हैदराबाद की बिरयानी से घर की नमक रोटी बेहतर

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

कोरोनाकाल के लॉकडाउन में सबसे अधिक दुर्दशा प्रवासी मजदूरों की हुई। लॉकडाउन की घोषणा होते ही उनके नियोक्ताओं ने उन्हें दूध की मक्खी तरह निकाल फेंका और सरकारी तंत्र के हवाई दावों से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। कई लाख मजदूर पैदल, अपने निजी जुगाड़ से अथवा सरकार की मदद से घर वापस लौट चुके हैं लेकिन बड़ी संख्या में अभी भी परदेश में फंसे हुए हैं। अबतक सौ से ज्यादा मजदूरों की बीच रास्ते में दुर्घटनाओं से मौत हो चुकी है। 54 दिनों की तालाबंदी के बाद सीमित यातायात के बावजूद दुर्घटनाओं को देखते हुए सरकार ने उनके पैदल घर जाने पर पाबंदी लगा दी है। फिर भी वे प्रशासन की नज़रों से बचकर खेतों की पगडंडियों के रास्ते भूखे प्यासे चले जा रहे हैं। अभी करोड़ों प्रवासी मजदूर श्रमिक स्पेशल ट्रेनों या बसों से घर वापसी के इंतजार में हैं। जो मजदूर घर वापस लौट चुके हैं वे इतनी मानसिक प्रताड़ना झेल चुके हैं कि अब किसी कीमत पर राज्य के बाहर जाने को तैयार नहीं है। जर्मन बहुभाषी पोर्टल डी डब्लू डाट कॉम पर पटना के मनीष कुमार की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होंने घर वापस लौटे मजदूरों की मनःस्थिति को टटोलने की कोशिश की है। उसमें मजदूरों की व्यथा खुलकर सामने आई है।

ऐसा नहीं कि प्रवासी मजदूर घर नहीं आते थे। साल में कम से कम होली और छठ के समय वे जरूर आते थे। ट्रेनों में उस दौरान भारी भीड़ भी होती थी लेकिन यात्रा उतनी कष्टदायक नहीं होती थी जितनी इसबार हुई। अब अपनी माटी तक पहुंचने के बाद अधिकांश मजदूरों का कहना है कि दस पैसा कम कमाएंगे लेकिन परदेस नहीं जाएंगे। अपने परिजनों के पास पहुंचने में उन्हें जितनी परेशानी, जलालत झेलनी पड़ी, उसका दर्द वे शायद ही कभी भुला पाएंगे।

दो जून की रोटी की तलाश में अपनों को छोड़ परदेस गए मजदूरों ने बहुत सी विपरीत स्थितियां भी देखीं लेकिन उन्होंने कभी सपने में भी सोचा नहीं था कि जिंदगी कभी इतनी भयावह हो जाएगी। जैसे ही लॉकडाउन हुआ उनके मालिकों का व्यवहार बदल गया। उन्होंने न पैसे दिए और न राशन। जो नौकरीपेशा थे या फिर रोज खाने-कमाने वाले थे दो वक्त की रोटी के लिए तरस गए। जो कुछ बचाकर रखा था वह राशन-पानी में धीरे-धीरे खत्म होने लगा। जब जीवन पर संकट मंडराने लगा तो घर वापसी ही एकमात्र विकल्प रह गया।

मरता क्या न करता की मानसिकता के तहत देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले इन मजदूरों-कामगारों ने पैदल अपने गांव-घर का रास्ता लिया। सैकड़ों किलोमीटर का सफर। उन्हें पता नहीं था कि कब घर पहुंचेंगे। उनके सामने एकमात्र लक्ष्य था अपने गांव पहुंचना। परदेस में भूखों मरने से बेहतर है, घर जाने के रास्ते में मर जाना। किसी ने साइकिल खरीदी तो किसी ने अपने मित्रों के साथ मिलकर मोटरयुक्त रिक्शा खरीदी तो कोई अपने बीवी-बच्चों समेत पैदल ही निकल पड़ा। बाद में जब श्रमिक ट्रेन चलाई जाने लगी तो जो कुछ पढ़े-लिखे थे उन्होंने सरकारी प्रावधानों के तहत दौड़-धूप कर ट्रेनों में जगह पा ली। लेकिन कई लोग ऐसे थे जिन्हें ट्रेन की सवारी के लिए की गई व्यवस्था पर भरोसा नहीं था या काफी प्रयास के बाद भी जिन्हें लगा कि ट्रेनयात्रा के लिए उनकी बारी आने में लंबा समय लगेगा वे पैदल ही चल दिए। दिल्ली से करीब 1200 किलोमीटर की दूरी तय कर बेगूसराय जिले के छौड़ाही पहुंचे अमरजीत पासवान ने रिपोर्टर से कहा, “सुकून है कि घर पहुंच गया। दिल्ली में मजदूरी कर रहा था। जीवन की गाड़ी चल रही थी लेकिन लॉकडाउन के कारण कामकाज बंद हो गया। खाने के लाले पड़ गए। तब पत्नी को फोन किया। जमीन गिरवी रखकर उसने पैसे भेजे। उससे साइकिल खरीदी और किसी तरह घर पहुंचा। अब कमा कर जमीन छुड़ाऊंगा। भले ही दस पैसा कम कमाऊंगा लेकिन अब गांव छोडक़र कहीं नहीं जाऊंगा।”

दिल्ली के चांदनी चौक में दिहाड़ी मजदूर का काम करने वाले सहरसा जिले के नवहट्टा के रामप्रवेश कहते हैं, “वहां रहना मुश्किल हो गया था। गांव के ही अपने साथियों के साथ चंदा कर बीस हजार रुपये जुटाए और एक जुगाड़ गाड़ी खरीदी। शुक्र है यहां तक पहुंच गया। अब जो भी करेंगे हम सब यहीं करेंगे।” 17 दिनों में पुणे से साइकिल से चलकर नवादा जिले के नरहट पहुंचे रणजीत का दर्द भी कुछ वही है। कहते हैं, “कामकाज ठप, पैसे खत्म। लग रहा था यहां रहा तो मौत तय है। सोचा, भूखे मरने से बेहतर है रास्ते में मर जाऊं। यही सोचकर पुणे से चल दिया।” हैदराबाद में रसोइये का काम कर रहे श्रमिक ट्रेन से भागलपुर पहुंचे फिरोज, अनवर व एजाज कहते हैं, “अब घर में सूखी रोटी खाएंगे लेकिन कहीं बाहर नहीं जाएंगे. हैदराबाद की बिरयानी से घर की नमक-रोटी ही बेहतर है।” रोहतास जिले के डेहरी प्रखंड निवासी विभाष अपने गांव के कई लोगों के साथ मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में मोजरबियर पावर प्लांट में काम करते थे। लॉकडाउन होते ही कंपनी ने काम से निकाल दिया। खाने के लाले पड़ गए। मकान मालिक ने किराया न मिलने के डर से घर खाली करने को कह दिया। कहते हैं, “लाचार होकर घर लौटने का हमलोगों ने निर्णय किया और साइकिल से यहां आ गए। अब कम कमाएंगे लेकिन घर छोड़ बाहर नहीं जाएंगे।”

दिल्ली से पैदल पटना के मोकामा आए उमेश सिंह कहते हैं, “हम रोज कमाने-खाने वाले लोग हैं। वहां कोई काम नहीं रहा तो सोचा, भूखों मरना ही है तो घर क्यों न चले जाएं। भरोसा था कि घर में नमक-रोटी खाने को मिल ही जाएगा, बस किसी तरह अपनों के बीच पहुंच जाएं। यही सोच पैदल ही चला आया।” मुंबई से एक महीने में पैदल चलकर दरभंगा पहुंचे रामनिवास चौधरी कहते हैं, “मर जाना पसंद करूंगा लेकिन बिहार के बाहर नहीं जाऊंगा, बाहर का स्वाद हमने अच्छी तरह समझ लिया है। गरीब के लिए किसी को दर्द नहीं है।” बेगूसराय की सुषमा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। दिल्ली में कई घरों में चौका-बर्तन करने वाली सुषमा को जब मकान मालिक ने निकाल दिया तो वह अपने तेरह वर्षीय बेटे के साथ साइकिल से नौ दिन में 1200 किलोमीटर का सफर तय कर अपने पति के पास बेगूसराय के छौड़ाही गांव पहुंची। ऐसे हजारों लोग हैं, जो मानवता के मानकों के उलट अमानवीय ढंग से उस यात्रा पर निकल गए जिसकी कल्पना मात्र से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इनका लौटना अनवरत जारी है।

समस्या केवल रोज कमाने-खाने वालों को ही नहीं हुई। वे लोग भी मुश्किल में पड़े जो किसी न किसी कंपनी या फैक्ट्री में सुपरवाइजर या स्किल्ड होने के कारण अन्य पदों पर काफी दिनों से तैनात थे। ये लोग थोड़े सक्षम थे लेकिन मालिकों के दुर्व्यवहार से अपमानित होकर इनलोगों ने घर का रूख करना ही वाजिब समझा। अहमदाबाद से मोटरसाइकिल से अपने छह साथियों के साथ मुजफ्फरपुर पहुंचे राजीव चौधरी कहते हैं, “वहां एक टेक्सटाइल मिल में हम सब काफी दिनों से काम कर रहे थे। लॉकडाउन होते ही फैक्ट्री मालिक ने हमें तत्काल परिसर खाली करने की हिदायत देते हुए फैक्ट्री के छह माह तक बंद रहने और इस अवधि में काम किए बिना तनख्वाह नहीं देने की बात कही। अपमानित महसूस करते हुए हम सभी ने घर लौटने का निर्णय किया और 2200 किलोमीटर की दूरी तय कर यहां चले आए।” केरल से लौटे वैशाली के श्याम सहनी कहते हैं, “हमने रेस्तरां में बतौर चीफ कुक काफी जतन से पांच साल काम किया लेकिन लॉकडाउन होते ही मालिक का व्यवहार बदल गया। कल तक हम उसके लिए प्रापर्टी थे। उसने यह भी नहीं सोचा कि उसे यहां तक लाने में मेरा कितना योगदान है। मैं यहीं चाय-पकौड़े बेच जीवन-यापन कर लूंगा लेकिन वहां नहीं जाऊंगा।”

सरकार की व्यवस्था ने भी मजदूरों-कामगारों को पग-पग पर परेशान किया। जो पढ़े-लिखे थे वे घर लौटने के लिए रजिस्ट्रेशन के लिए परेशान रहे। जिन अफसरों के नंबर कोर्डिनेशन के लिए सार्वजनिक किए गए, वे बंद ही रहे और जो किसी तरह श्रमिक ट्रेन में सवार होने में कामयाब रहे उनके अनुभव भी बेहतर नहीं रहे। राजस्थान के जयपुर व कोटा से पटना के दानापुर स्टेशन पहुंचे श्रमिकों के अनुसार उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया गया। कोटा से लाए गए छात्रों को बढिया भोजन दिया गया जबकि उन्हें खराब। कई लोगों ने इसकी शिकायत की और खाना फेंक दिया। कई श्रमिक ट्रेनों में तो रास्ते में खाने को कुछ भी नहीं दिया गया। बिहार सरकार द्वारा तय व्यवस्था के अनुसार विद्यार्थियों से रेल भाड़ा नहीं लिया गया जबकि कामगारों को टिकट खरीदना पड़ा। यह बात दीगर है कि उन्हें क्वारंटीन अवधि पूरा होने के बाद किराये की राशि वापस की जाएगी और पांच सौ रुपये अतिरिक्त भी दिए जाएंगे। बेंगलुरु से श्रमिक स्पेशल से पटना आने वाले गया जिले के कोच निवासी दिनेश महतो कहते हैं, “उनलोगों से 1050 रुपये प्रति व्यक्ति किराया लिया गया। इसमें 930 रुपये का टिकट था और शेष राशि भोजन की थी। बेंगलुरु से ट्रेन खुलने के बाद रेलवे की ओर से रास्ते में बस एक बार भोजन दिया गया। इसके बाद दानापुर में ही भोजन मिला। थोड़ी परेशानी तो हुई लेकिन घर पहुंचने की खुशी के आगे यह कुछ भी नहीं है। अब यहां अगर कुछ न कर सका तभी फिर लौटने की सोचूंगा।”

घोर अनिश्चितता के बीच जिस अमानवीय कष्ट को उठाकर प्रवासी मजदूर-कामगार अपने गांव की दहलीज तक पहुंचे हैं, उससे तो लगता है कि वे अब शायद ही बाहर का रुख करना चाहेंगे। लेकिन राजधानी पटना के एएन सिन्हा इंस्टीच्यूट के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉ. डीएन प्रसाद इससे इत्तफाक नहीं रखते। वे कहते हैं, “यह संक्रमणकाल है। प्रवासियों के ये उद्गार भावनात्मक हैं। लॉकडाउन के कारण अप्रत्याशित स्थिति बन भी आई है। इस परिस्थिति में उन्हें न तो नैतिक और न ही आर्थिक सपोर्ट मिल रहा है। संकट के समय में भावनात्मक शक्ति प्रबल होती है जो सामूहिकता का बोध दिलाती है। इसलिए इंसान अपने लोगों के बीच जाना चाहता है ताकि उसकी मानसिक व भावनात्मक जरूरतें पूरी हो सके।” डॉ. प्रसाद कहते हैं, “अभी जो कुछ दिख रहा वह परिस्थितिजन्य है. जैसे ही इमोशनल ब्रेकडाउन होगा वैसे ही यथार्थ का बोध होगा। संक्रमणकाल खत्म होते ही बदलाव आना तय है।”

इतनी कष्टदायक यात्रा के बाद घर पहुंचे लोग लॉकडाउन के दौरान पूरी कोशिश करेंगे कि उनकी रोजी-रोटी की व्यवस्था घर के पास ही हो जाए और उन्हें वापस नहीं लौटना पड़े। खासतौर पर जिन नियोक्ताओं ने संकट के समय अमानवीय व्यवहार किया उनके बुलावे पर तो नहीं ही लौटेंगे। अगर राज्य सरकार रोजगार सृजन पर ध्यान देगी तो उनकी रोजी-रोटी का प्रबंध संभव हो सकेगा। जहां तक बिहार का सवाल है प्रवासी मजदूरों के मामले में वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भूमिका जितनी नकारात्मक और निकृष्ट रही उनसे रोजगार सृजन की उम्मीद नहीं की जा सकती है। उन्होंने बिहार में अपने साथ एनडीए को ले डूबने की पूरी व्यवस्था कर ली है। नवंबर दिसंबर में चुनाव होने हैं। उन्हें प्रवासी मजदूरों के साथ उनका व्यवहार ही सत्ता में वापसी में सबसे बड़ी बाधक साबित होगी। 2021 में जो नई सरकार आएगी शायद वह श्रमिक पलायन को रोकने की दिशा में कुछ सकारात्मक पहल करे। झारखंड के युवा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस दिशा में बेहतर कार्य कर रहे हैं।

नियोक्ता राज्यों की सरकारों ने और कंपनियों ने कोरोना काल में यह नहीं सोचा कि संकट खत्म होने के बाद आर्थिक गतिविधियों को शुरू करने के लिए श्रमिकों की जरूरत पड़ेगी। यदि उन्होंने मजदूरों की मदद की होती तो उन्हें दिक्कत नहीं होती। लॉकडाउन-3 के बाद से ही कई राज्यों को रीयल स्टेट सेक्टर का काम शुरू करने में कठिनाई हो रही है। अब मजदूर आएंगे भी उन्हें बेहतर सुविधाएं और सम्मानित वेतन देना होगा। फिर भी अधिकांश प्रवासी मजदूर वापस लौटना नहीं चाहेंगे।

(dw.com पर मनीष कुमार की रिपोर्ट के इनपुट के साथ)

 

 

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