लॉकडाउनः प्रकृति के शुद्धीकरण और मानव मस्तिष्क के प्रदूषण का काल

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-देवेंद्र गौतम

लॉकडाउन-1 के 20 दिन पूरे हुए। कल इसके अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके अगले संस्करण की घोषणा करेंगे। उनके पिटारे से क्या निकलेगा उनके संबोधन के बाद ही पता चलेगा। लेकिन इस अवधि में प्रकृति ने अपना कायाकल्प करना शुरू कर दिया। वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण से काफी हद तक राहत मिली है। लेकिन इस बीच मानसिक प्रदूषण बेतहाशा बढ़ गया। सांप्रदायिक वैमनस्य अपने चरम की ओर पहुंचने लगा। गंगा और यमुना नदी के प्रदूषण में 60 फीसद की कमी दर्ज की गई है लेकिन इस बीच भारत की गंगा-यमुनी संस्कृति पूरी तरह नष्ट होती चली गई है। राजनीतिक लाभ हानि के गणित के कारण राष्ट्रीय जीवन में जहर घोलने का काम तो पहले ही से चल रहा था। दिल्ली दंगों की आंच ठंढी हो चली थी। लेकिन तबलीगी जमात के लोगों ने इसे चरम पर पहुंचा दिया। उन्होंने देश के कोने-कोने में पहुंचकर कोराना वायरस को फैलाने का घिनौना कृत्य किया। मेडिकल स्टाफ के साथ बदसलूकी, नंगई इस कदर की कि इसके कारण दो संप्रदायों के बीच परस्पर अविश्वास की खाई और गहरी होती चली गई। मुस्लिम समाज के लोग यदि जमातियों को शरण देना बंद करते। उनका बहिष्कार करते। भर्त्सना करते तो यह खाई इतनी गहरी नहीं होती लेकिन उनके एक बड़े हिस्से ने जमातियों की बदतमीजियों, मानवता विरोधी गतिविधियों को भी मज़हब का मामला बना लिया। उन्हें जगह-जगह थूकने, नर्सों के सामने नग्न होने का मामला भी मज़हब के दायरे में आ गया और इसके खिलाफ कार्रवाई को उत्पीड़न का मामला बना दिया गया।  इसके कारण धर्म निरपेक्ष लोगों के अंदर भी उनके खिलाफ आक्रोश उत्पन्न हो गया। मुस्लिम समाज के इस गैरमर्यादित आचरण से संघ और भाजपा की ध्रुवीकरण की कोशिशों को और भी बल मिला। हरियाणा के जिंद के ठाठरत गांव में रविवार को पीएम मोदी के आह्वान पर बिजली बुझाने और दीया जलाने के आह्वान का पालन नहीं करने पर मुस्लिम परिवार के चार लोगों की बेतरह पिटाई की गई। हालांकि बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इस तरह की घटनाएं विभिन्न इलाकों में दर्ज की गईं। पीएम मोदी के इस आह्वान का कोई वैज्ञानिक आधार भी था या मानसिक अवसाद से बाहर निकालने का यह एक मनोवैज्ञानिक टोटका था, किसी को पता नहीं। भक्त लोगों ने आंख मूंदकर इसका पालन किया बल्कि कुछ लोगों ने तो पटाखे तक फोड़े। एक महिला विधायक ने फायरिंग तक की। जबकि बहुत सारे हिंदुओं ने भी इसका कोरोना से कोई संबंध नहीं समझ पाने के कारण इसका बहिष्कार किया। विपक्षी दलों के नेताओं और समर्थकों ने भी इसे नज़र-अंदाज़ किया था। लेकिन भक्तों का गुस्सा सिर्फ मुस्लिमों पर फूटा। यह उनके प्रति पूर्व संचित घृणा और गुस्से के भाव की ही अभिव्यक्ति थी। प्रधानमंत्री मोदी ने व्यक्तिगत आह्वान किया था। यह कोई सरकारी आदेश नहीं था। लेकिन इसे राजाज्ञा की तरह लिया गया।

जहां तक गंगा, यमुना का सवाल है पिछले 30-35 वर्षों के अंदर इनकी सफाई पर बीस हजार करोड़ से भी अधिक रुपये खर्च कर दिए गए लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ जबकि 21 दिनों के लॉकडाउन में दो सप्ताह के अंदर ही तब्दीली दिखने लगी। इनके साथ देश की अधिकांश नदियों का जल स्वच्छ होने लगा। यमुनोत्री से लेकर इलाहाबाद में गंगा में संगम तक यमुना नदी का प्रवाह क्षेत्र 1370 किलोमीटर है। इसका 22 किलोमीटर का हिस्सा दिल्ली में पड़ता है। दिल्ली में प्रतिदिन 3 हजार 267 मिलियन लीटर सीवर का पानी निकलता है जिसके 50 प्रतिशत का ट्रिटमेंट हो पाता है। शेष नदी में सीधा गिरता है। करीब एक लाख कारखाने हैं जिनसे प्रतिदिन 60-70 मिलियन कचरा निकलता है। उसका कुछ हिस्सा ट्रिट हो पाता है बाकी नदी में गिरता है। इसके अलावा दिल्ली के 16 नालों की गंदगी भी यमुना में ही समाती है। इसके कारण दिल्ली में यमुना नदी गंदे नाले में बदल गई थी। लॉकडाउन में सबकुछ बंद होने के कारण गंदगी का प्रवाह बेहद कम हो गया और नदी का पानी स्वच्छ होने लगा।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक 36 निगरानी केंद्रों में से 27 में गंगा का पानी स्नान के लायक हो चुका है। गंगा में 10 प्रतिशत प्रदूषण उद्योगों से निकलते तरल और ठोस कचरे के कारण होता था। ट्रिटमेंट प्लांट बने हैं लेकिन उनसे प्रतिदिन निकलने वाले कचरे का एक हिस्सा ही ट्रिट हो पाता थाय़ श्मशान घाटों में शवों को अंतिम संस्कार और नौका विहार के कारण 5 प्रतिशत प्रदूषण होता था। इन गतिविधियों के बंद होने के कारण गंगा 50 प्रतिशत तक स्वतः साफ हो गई है। इस तरह कोरोना वायरस के प्रकोप ने लॉकडाउन के जरिए पर्यावरण संरक्षण की एक नई तकनीक सुझा दी है। समय-समय पर लॉकडाउन के जरिए वायु और जल प्रदूषण को कम किया जा सकता है लेकिन मानसिक प्रदूषण से मुक्ति की कोई तकनीक अभी तक सामने नहीं आई है। वैश्विक आपदा के समय इसमें स्वाभाविक रूप से कमी आनी चाहिए थी। परस्पर सहयोग की भावना विकसित होनी चाहिए थी लेकिन सांप्रदायिकता और वैमनस्य का प्रदूषण खत्म होने की जगह और बढ़ता ही जा रहा है। राजनीति इसमें खाद-पानी डालने का काम कर रही है।

 

 

 

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