किसान आंदोलनः पांचवें चक्र की वार्ता से निकलेगा रास्ता!

0 234

-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

शनिवार 5 दिसंबर को केंद्र सरकार और किसान नेताओं के बीच पांचवे चक्र की वार्ता होने जा रही है। वार्ता का कोई निष्कर्ष निकलने की उम्मीद फिलहाल दिख नहीं रही है। क्योंकि सरकार तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के पक्ष में नहीं है। वह ज्यादा से ज्यादा कुछ संशोधन कर सकती है। किसान उसपर मान जाएं तो बेहतर लेकिन कानून पूरी तरह वापस लेने को तैयार नहीं है। इधर किसान नेता इन्हें वापस लेने के सिवा किसी बिंदु पर समझौते के लिए तैयार नहीं हैं। इसे अपने अस्तित्व की लड़ाई मानकर मैदान में उतरे है। सरकार आंदोलन को लंबा खींचकर आंदोलन को मंद करने का प्रयास भी कर रही है। लेकिन किसानों की संख्या घटने क जगह लगातार बढ़ती जा रही है। अगर शनिवार की वार्ता विफल होती है तो किसान दिल्ली के बचे खुचे रास्ते भी बंद कर देंगे। इसके बाद दिल्ली में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बिल्कुल ठप्प हो जाएगी। हालांकि इससे भाजपा की केंद्र सरकार पर कोई खास दबाव नहीं पड़ेगा क्योंकि इससे दिल्ली के लोग परेशान होंगे और दिल्ली में उसकी सरकार नहीं है। आम आदमी पार्टी की सरकार है जो फिलहाल किसान आंदोलन के समर्थन में है। दिल्ली सरकार ने दिल्ली पुलिस के 9 स्टेडियमों को खुली जेल बनाने की मांग को सिरे से ठुकरा दिया था। अब सप्लाई चेन को बनाए रखना दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार की जिम्मेदारी होगी। किसान यदि दिल्ली की सप्लाई चेन को चालू रखते हुए भाजपा नेताओं की आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप्प कर सकते हैं तब जरूर सरकार को परेशानी होगी। लेकिन तकनीकी रूप से यह मुश्किल है। भाजपा के हर सांसद हर मंत्री के आवास का घेराव कर बैठना संभव नहीं है।

किसान आंदोलन पर मोदी सरकार की रणनीति स्पष्ट है। उसने पहले तो इसे फर्जी किसानों का आंदोलन करार दिया और हरियाणा में लाठी-गोली के जोर पर उन्हें दिल्ली आने से रोकने की कोशिश की। जब वे सारी बाधाओं को पार कर दिल्ली बार्डर पर पहुंच गए तो इसे सिर्फ पंजाब के किसानों का आंदोलन कहकर इसे हल्के में लेने की कोशिश की। उनके जिंस और ब्रांडेड कपड़ों पर और महंगी गाड़ियों पर छींटाकशी की। जब अन्य राज्यों के किसान इसमें शामिल होने लगे तो इसे कांग्रेस के दुष्प्रचार से भ्रमित लोगों की जमात घोषित करना शुरू किया। अब भाजपा के मंत्री इसमें चीन और पाकिस्तान का हाथ होने की बात कह रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे मौकों पर चुप्पी साध लेते हैं। इसबार भी वे चुप हैं। अब जबकि लाखों की संख्या में किसान आंदोलन में शामिल हो चुके हैं तो खुफिया सूत्रों के हवाले से सरकारी तंत्र ने यह बात कहनी शुरू कर दी है कि किसान तो असली हैं लेकिन उनके आंदोलन में नक्सली, आतंकवादी, खलिस्तानी और पीएफआई के लोग घुस चुके हैं जो आंदोलन को हिंसक बनाने के फिराक में हैं। सरकार हिंसा प्रायोजित कर दमनचक्र चलाने की कोशिश भी कर सकती है।

दिल्ली के घेराव से भले मोदी सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उसपर एक नैतिक दबाव तो पड़ता है। किसानों के आंदोलन के समर्थन में सम्मान और पुरस्कार वापसी शुरू हो चुकी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सरकार की आलोचना हो रही है। इससे सरकार की बदनामी हो रही है। सरकार इन बातों की चिंता नहीं करती। फिर भी अब सरकार की कोशिश यह होगी कि किसानों का हुजूम वापस लौट जाए और कानून भी वापस न लेने पड़ें। सरकार किसान नेताओं को यह समझाने का प्रयास करेगी कि आपके समूह में अवांछित तत्व घुसपैठ कर चुके हैं। वे आंदोलन को बदनाम कर देंगे इसलिए किसानों को वापस भेज दीजिए और वार्ता जारी रखिए। आंदोलन को बदनाम करने की मुहिम में भाजपा के मंत्री, गोदी मीडिया, आइटी सेल पहले से ही सक्रिय है। किसान गोदी मीडिया का बॉयकाट कर रहे हैं लेकिन अन्य लोग सोशल मीडिया पर घर बैठे मुहिम चला रहे हैं।

केंद्र सरकार की मंशा शुरू से ही स्पष्ट है। यदि दिल्ली सरकार ने स्टेडियम दे दिए होते तो उसने उन्हें ओपेन जेल बनाकर सारे किसानों को उनमें डाल दिया होता। बुराड़ी के निरंकारी मैदान में किसानों को पहुंचने का आह्वान करने के पीछे भी यही मंशा थी कि उन्हें चारो तरफ से घेरकर रखा जाए। लेकिन किसान सरकार की मंशा भांप गए और बार्डरों को जाम कर बैठे रहे। सरकार यह तीनों कानून किसके कहने पर किस मकसद से लाई है इसे किसान भी समझ रहे हैं और नागरिक भी। लॉकडाउन के समय जब तमाम आर्थिक क्षेत्र नकारात्मक जीडीपी की ओर बढ़ रहे थे तो एकमात्र कृषि क्षेत्र ही सकारात्मक जीडीपी पर टिकी हुई थी। यह 25 लाख करोड़ के टर्नओवर का क्षेत्र है। इसलिए सरकार ने इसे अपने कार्पोरेट मित्रों के हवाले कर देने का फैसला किया। लेकिन इसमें देश की 70 प्रतिशत आबादी शामिल है। इसलिए यह एक बड़े जन विद्रोह का कारण बन सकता है। मोदी सरकार देश के सार्वजनिक क्षेत्र के कई उपक्रमों को अपने मित्रों के हवाले कर चुकी है। बचे खुचे उपक्रम भी ऑन सेल हैं। कृषि क्षेत्र पर अब उसकी नज़र है। उसे कार्पोरेट के हवाले करने का मन बना चुकी है। इसी मकसद से उसने यह कानून बनाए हैं। इसलिए वह इन्हें किसी कीमत पर वापस लेने के मूड में नहीं है। उसे पता है कि 2024 के चुनाव तक उसे सत्ता से कोई हटा नहीं सकता। इस बीच वह जो चाहे करने को स्वतंत्र है। मित्रों की तिजोरी भरी रहेगी तो फंड की कोई कमी नहीं होगी।

इधर किसान आर-पार की लड़ाई की ठान चुके हैं। वे वार्ता भी कर रहे हैं और आंदोलन भी। रविवार को जब सरकार के साथ पांचवे चक्र की वार्ता चल रही होगी तब देश भर में मोदी, अंबानी और अडानी के पुतले फूंके जा रहे होंगे। सरकार की जिद और किसानों के संघर्ष का परिणाम क्या निकलेगा अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता। सरकार को सदबुद्धि आ जाए तो बात अलग है। हालांकि इसकी कोई उम्मीद नहीं है।

 

Leave A Reply

Your email address will not be published.

%d bloggers like this: