यह हिंदुत्व है, राष्ट्रवाद है या बेईमानी

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-देवेंद्र गौतम

मतगणना के दो दिन पूर्व वाराणसी में तीन ट्रकों में संदिग्ध रूप से ईवीएम ले जाने के प्रयास को लेकर हंगामा मचा हुआ है। सपा कार्यकर्ताओं ने उनमें से एक ट्रक को पकड़ लिया। उसके टायर पंक्चर कर दिए ताकि उसे अन्य दो ट्रकों की तरह भगाया न जा सके। बाराणसी के जिलाधीश का कहना है कि इन्हें प्रशिक्षण के लिए ले जाया जा रहा था। सवाल है कि यदि यह सामान्य घटना थी तो चुनाव आयोग के नियमों का पालन क्यों नहीं किया गया। सभी प्रत्याशियों को क्यों नहीं जानकारी दी गई। सुरक्षाकर्मियों को क्यों नहीं तैनात किया गया। यह सिर्फ वाराणसी की घटना नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में प्रशासन के सहयोग से ईवीएम की हेराफेरी के प्रयास के मामले सामने आए। कहीं प्रयास विफल हुआ कहीं सफल। सोशल मीडिया एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक भाजपा नेता सीना ठोककर कह रहे थे कि 200 ईवीएम बदल दिए गए हैं। चुनाव आयोग ने इसे संज्ञान में लिया और मामला दर्ज किया। चुनाव आयोग पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान धृतराष्ट्र की भूमिका में नज़र आया। उसका पलड़ा हमेशा एक तरफ झुका हुआ दिखा। वर्तमान सरकार ने सारे सरकारी तंत्र को हाइजैक कर लिया है। ईडी, एनसीबी, आईटी आदि तमाम उसके कैडर की भूमिका में दिखते रहे जिनका सत्ता के इशारे पर संचालन किया जाता रहा। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश के पदभार ग्रहम करने के बाद कम से कम न्यायिक व्यवस्था स्वतंत्र फैसले लेने लगी अन्यथा गोगोई के काल में तो इसपर भी सवाल उठ रहे थे। गोगोई साहब ने तो सेवानिवृत्त होने के बाद अपनी सत्ताभक्ति का ईनाम लेने में लोकलाज की भी कोई परवाह नहीं की।

सवाल है कि 2014 में राष्ट्रवाद, ईमानदारी और भारतीय धर्म तथा संस्कृति का अलमदार बनकर सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने जिस तरह की शासन व्यवस्था दी क्या उसे राष्ट्रवाद के दायरे में रखा जा सकता है…। क्या राष्ट्रवाद के कोई मूल्य नहीं होते…कोई आदर्श संहिता नहीं होती…चोरी-बेईमानी से सत्ता पर कब्जा किए रहना ही राष्ट्रवाद है…क्या लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचल देना ही राष्ट्रवाद है और उनकी रक्षा करना देशद्रोह…। पिछले आठ वर्षों के दौरान कई उदाहरण सामने आए जब देखा गया कि भाजपा चुनाव के दौरान, मतदान के समय बेईमानी में कोई परहेज़ नहीं करती। चुनाव के नतीजे आने के बाद खुलकर जन-प्रतिनियों की खरीद-फरोख्त करती है। यह सबकुछ राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के दायरे में आता है क्या…? क्या भारतीय संस्कृति बेईमानी और मनमानी की इजाजत देती है?

नरेंद्र मोदी को कांग्रेस के विकल्प के रूप में देशवासियों ने प्रचंड समर्थन दिया था तो वह करने के लिए तो नहीं दिया था जो वे कर रहे हैं। संभवतः यह दुनिया की पहली सरकार है 80 करोड़ की आबादी को मुफ्त राशन देकर आत्मनिर्भर बनाने का दावा करती है। युवा वर्ग को नफरती और दंगाई मानसिकता में ढालकर नए भारत का निर्माण कर रही है। बलात्कारियों को संरक्षण प्रदान करके, पीड़िता का शव उसके परिजनों की इजाजत के बगैर जला डालने को, एक पीड़िता के पूरे परिवार का सफाया होने देने के बाद महिलाओं की सुरक्षा का दावा करती है। जहां दिन में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं वहां हमारे गृहमंत्री साहब रात के 12 बजे बजे गहनों से लदी युवती को स्कूटी पर आराम से निकलने के माहौल का दावा करते हैं।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो चल रहा है जिसमें बताया गया है कि एग्जिट पोल में भाजपा की प्रचंड जीत दिखलाने के लिए 20 करोड़ रुपयों की रेवड़ी बांटी गई। ताकि नौकरशाहों को चेतावनी दी जा सके और ईवीएम की हेराफेरी पर पर्दा डाला जा सके। ऐसा राष्ट्रवाद तो हिटलर और मुसोलिनी भी जर्मनी और टली को नहीं दे सके थे। वे तानाशाह अवश्य थे लेकिन आत्मकेंद्रित नहीं थे। भारत का मौजूदा राष्ट्रवाद तो पूरी तरह व्यक्ति केंद्रित और जन विरोधी दिख रहा है। देश को ऐसे राष्ट्रवादियों से जितनी जल्द छुटकारा मिल जाए उतना अच्छा।

समस्या यह है कि अभी तक इस बेईमानी पर टिकी व्यवस्था का कोई सटीक विकल्प सामने नहीं आया है। क्या यह संभव है कि यह सरकार अपने एजेंडे से बाहर निकलकर उस दिशा में ईमानदारी से काम करे जिसके लिए उसे चुना गया था?

 

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