतः सरकार को आमलोगों तक कम से कम तीन सप्ताह का राशन, दवाएं और अन्य जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति पहले कर देनी चाहिए थी ताकि लोग तीन सप्ताह तक निश्चिंत होकर घरों में रह पाते। इसके बाद लॉकडाउन करना चाहिए था। विलंब तो पहले ही हो चुका था। चार महीने तक सरकार नींद में सोती रही। अभी बाजार में तमाम जरूरी चीजों की कीमतें बढ़ा दी गई हैं। दवा व्यापारियों के बाद उपभोक्ता वस्तुओं के व्यापारियों को कालाबाजारी का एक अवसर मिल गया है। सरकार का इसपर कोई नियंत्रण नहीं है। पता नहीं मोदी जी हर घोषणा रात के 8 बजे ही क्यों करते हैं और उसे रात के 12 बजे से ही क्यों लागू करते हैं। वे लोगों को संभलने का मौका क्यों नहीं देते। अनावश्यक अफरा-तफरी और परेशानी का माहौल जाने-अनजाने बना देना उनकी फितरत बन चुकी है।

कोरोना के संक्रमण की शुरुआत नवंबर 2019 में ही हो चुकी थी। अगर उसी समय अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें रोक दी जातीं तो भारत में कोरोना का प्रवेश ही नहीं हो पाता। चीन के करीब स्थित ताइवान, सिंगापुर, हांगकांग आदि ने उसी समय सतर्कता बरती और संक्रमण को नियंत्रित करने में काफी हद तक सफल रहे। भारत के वैज्ञानिकों ने सरकार को दिसंबर 2019 से ही इस खतरे के प्रति आगाह करना शुरू कर दिया था। राहुल गांधी ने 31 मार्च से 3 मार्च तक कम से कम 10 ट्वीट कर सरकार को इस खतरे के प्रति आगाह किया लेकिन सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। उनकी ट्रोल आर्मी ने उनकी बातों को गंभीरता से लेने की जगह उनका मजाक उड़ाना शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर विदेश से आने वाले यात्रियों की स्क्रिनिंग और आइसोलेशन में डालने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई। नतीजतन वे कोरोना वायरस से संक्रमित होकर देश में आते गए और वायरस का प्रसार करते गए। इस बीच सरकार नमस्ते ट्रंप के आयोजन, शाहीनबाग को धरना खत्म कराने और मध्य प्रदेश की सरकार गिराने में व्यस्त रही। मास्क, सेनेटाइजर जैसे कोरोना से बचाव के साधनों का निर्यात भी जारी रहा। देश के अंदर इनका अभाव या और दवा व्यापारियों को इनकी कालाबाजारी करने का मौका मिल गया। जब भारत में कोरोना का संक्रमण तीसरे चरण में पहुंचने लगा तो सरकार की निद्रा टूटी और जनता कर्फ्यू का आह्वान किया गया। अचानक प्रधानमंत्री के आह्वान का देशवासियों ने पूरा पालन किया। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की शाम को मोदी जी के निर्देश पर थाली, ताली पीटकर शंख बजाकर कोरोना के योद्धाओं के प्रति आभार व्यक्त किया गया। यह एक अनावश्यक सा आयोजन था।

इस दौरान सरकार ने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि यह रबी फसल तैयार होने का मौसम है। नवंबर में जब चीन में कोरोना का प्रकोप शुरू हुआ तब रबी फसलों का बीजारोपण हुआ था और लॉकडाउन होने तक के चार महीनों में फसलें तैयार हो गईं। कुछ खेतों में फसल काटी जा चुकी है। कुछ खेतों में अगले 15 दिनों में काटी जाएंगी। इसके लिए मजदूर कैसे आएंगे, इनका भंडारण कैसे होगा, इनकी बिक्री कैसे होगी सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं है। अगर इसका प्रबंधन नहीं किया गया तो सारी फसल खेतों में पड़ी बर्बाद हो जाएगी। कोरोना को हराने के बाद लोगों को भूख मिटाने के लिए अनाज की जरूरत पड़ेगी तब अनाज होगा नहीं। विश्व को कोई भी अन्य देश खाद्यान्न की आपूर्ति करने की स्थिति में नहीं होगा। तब क्या होगा सरकार को इसकी चिंता होनी चाहिए लेकिन ऐसी कोई चिंता नज़र नहीं आ रही।

 

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