न आंख मूंदकर समर्थन उचित, न गांठ बांधकर विरोध

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी पर तंज कसते हुए कहा है कि कांग्रेस के कुछ नेताओं के अंदर संघ की आत्मा समा गई है। उनका इशारा मुख्य रूप से ज्योतिराव सिंधिया जैसे उन नेताओं पर है जिन्होंने जम्मू-कश्मीर से धारा-370 और 35 ए हटाने और उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित करने के निर्णय का समर्थन किया था। दरअसल भारत की पूरी आबादी ने इस निर्णय का स्वागत किया था। उस समय इस निर्णय पर सवाल उठाना जनमानस के विवेक पर सवाल उठाने जैसा था। कांग्रेस भी उस समय कोई स्टैंड नहीं ले सकी थी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष में होने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि सरकार के हर निर्णय का विरोध ही किया जाए। लोकतंत्र में न आंख मूंदकर समर्थन किया जाना चाहिए न गांठ बांधकर विरोध। सवाल अब जरूर उठाया जा सकता है कि इस फैसले के बाद स्थिति को सामान्य करने का सरकार के पास कोई रोडमैप था या नहीं। आज भी वहां जनजीवन पटरी पर क्यों नहीं आ पा रहा है। जब फैसला लिया गया था तब भी यह सवाल पूछा जा सकता था लेकिन फैसले के विरोध का कोई औचित्य नहीं था।

जनमानस के खिलाफ जाना कहीं से भी बुद्धिमानी नहीं होती। ऐसा करने पर अलगाव में पड़ने का खतरा होता है। 1942 में जब देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था तब कम्युनिस्ट पार्टी और जनसंघ ने यही गलती की थी। राष्ट्रवाद की प्रचंड लहर के बावजूद इन दलों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के मद्दे-नज़र अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के लिए उसे उचित समय नहीं माना था। जनसंघ तो शुरू से ही महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम के विरोध में रहा था बल्कि अंग्रेजी शासन का कहीं न कहीं पक्षधर ही रहा था लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी भी अंतर्राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में चीजों को देखने के नाते गच्चा खा गई थी। सी समय तेलंगाना विद्रोह और नौसेना विद्रोह को जीत के कगार पर पहुंचने के बाद वापसी के कारण भी कम्युनिस्टों की आज तक आलोचना होती है। इन सब निर्णयों के कारण वामपंथी आंदोलन को जोरदार झटका लगा था और कई हिस्सों में बंटने के बावजूद आजतक भारतीय राजनीति की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाया। कम्युनिस्टों ने दूसरी गलती आपातकाल के दौरान जेपी आंदोलन का विरोध और इंदिरा गांधी का समर्थन करके की थी। इसका खमियाज़ा भी उन्हें भुगतना पड़ा। हांलाकि कम्युनिस्टों में इतनी ईमानदारी जरूर थी कि उन्होंने अपनी तमाम ऐतिहासिक गलतियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया।

एक समझदार और जनपक्षीय संगठन को कभी भी जनमानस के विरोध में नहीं जाना चाहिए। आज सीएए, एनपीआर और एनआरसी पर भाजपा यही गलती कर रही है। नरेंद्र मोदी की सरकार ने सत्ता में आने के बाद जितने भी फैसले किए, चाहे उनका परिणाम विध्वंसक ही क्यों न निकला हो, जनता ने समर्थन किया। नोटबंदी पर पीएम मोदी ने कहा कि इसका सुखद परिणाम बाद में आएगा तो लोगों ने मान लिया कि बाद में आएगा। पूरा देश बैंकों के सामने अपना ही पैसा निकालने के लिए कतार में खड़ा रहा। कई लोगों की मौत भी हो गई। लेकिन किसी ने विरोध नहीं किया। विपक्ष और अर्थशास्त्रियों ने इसे अर्थ व्यवस्था के लिए जरूर घातक बताया। लेकिन जनता ने उनकी बात अनसुनी कर दी। आम जनता का मोदी सरकार पर भरोसा बना रहा। लेकिन सीएए, एनपीआर और एनआरसी के खिलाफ जब देश की व्यापक जनता सड़कों पर उतर आई तो मोदी सरकार जन भावना का आदर करने की जगह अपनी जिद पर अड़ गई। जनता के विरोध को लाठी-गोली के बल पर कुचलने पर आमादा हो गई। उसे हिंदू-मुसलिम और पता नहीं क्या-क्या रंग देने की कोशिश करने लगी। अब मोदी सरकार जनभावना के खिलाफ जाकर एक बड़ी गलती करने जा रही है। इसका खमियाजा तो उसे भुगतना ही पड़ेगा। सत्ता हमेशा किसी के हाथ में नहीं रहती। उसपर जबरन कब्जा नहीं किया जा सकता। सरकार को अपनी जिद छोड़कर इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। वही नरेंद्र मोदी जो जनता के नायक थे अब खलनायक बनते जा रहे हैं। उनके भक्तों का भी मोह भंग होता जा रहा है।

कहने का तात्पर्य यह है कि सत्तापक्ष हो या विपक्ष जनभावना के खिलाफ कभी नहीं जाना चाहिए। जनता समय आने परअपना फैसला सुनाती है। उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वालों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। इंदिरा गांधी भी आपातकाल के दौरान तानाशाही पर उतरी थीं लेकिन वह उस स्तर तक नहीं गई थीं जिस स्तर पर आज मोदी सरकार उतर चुकी है। वह लगातार चुनावों में हारती क्यों जा रही है। संघ के गढ़ नागपुर में उसे जिला परिषद के चुनाव में क्यों पराजय का मुंह देखना पड़ा। उसे इन बातों पर एक बार आत्ममंथन जरूर करना चाहिए। नरेंद्र मोदी की सरकार जो कुछ कर रही है लोगोंने उसके लिए उसे सर आंखों पर नहीं बिठाया था। सरकार को समझना चाहे कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है। उससे लड़कर आजतक कोई जीत सका है न जीत सकेगा।  

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