किसान आंदोलनः कैसे निकले समाधान की सूरत

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

अपना एक शेर याद आ रहा है-

मुश्किल है कोई बीच का रस्ता निकल सके

दोनों तरफ के लोग हैं जिद पर अड़े हुए.

 

किसान नेताओं और केंद्र सरकार के बीच चौथे दौर की वार्ता भी बेनतीज़ा रही। किसान तीन कृषि सुधार कानूनों को रद्द कराने पर अड़े हुए हैं और सरकार थोड़े संशोधन के साथ उन्हें लागू करने पर आमादा है। चार चक्र वार्ता हो चुकी। इन वार्ताओं के जरिए सिर्फ वार्ता के बिंदु तय हो सके हैं। अब 7 दिसंबर को पांचवें चक्र की वार्ता होनी है। इस बीच दिल्ली के कई बार्डरों और निरंकारी मैदान में जुटे लाखों किसान इस ठंढ के मौसम में धरना पर बैठे रहेंगे। वे तीन कानून रद्द कराने पर अड़े हुए हैं। उनके नेता संशोधन पर राजी हो भी जाएं तो किसान शायद ही इसपर सहमत हों। किसान पीछे नहीं हटेंगे। पीछे सरकार को ही हटना होगा। बहरहाल वार्ता जारी रहेगी। इस बीच दिल्ली के ढाई करोड़ लोगों की आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप्प रहेगी। सब्जियों, दूध, फलों और अनाज की कीमतें बढ़ती चली जाएंगी। दिल्ली का जनजीवन ठप्प पड़ा रहेगा।

समस्या यह है कि सरकार की तरफ से कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर या वाणिज्य मंत्री पियूष गोयल वार्ता तो कर रहे हैं लेकिन अपनी तरफ से कोई आश्वासन नहीं दे सकते। कोई निर्णय नहीं ले सकते। वे सरकार के संदेश वाहक भर हैं। निर्णय लेने का अधिकार केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को या फिर गृहमंत्री अमित शाह को है। इस सरकार में बाकी किसी मंत्री को अपने विभाग से संबंधित कोई निर्णय लेने की इजाजत नहीं है। जो फैसला ले सकते हैं उन्हें किसान आंदोलन से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। आठ दिनों से किसान धरना पर हैं और वे इस बीच प्रधानमंत्री जी बनारस में 11 लाख दिये जलाने और कोरोना के वैक्सिन के निर्माण की स्थिति का अवलोकन करने में व्यस्त रहे हैं। अमित शाह हैदराबाद को भाग्यनगर बनाने की मुहिम पर हैं। दिल्ली आने और किसानों के बीच जाने की उन्हें फुर्सत नहीं है। दिल्ली के लोगों को परेशानी होने से भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वहां आम आदमी पार्टी की सरकार है। उनकी सरकार होती तो चिंता करते। दिल्ली वालों ने केजरीवाल को वोट दिया तो केजरीवाल से राहत मांगें।

मोदी जी का कहना है कि किसान विपक्ष के बहकावे में आ गए हैं। जो कानून बने हैं वह किसानों के हित में हैं। लेकिन यह किसानों के हित में कैसे हैं यह बात न वे स्वयं समझा पा रहे हैं न उनके मंत्री। घिसे-पिटे एकतरफा तर्क दिए जा रहे हैं। इस बीच उनकी ट्रोल आर्मी किसानों के खिलाफ दुष्प्रचार का अभियान छेड़े हुए है। मोदी जी को इस बात का अहसास नहीं है कि आज का किसान उनसे कहीं ज्यादा पढ़ा लिखा और समझदार है। वह अपना भला बुरा समझता है। दूसरी बात यह कि अगर कांग्रेस में लाखों-करोड़ों किसानों को भ्रमित करने की क्षमता होती तो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर वे नहीं, राहुल गांधी बैठे होते। भ्रम तो भाजपा के मंत्री फैला रहे हैं। वे इस आंदोलन का संबंध पाकिस्तान से और खलिस्तान से जोड़ने में लगे हैं। असली और नकली किसान की बात कर रहे हैं। पहले सिर्फ पंजाब का आंदोलन बता रहे थे। अब जब देश के विभिन्न राज्यों के किसान दिल्ली पहुंच रहे हैं तो इस आंदोलन को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के षडयंत्र रच रहे हैं। प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा के कार्यकर्ताओं तक में गंभीरता का अभाव दिख रहा है। भाजपा के अलावा देश के तमाम तबके किसानों के समर्थन में हैं। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल सहित कई लोगों ने सम्मान और पदक लौटाने शुरू कर दिए हैं।  ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने ट्रकों और बसों का परिचालन रोक देने की चेतावनी दी है। पूरा देश जल रहा है और मोदी जी अपना ही राग अलापे जा रहे हैं।

असामान्य मनोविज्ञान के मुताबिक कुछ लोग उत्पीड़न से आनंदित होने की मानसिक ग्रंथी से ग्रसित होते हैं। पिछले चह वर्षों के अंदर देश क जनता बार बार किसी न किसी बहाने सरकारी फैसलों का दंश झेलती रही है। नोटबंदी के समय लोगों को सब काम छोड़कर अपने ही खाते से पैसे निकालने के लिए घंटों कतार में खड़ा होना पड़ता था। कतार में खड़े-खड़े कई दर्जन लोगों की मौत हो गई थी। जीएसटी लागू होने पर व्यापारी वर्ग बाप-बाप कर उठा था। अचानक ल़ॉकडाउन की घोषणा के बाद लाखों प्रवासी मजदूरों को सड़कों पर पैदल घर वापसी को मजबूर होना पड़ा था। रास्ते में सैकड़ों मजदूरों को जान से हाथ धोना पड़ा था। सरकार के पास मरने वालों का कोई आंकड़ा तक मौजूद नहीं है। और अब तीन किसान बिलों को लेकर देश की 70 प्रतिशत आबादी के सामने जीवन-मृत्यु का सवाल खड़ा कर दिया गया है। अभी चार किसान धरना के दौरान शहीद हो चुके हैं। सरकार अभी भी कोई समाधान निकालने के प्रति गंभीर नहीं है। किसान क्या चाहते हैं यह जानने की सरकार को कोई जरूरत नहीं है। अध्यादेश जारी करने से लेकर जबरन कानून बनाने से पूर्व किसी किसान संगठन से बात करने की जरूरत नहीं समझी गई। हमारे मोदी जी सभी विषयों के प्रकांड विद्वान हैं। उनहें किसी विशेषज्ञ से बात करने की जरूरत नहीं है। उन्हें जनता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। सत्ता पर काबिज होने की कला उन्हें आती है।

लेकिन प्रधानमंत्री जी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्होंने देश की आबादी के बड़े हिस्से से पंगा लेकर उसे  नाराज कर दिया है। लोग इस बात को समझ रहे हैं कि वे समस्त देशवासियों को कटोरा थमाकर चंद पूंजीपति घरानों की तिजोरी भरने में लगे हुए हैं। छह वर्षों में कोई संस्थान खड़ा नहीं किया लेकिन पूर्व सरकारों के बनाए हुए संस्थानों को औने-पौने भाव में अपने मित्रों की झोली में डालते जा रहे हैं। अब उनकी निगाह पूरे कृषि क्षेत्र पर है। लेकिन वे समझ नहीं पा रहे हैं कि पूरे देश को नाराज कर वे कितने समय तक सत्ता में बने रह सकते हैं। उनके हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की असलीयत का एक हद तक पर्दाफाश हो चुका है। उनके अंधभक्तों की आंखें भी धीरे-धीरे खुलने लगी हैं। अगर वे अभी भी स्थितियों को नहीं समझ पाए, समय रहते संभल नहीं पाए तो संभव है कि वे एक बहुत बड़े जन-विद्रोह का वाहक बन जाएं।

 

 

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