महाराष्ट्रः दो धाराओं के बीच पेंडुलम बनी शिवसेना

सत्ता की भूख ने कहीं का नहीं छोड़ा

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

शरद पवार और अमित शाह संसदीय राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी है। उनकी चाल को समझना आसान नहीं है। उनकी चाणक्य नीति के कारण महाराष्ट्र में शिवसेना की हालत पेंडुलम जैसी बन गई है। वहां सरकार बनाने की सबसे ज्यादा बेचैनी शिवसेना में हैं। वह 50-50 के फार्मूले पर सरकार का गठन चाहती है। कम से कम ढाई साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने पास रखने की महत्वाकांक्षा ने उसे दो टीमों के बीच नाचती हुई गेंद बना दिया है। भाजपा उसकी मांग को सिरे से ठुकराकर सरकार बनाने के दावे से पीछे हट गई।

इस स्थिति में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश की। शरद यादव और सोनिया गांधी के साथ उनकी बात चलती रही लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया। न इकरार हुआ न इनकार। सरकार बनाने के मामले में उनके रुख में गर्माहट नहीं आ पाई। अब शिवसेना की बातचीत भाजपा से भी चल रही है और कांग्रेस-राकांपा गठबंधन से भी। जाहिर है कि दो छोरों पर खड़े दिग्गज नेताओं ने महाराष्ट्र की जनता के बीच यह संदेश पहुंचा दिया कि शिवसेना को न मराठा मानुष से कुछ लेना-देना है और न उग्र हिंदुत्व से। यह दोनों एजेंडे उसके लिए सत्ता पर काबिज होने का माध्यम भर हैं। वह उत्तर भारत की आबादी के खिलाफ विषवमन करती है तो उसके पीछे सिर्फ वोट बैंक बनाने का राजनीतिक स्वार्थ होता है। हालांकि क्षेत्रीयतावाद का उसका नारा बुरी तरह पिट चुका है। यह हिट नारा होता तो शिवसेना और मनसे के हाथों में महाराष्ट्र की राजनीति की बागडोर होती। लेकिन वे अपनी उपद्रवी जमात को चुनावी जीत में नहीं बदल पातीं।

इस विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना के चेहरे से सारे मुखौटे हट गए हैं। उसका असली चाल, चरित्र और चेहरा उजागर हो चुका है। भाजपा अभी तक जोड़-तोड़ कर सरकार बनाने के लिए चर्चित रही है। महाराष्ट्र में उसने अलग रणनीति अपनाई जो उसकी राजनीतिक शैली से सर्वथा अलग थी। दरअसल भाजपा ने इसके जरिए दूर की कौड़ी फेंकी। शरद पवार भी इस चाल को समझ गए और क्षेत्रीयतावादी उन्माद के ताबूत में एक कील अपनी तरफ से भी ठोकने की कोशिश कर दी। उद्धव ठाकरे ने भाजपा से तीन दशक पुराना रिश्ता तोड़ा तो इसके पीछे सत्ता लोलुपता के अलावा कोई भावना काम नहीं कर रही थी। साझा सरकार के मामले में भाजपा पीछे हट गई और कांग्रेस और राकांपा की ओर से टाल-मटोल का रवैया जारी रहा। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लालू हो गया। वास्तव में सरकार बनाने के लिए बहुमत का जादुई आंकड़ा किसी के पास नहीं है। महाराष्ट्र की 288 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास 105, शिवसेना के पास 56 सीटें हैं, जबकि राकांपा और कांग्रेस के पास क्रमश: 54 और 44 सीटें हैं। राज्य में सरकार बनाने को इच्छुक किसी भी दल या गठबंधन को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कम से कम 145 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी। ऐसे में दो ही संभावनाएं हैं। कांग्रेस, राकांपा और शिवसेना अथवा भाजपा-शिवसेना की साझा सरकार। तीसरी सूरत हार्स ट्रेडिंग और तोड़-फोड़ की है। शिवसेना इसमें सक्षम नहीं है। वह इस हालत में नहीं रह गई है कि किसी गठबंधन पर अपनी शर्तें लाद सके। उसे हर हाल में छोटा भाई बनकर ही रहना होगा। अन्यथा राज्य राष्ट्रपति शासन के हवाले रहेगा। यह सस्पेंस जितना लंबा खिंचेगा शिवसेना को उतना ही राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा।

कांग्रेस-राकांपा ने यदि उतावलापन दिखाकर शिवसेना के साथ सरकार बनाने की जल्दबाजी की होती तो उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि का नुकसान होता और दूसरे राज्यों में उनकी यह पहचान कायम नहीं रह पाती। उन्हें सिर्फ महाराष्ट्र की राजनीति तो करनी नहीं है। उनकी नज़र वर्ष 2024 में केंद्र की सत्ता पर पर है। शिवसेना का अगला कदम क्या होगा और महाराष्ट्र का ससपेंस कब किस रूप में खत्म होगा, कहना कठिन है।

 

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