संक्रामक बीमारियों का लंबा इतिहास

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

कोरोना वायरस के प्रकोप से विश्व के अधिकांश देशों में त्राहिमाम की स्थिति है। चीन से शुरू हुआ यह संकट अभी तक 11 हजार से अधिक लोगों की जान ले चुका है। भारत में भी यह तीसरे चरण में पहुच चुका है।अभी तक 324 लोग संक्रमित है। 28 लोग ठीक हो चुके हैं। 4 लोगों की जान जा चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस को महामारी घोषित किया है। महामारी का मतलब होता है पूरी दुनिया में तबाही मचाने वाली संक्रामक बीमारी। हालांकि यह कोई पहली बार आया हुआ खतरा नहीं है। संक्रामक बीमारियों के तांडव का लंबा इतिहास रहा है। आज हमारा चिकित्सा विज्ञान इतना उन्नत हो चुका है कि हम अपना बचाव कर सकते हैं। इसका सामना कर सकते हैं। इलाज ढूंढ सकते हैं। अभी भी इसके प्रसार को हमने काफी हद तक नियंत्रित रखा है। अन्यथा संक्रामक बीमारियां तो कई बार धरती की 50 फीसदी से भी अधिक आबादी का सफाया कर चुकी हैं। यह अलग बात है तब यातायात के साधनों का अभाव था और उनका प्रसार धीमी गति से होता था। तब समुद्री जहाजों पर लदे सामान के साथ प्लेग, चेचक, हैजा जैसी संक्रामक बीमारियों के किटाणु महीनों के सफर के बाद एक देश से दूसरे देश में पहुंचते थे। आज वे विमान पर बैठकर हवाई मार्ग से घंटों में कहीं से कहीं पहुंच जाते हैं।

एक जमाने से सबसे घातक बीमारियों में एक था प्लेग। प्लेग के इतिहास पर गौर करें तो 430 ईसा पूर्व में एथेंस में पहली बार चूहों के जरिए फैला था। उसमें एथेंस के एक चौथाई सैनिक और एक चौथाई नागरिक मारे गए थे। 251 से 266 ई. के दौरान रोम में प्लेग फैला था जिसमें हर दिन 5 हजार लोगों की मौत हो जाती थी। 1340 ई. में चीन के उक्रेन में चूहों से प्लेग का संक्रमण शुरू हुआ था जिसके कारण आबादी का बड़ा हिस्सा खत्म हो गया था। फिर संक्रमित चूहे सिल्क रूट से व्यापारिक सामग्री के साथ यूरोप तक पहुंच गए थे और भारी तबाही मचाई थी। अक्टूबर 1347 में उपभोक्ता सामग्रियों से भरे एक दर्जन जहाज सिसली बंदरगाह पर पहुंचे थे तो उसपर सवार अधिकांश लोग मृत पाए गए थे। थोड़े से लोग मरणासन्न अवस्था में थे। लोग समझ नहीं पाए कि ऐसा क्यों हुआ। जबतक समझते तबतक प्लेग के किटाणुओं ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया और यूरोप की आधी से अधिक आबादी का सफाया कर दिया। इतनी मौतें हुईं कि सामूहिक कब्रें खोदकर शवों को दफनाना पड़ा। खौफ के कारण लोग अपने घरों में कैद हो गए। इसे ब्लैक डेथ के नाम से याद किया जाता है। 1352 तक जान-माल की तबाही मचाने के बाद प्लेग का प्रकोप थमा लेकिन यूरोप की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। महंगाई आसमान छूने लगी। यह ऐसी जानलेवा बीमारी थी कि संक्रमण होने के 24 घंटे के अंदर यह फेफड़ों तक पहुंचकर जान ले लेता था। यह मरीज के कफ के साथ फैलता था।

1889 से 1950 के बीच दुनिया में तीन बार प्लेग ने भीषण तबाही मचाई। इसे बुबानिक प्लेग कहते हैं। इसके पहले दौर की शुरुआत शुरुआत मिश्र से हुई फिर कुस्तुनतुनिया होते हुए कई देशों मे फैल गई। प्रोसोपियस नामक इतिहासकार के मुताबिक उस दौरान प्रतिदन 10 हजार लोगों की मौत हो रही थी। तीसरी बार में इसने भारत और चीन को अपनी चपेट में लिया था और एक करोड़ से भी अधिक आबादी का सफाया कर दिया था। 1959 तक दुनिया में प्लेग के कीड़े सक्रिय रहे थे। इसके बाद इसपर नियंत्रण पा लिया गया।

प्लेग के बाद दूसरी महामारी हैजा अथवा कालरा थी। इसका प्रकोप 1818 से 1966 तक रहा था। थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद इसका कहर टूटता था और हर बार लाखों लोगों की जान लेकर शांत होता था। इसने कुल सात बार तबाही मचाई थी। इसके कारण सिर्फ जावा द्वीप में एक लाख लोगों की मौत हो गई थी। इसका प्रकोप चीन और भारत से लेकर इंडोनेशिया तक रहा था। इसके कारण सिर्फ भारत में 1.5 करोड़ लोग मारे गए थे। रूस में भी 20 लाख मौतें हुई थीं। 1829 से 1851 के बीच जब दूसरी बार इसकी वापसी हुई तो हंगरी में एक लाख, लंदन में 55 हजार, फ्रांस, कनाडा और अमेरिका में 1.5 लाख लोगों की मौत हुई थी। 1852 से 1860 के बीच रूस में 10 लाख लोग मरे थे, 1854 में इसने जापान और चीन में. 1858 में फिलीपींस में और 1859 में कोरिया में तांडव मचाया था। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इसकी शुरुआत बंगाल से हुई थी। 1920 तक इसने पूरे भारत को अपनी चपेट में ले लिया। यातायात के धीमे साधनों के कारण इसके एक जगह से दूसरी जगह पहुंतने में कई-कई साल लग जाते थे। इसके बाद इंफ्लुएंजा, चेचक, तपेदिक, स्पेनिश फ्लू, एचआईवी, डेंगू, चिकनगुनिया, स्वाइन फ्लू जैसी कितनी ही संक्रामक बीमारियों का प्रकोप होता रहा।

उस दौर की महामारियों की तुलना में कोरोना वायरस कुछ भी नहीं है। यह तेजी से फैल जरूर रहा है लेकिन कमजोर प्रतिरोधक शक्ति वाले लोगों के लिए ही जानलेवा साबित हो रहा है। स्वस्थ लोगों को यह संक्रमित तो करता है लेकिन उनकी जान नहीं ले पाता। अभी तक यह 124 देशों में फैलकर एक लाख से अधिक लोगों को संक्रमित कर चुका है लेकिन मरने वालों का आंकड़ा पांच हजार के आसपास है। इसकी दवा का ईजाद अभी तक नहीं हो सका है लेकिन बहुत से लोग संक्रमित होकर ठीक भी हो चुके हैं। आज हमारा चिकित्सा विज्ञान काफी विकसित हो चुका है और हम पहले से कहीं ज्यादा जागरुक हो चुके हैं। थोड़ी सावधानी बरतकर हम इसका सामना कर सकते हैं और कर भी रहे हैं। ऐसे तमाम कार्यक्रम एक महीने के लिए स्थगित कर दिए गए हैं जिनमें भीड़भाड़ होने की संभावना है। स्कूल-कालेज बंद कर दिए गए हैं। सिनेमा हॉल बंद हैं। अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें स्थगित कर दी गई हैं। प्रधानमंत्री समेत तमाम मंत्रियों और नौकरशाहों के विदेश दौरे स्थगित कर दिए गए हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने कर्मियों को घर से काम करने की हिदायत दे चुकी हैं। स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ऐसे में जान-माल का नुकसान उतना नहीं होगा जितना हो सकता था। अर्थिक गतिविधियां जरूर बाधित होंगी। पूरी दुनिया में व्यावसायिक गतिविधियां धीमी हो चली हैं। पहले से संकटग्रस्त भारतीय अर्थ व्यवस्था पर जरूर इसका घातक असर पड़ेगा। तेज़ गति से विकसित होने वाली दुनिया की मजबूत अर्थव्यवस्थाएं इसके झटके को झेल लेंगी। भारत के लिए जरूर यह बड़ी चुनौती पेश करेगा।

 

 

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