नड्डा के काफिले पर हमला ममता सरकार की बड़ी चूक

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पश्चिम बंगाल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला निंदनीय हैं। हमलावर कौन थे यह सवाल उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि ममता बनर्जी की सरकार ने उनके काफिले की सुरक्षा की क्या व्यवस्था की थी। राज्य सरकार का मुखिया होने के नाते यह उनकी जिम्मेदारी थी। इसमें उनकी सरकार पूरी तरह विफल साबित हुई। वह भी तब जबकि राज्यपाल ने हमले की आशंका पहले ही व्यक्त कर दी थी। यदि हमलावर तृणमूल कांग्रेस के थे तो इसका मतलब है कि ममता बनर्जी अपने कार्यकर्ताओं को अनुशासित और संयमित नहीं रख सकीं। यदि वे उनके कथनानुसार भाजपाई थे या असामाजिक तत्व थे तो उन्हें हमला करने का मौका कैसे मिला। यह सुरक्षा व्यवस्था की चूक तो है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

ममता बनर्जी की शिकायत है कि उनके राज्य में बाहरी लोग क्यों आ रहे हैं। सवाल है कि बाहरी कौन हैं…। जेपी नड्डा. कैलाश विजयलर्गीय या अमित शाह। यही लोग तो पश्चिम बंगाल का दौरा कर रहे हैं। ये पूरी तरह भारत के नागरिक हैं और भारत के नागरिकों को देश के किसी हिस्से में जाने की स्वतंत्रता है। भाजपा के साथ उनके वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर तरह की विचारधारा के लिए स्थान होता है। जीत-हार और अगली सरकार का फैसला जमता को करना है। सत्ता की चाबी वोटरों का पास है। विपरीत विचारधारा के नेताओं की सुरक्षा पर तो और ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि उन्हें जरा सी खरोंच भी आ गई तो राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाएगा। यही हो भी रहा है। केंद्र सरकार ने राज्यपाल से रिपोर्ट मांगी है और उस रिपोर्ट के आधार पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। इसके बाद पूरा शासन तंत्र केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा के हाथ में आ जाएगा और उसके लिए विधानसभा चुनाव जीतना थोड़ा आसान हो जाएगा। कुछ ही महीने बाद चुनाव होने हैं। भाजपा की चुनावी रणनीति किसी से छुपी हुई नहीं है। वहां असदुदुदीन ओवैसी की पार्टी मुसलिम मतों को रिझाएगी और उसकी प्रतिक्रिया में हिंदू वोटर भाजपा की ओर आकर्षित होंगे। ममता बनर्जी बंगाली अस्मिता को मुद्दा बनाएंगी। अगर उन्हें बंगाली अस्मिता के कार्ड पर भरोसा है तो उनके लिए भाजपा की रणनीति चिंता का विषय नहीं होनी चाहिए। उन्हें इस बात का अहसास नहीं है कि उनकी तुनकमिजाजी ने ही पश्चिम बंगाल में संघ अथवा भाजपा की ज़मीन तैयार की है। यदि वे अपनी तुनकमिजाजी को काबू में नहीं रखेंगी तो भाजपा इसका लाभ उठाएगी। जहां तक हिंसा का सवाल है, यह सच है कि बंगाल में कोई भी चुनाव हिंसा के बगैर संपन्न नहीं होता। भाजपा इस बात को जानती है। यह भी सच है कि भाजपा कोई गांधीवादी या अहिंसक पार्टी नहीं है। उसका चरित्र क्या है, पूरा देश जानता है। ममता बनर्जी भी जानती हैं। अगर चुनाव ममता जी के मुख्यमंत्रित्व काल में होगा तो पुलिस प्रशासन उनके नियंत्रण में होगा लेकिन राष्ट्रपति शासन में चुनाव हुआ तो उनकी बागडोर केंद्र सरकार के हाथों में होगी। उस स्थिति में येन-केन-प्रकारेण चुनाव कैसे जीता जाता है, भाजपा जानती है। बिहार का चुनाव इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। राजनीति में सिर्फ तैश काम नहीं आता। बहुत सूझ-बूझ की जरूरत होती है। अभी कई मोर्चे हैं जहां बहुत सूझ-बूझ की जरूरत पड़ेगी। वे वाम दलों को अपना मुख्य प्रतिद्वंदी मानती हैं। कांग्रेस के साथ भी उनके छत्तीस के संबंध हैं। बिहार में जो महागठबंधन बना था उसमें कांग्रेस भी थी और वाम दल भी। भले उन्हें जीत हासिल नहीं हुई लेकिन मजबूत विपक्ष के रूप में सामने रहे। अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी को मुख्य चुनौती भाजपा देने जा रही है। अगर उन्होंने अपने पूर्वाग्रहों के तहत महागठबंधन के साथ तालमेल नहीं किया तो भाजपा विरोधी मतों का बिखराव होगा। इसका लाभ भाजपा को मिलेगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि ममता बनर्जी एक जुझारू नेत्री हैं और अपने जुझारूपन के जरिए ही उन्होंने वामफ्रंट की तीन दशक पुरानी सरकार को उखाड़ फेंका था। लेकिन अब उनका सामना एक मायावी पार्टी से है जो अपने विरोधियों को देशद्रोही करार देती है और जिसने सांप्रदायिकता को राष्ट्रवाद का चोला पहना रखा है। इससे मुकाबला करने के लिए उन्हें बहुत सावधानी से काम लेना पड़ेगा। वे भाजपा नेताओं के चुनावी अभियान पर रोक नहीं लगा सकतीं। प. बंगाल आने से नहीं रोक सकतीं। ममता जी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनके रोड शो या जनसभाओं में किसी तरह की हिंसात्मक घटना न हो। उन्हें अपने कार्यकर्ताओं को भी आवश्यक हिदायत देनी चाहिए। यदि उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रखी होती तो जेपी नड्डा के काफिले पर हमला करने वाले कुछ लोग जरूर पकड़े जाते और उनकी पहचान हो जाती। अगर वे संघ अथवा भाजपा के लोग होते तो उन्हें इसके लिए उल्टे भाजपा को ही कटघरे में खड़ा करने का अवसर मिल जाता। बहुत पहले यह बात सामने आई थी कि तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति प्रशांत किशोर की कंपनी तय कर रही है। प्रशांत किशोर जाने-माने रणनीतिकार हैं। उनसे इतनी बड़ी चूक नहीं हो सकती जितनी नड्डा के मामले में हुई। चुनाव की पूर्व बेला में बड़ी सावधानी की जरूरत पड़ती है। ममता बनर्जी अगर यह बात नहीं समझेंगी तो उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उनका लक्ष्य चुनाव जीतना ही नहीं, भाजपा को मजबूत विपक्ष का दर्जा प्राप्त करने से भी रोकना होना चाहिए।

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