कश्मीर के हालात पर आत्ममंथन की जरूरत

आतंकवाद का खात्मा हो गया तो कौन फैला रहा है धमकी भरे पोस्टरों से दहशत

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देवेंद्र गौतम

कश्मीर घाटी में धमकी भरे पोस्टरों से दहशत का माहौल है। इसके साथ ही सामान्य होते हालात पर ब्रेक लग गया है। मोदी सरकार अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाए जाने को अपनी बड़ी उपलब्धि बताते नहीं अधाती। पूर्व सरकारों पर तंज कसने का कोई मौका नहीं चूकती। लेकिन स्थितियों को सामान्य बनाने की चुनौती के मामले में वह पूरी तरह विफल साबित हो रही है। जम्मू और लद्दाख में तो कोई समस्या नहीं है लेकिन कश्मीर घाटी में आतंकियों और अलगाववादियों के मंसूबे ठंढे नहीं हुए हैं। वहां हर 10 लोगों पर एक सुरक्षाकर्मी तैनात है। इसके बावजूद उपद्रवी लोग आगजनी कर रहे हैं। लोगों को डरा धमका रहे हैं। हर्वे-हथियार लेकर घूम रहे हैं। दुकानें बंद करवा रहे हैं। मासूम लोगों का खून बहा रहे हैं। वे पकड़े जाते हैं। जेल में डाले जाते हैं लेकिन अपनी हरकतों से बाज नहीं आते। उनसे निपटने का कोई तरीका तो होगा।

पाकिस्तान और उसके समर्थक कभी नहीं चाहते कि कश्मीर में शांति कायम हो। सामाजिक, व्यापारिक गतिविधियां चलें। बच्चे स्कूल जाएं। लोग काम धंधे में लगें। मोदी सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद वह अपने मंसूबों में सफल होता दिख रहा है। जिन नेताओं से गड़बड़ी की आशंका थी वे नज़रबंद हैं। जेलों में हैं। जो गड़बड़ी फैला रहे हैं उनका कोई रिकार्ड नहीं है जिससे उनकी शिनाख्त हो सके। उनसे निपटने की सटीक रणनीति बनाने में कहीं न कहीं चूक हो रही है। अजीत डोभाल जैसे कुशल रणनीतिकार भी दुश्मनों को परास्त नहीं कर पा रहे हैं। डींग हांकने से फुर्सत मिले तो विचार करना चाहिए कि वहां कैसे शांति कायम की जा सकती है। यह विजय का पताका लहराने और राजनीतिक लाभ उठाने का नहीं स्थिति को कुशलता पूर्वक संभालने का अवसर है।

नोटबंदी और जीएसटी से लेकर कश्मीर मामले तक मोदी सरकार ने देशवासियों को जरूर यह विश्वास दिला दिया कि वह साहसिक फैसले ले सकती है। इस मामले में वह नफा-नुकसान की परवाह नहीं करती। लेकिन मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने के लिए जिस साहस की जरूरत होती है उसकी प्रतिक्रिया झेलने के लिए उतनी ही सूझ-बूझ और उतनी ही तैयारी की जरूरत पड़ती है। मोदी सरकार इसी मोर्चे पर चूक जा रही है। फैसला लेने के पहले तमाम बिंदुओं पर अच्छी तरह सोच विचार कर उससे निपटने की पुख्ता तैयारी नहीं हो पाती। यह पहलू सरकार की कार्यशैली में शामिल नहीं हो पाता। जो होगा देख लेंगे की मानसिकता में फैसले ले लिए जाते हैं, भुगतना देशवासियों को पड़ता है। मोदी सरकार को बात बाद में समझ आती है। आज मोदी जी नोटबंदी और जीएसटी का जिक्र अपने भाषणों में नहीं करते। उन्हें सही ठहराने के तर्क नहीं देते। अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के करीब साढ़े तीन महीने गुजर चुके हैं। वहां जनजीवन को सामान्य बनाने की कोशिशें किसी परिणाम तक नहीं पहुंच पा रही हैं। आतंकवाद का खात्मा हो जाने के दावे अब थोथे साबित हो रहे हैं। अपनी विफलता का ठीकरा पाकिस्तान और कांग्रेस के मत्थे फोड़ने से सरकार की कार्यकुशलता का सिक्का कुछ मंदबुद्धि के भक्तों पर जम सकता है, स्थितियों की गहराई से वास्ता रखने वाले नागरिकों पर नहीं। मोदी सरकार को अभी अपनी दूरदर्शिता और कार्यकुशलता साबित करनी होगी। थोथी दलीलों और कुतर्कों से देशवासियों को ज्यादा समय तक बहलाया नहीं जा सकेगा।

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