अब निर्णायक मोड़ पर किसान आंदोलन

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

किसानों और केंद्र सरकार के बीच पांचवें चक्र की वार्ता भी बेनतीजा रही। सरकार ने तीन कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव दिया लेकिन किसान नेता इसके लिए तैयार नहीं हैं। वे इनकी पूरी तरह वापसी पर अड़े रहे। अब 9 दिसंबर को छठे चक्र की वार्ता के लिए समय निर्धारित किया गया है। इस बीच किसानों के जमावड़े वाले बार्डरों पर सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है। बैरिकेट मजबूत कर दिए गए हैं और सरकार बच्चों तथा बुजुर्गों को वापस भेजने का निर्देश दे रही है। साथ ही कोरोना के फैलने की आशंका को लेकर जांच का प्रस्ताव भी दे रही है। अभी तक तीन लाख से अधिक किसानों के दिल्ली पहुंचने का अनुमान है। इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। उन्होंने दिल्ली के सभी बॉर्डरों को जाम करने का एलान कर दिया है।

सरकार कृषि कानूनों को किसी कीमत पर वापस लेने को तैयार नहीं है और किसान संशोधन के लिए तैयार नहीं हैं। इधर दिल्ली का जनजीवन अस्त-व्यस्त होता जा रहा है। आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो गई है। सरकार दिल्ली के बार्डरों को लंबे समय तक सील नहीं रख सकती। जाहिर है कि वह समझा-बुझाकर अथवा बल प्रयोग के जरिए किसानों को वापस भेजने का प्रयास करेगी। बच्चों और बुजुर्गों को इसीलिए वापस भेजने को कह रही है। युवाओं पर बल प्रयोग करने में उसे विशेष दिक्कत नहीं होगी। अगर सरकार के बल प्रयोग के जवाब में किसान हिंसा का रास्ता पकड़ेंगे तो सरकार को दमन करने का और अच्छा बहाना मिल जाएगा। अभी सरकार का कहना है कि किसानों की भीड़ में देशविरोधी तत्व घुसे हुए हैं। जाहिर है कि सरकार की खुफिया एजेंसियों के लोग भी भीड़ में घुसकर उनकी शिनाख्त कर रहे हैं। किसान नेताओं का भी मानना है कि उनके बीच संघ और अन्य ताकतें प्रवेश कर आंदोलन को हिंसक बनाने का प्रयास कर सकती हैं। वे किसानों को ऐसे तत्वों से सतर्क रहने को कह रहे हैं। सच क्या है यह जल्द ही सामने आ जाएगा। लेकिन मोदी सरकार इस बात के प्रति निश्चिंत है कि किसान आंदोलन का उसके वोट बैंक पर कोई असर नहीं पड़ेगा। ग्रेटर हैदराबाद मयुनिसिपल कॉर्पोरेशन के चुनावी नतीजों के बाद उसे इतना भरोसा हो गया है कि चाहे कोई भी चुनाव हो हिंदू-मुसलिम कार्ड के जरिए वह वोट हासिल कर ही लेगी। तेलंगाना को केंद्र सरकार से कोई सहायता नहीं मिली। हैदराबाद की बाढ़ में सरकार ने कोई सहायता नहीं दी। इसके बावजूद से भाग्यनगर के नाम पर 48 सीटें मिल गईं तो इसका सीधा मतलब है कि ध्रुवीकरण की राजनीति उसके लिए फलदायक है और आगे भी रहेगी। उसे पूरी उम्मीद है कि अगले साल जब पश्चिम बंगाल में चुनाव होंगे तो ओवैसी की पार्टी की मौजूदगी ही ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तेज़ कर देगी और वोटों का बड़ा हिस्सा सांप्रदायिकता के प्रवाह में आकर ओवैसी और मोदी के नाम पर बंट जाएंगे। तृणमूल का क्षेत्रीयतावाद धरा का धरा रह जाएगा। विपक्षी दलों के पास फिलहाल धार्मिक विभाजन की कोई काट नहीं है।

यही कारण है कि भाजपा को किसी आंदोलन और किसी विरोध की कोई परवाह नहीं है। किसानों को तीन कृषि सुधार पसंद आएं या न आएं सरकार इन्हें लागू करके मानेगी। आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा भले ही कृषि से जुड़ा हो लेकिन पहली बात तो यह है कि अखिल भारतीय स्तर पर न तो किसानों का कोई साझा प्लेटफार्म है न कोई सर्वमान्य नेता। असंगठित होने के कारण वे कोई मजबूत वोट बैंक नहीं बन सके हैं। इसलिए सत्ता पर बड़ा दबाव बनाने की स्थिति में नहीं हैं। फिलहाल वे बड़े पैमाने पर चुनाव जिताने और हराने की ताकत नहीं रखते। इसलिए भी राजनीतिक दलों के लिए वे चिंता का विषय नहीं बन पाते। दूसरी बात यह कि किसानों के अंदर धार्मिक आस्था की जड़ें गैरकृषि क्षेत्रों के लोगों से कहीं ज्यादा गहरी हैं। भाजपा को पता है कि अभी किसान लाख मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने का संकल्प लें लेकिन जबतक अगले चुनाव आएंगे तबतक यह मामला ठंढा पड़ चुका होगा और हिन्दुत्व तथा राष्ट्रवाद के नाम पर यही किसान भाजपा को वोट देंगे। उसकी सत्ता पर कोई खतरा आनेवाला नहीं है।

किसान एमएसपी की गारंटी के लिए अलग कानून चाहते हैं। कानून बन जाने से भी क्या होगा। अभी एमएसपी पर मुश्किल से 5 प्रतिशत सरकारी खरीद होती है। कानून बन भी जाए तो बाजार के खिलाफ किसान कितने समय तक कानूनी लड़ाई लड़ सकेंगे। व्यापारी के पास पैसा है। वह अपना व्यवसाय जारी रखते हुए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ सकता है। जबकि छोटे किसानों को कोर्ट-कचहरी करने के लिए खेती छोड़ देनी होगी और उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि लंबी लड़ाई लड़ सके। वह छोटे-छोटे व्यापारियों से नहीं लड़ सकता। पूरी शासन प्रणाली पर पकड़ रखने वाले बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों से लड़ना तो उसके वश की बात ही नहीं है। सरकार कृषि क्षेत्र का कार्पोरेटीकरण करना चाहती है तो मौजूदा स्थिति में आराम से कर लेगी। उसे कोई रोक नहीं सकेगा।

मोदी सरकार कोई पहली सरकार नहीं है जिसे किसानों के गुस्से से कोई फर्क नहीं पड़ता, आजादी के बाद की किसी सरकार ने कभी किसानों की कोई परवाह नहीं की है। जो कानून मोदी सरकार लेकर आई है अगर कांग्रेस सत्ता में होती तो वह भी यही काम करती। कई नीतियां अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं अथवा कार्पोरेट के दबाव में तय की जाती हैं। सत्ता में बैठे लोगों को उन्हें लागू करना होता है। मोदी सरकार के कई आर्थिक फैसले नुकसानदेह साबित हुए हैं लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि वह अर्थव्यवस्था को एक खास दिशा की ओर ले जाने का प्रयास कर रही है। जबतक वह अर्थव्यवस्था में अपने सारे प्रयोग कर नहीं लेती तबतक इसके फायदे और नुकसान के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती। फिलहाल किसानों का आंदोलन क्या रूप लेगा और मोदी सरकार पर कितना प्रभाव डाल सकेगा कहना मुश्किल है।

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