व्यक्तिवाद के चक्रव्यूह में संसदीय लोकतंत्र

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

मौजूदा समय में जब एक-एक कर सारी संवैधानिक संस्थाएं सत्ता के हाथों की कठपुतली बनती जा रही हैं, हम  गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। एक औपचारिकता है जिसे पूरी कर रहे हैं। आज सीबीआई, ईडी और आयकर जैसे विभाग सिर्फ राजनैतिक विरोधियों को हड़काने और निपटाने का हथियार बन चुके हैं। चुनाव आयोग का वर्ताव सत्तापक्ष के लिए अलग है और विपक्षी दलों के लिए अलग। चुनाव आचार संहिता की धाराएं सत्ता के पास आकर विलीन हो जाती हैं और विपक्षी उम्मीदवारों के पास आते ही उग्र रूप धारण कर लेती हैं। न्यापालिका की निष्पक्षता पर भी सवालिया निशान लगने लगे हैं। संघीय ढांचा टूट चला है। विपक्षी दलों के नेतृत्व वाली सरकारें हमेशा भयभीत रहती हैं कि केंद्र सरकार पता नहीं कब उसके विधायकों को खरीदकर सरकार गिरा दें। ठीक उसी तरह का माहौल बन चुका है जैसा मध्ययुग में हुआ करता था। एक राजा दूसरे राजा पर चढ़ाई कर से जबरन अपने अधीन कर लेता था। ठीक उसी तरह का परिदृश्य आज भी देखना पड़ रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब सेना का इस्तेमाल किया जाता था अब उसकी जगह नोटों से भरी थैलियों का इस्तेमाल किया जाता है। बिहार में पोस्टल वोटों का कमाल सबने देखा। कम वोटों के अंतर की जीत को हार में जबरन बदल दिया गया। जीती हुई पार्टी विपक्ष बन गई और हारी हुई पार्टी ने धड़ल्ले से सरकार बना ली। कोई कुछ नहीं कर पाया। अब वही खेल पश्चिम बंगाल में दुहराने की तैयारी हो रही है।

लोकतंत्र की व्यवस्था अब जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिए नहीं रही। वह चंद लोगों की बपौती बनकर रह गई है। न कोई बोलने वाला है, न सुनने वाला। साहब अचानक रात के 8 बजे टीवी पर अवतरित होते हैं और फरमान सुना देते हैं कि आज रात के 12 बजे से हजार और पांच सौ के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे या आज रात 12 बजे से 21 दिनों के लिए पूरे देश में तालाबंदी रहेगी। कोई घर से नहीं निकलेगा। अब कौन कहां फंसा हुआ है,,,वह चार घंटे के अंदर अपने ठिकाने पर पहुंच सकता है या नहीं। सरकार को इससे कुछ भी नहीं लेना-देना। कमाल यह है कि 2014 के बाद सरकार ने जितने फैसले किए वो देश के लिए घातक साबित हुए लेकिन कोई इसके खिलाफ बोल भी नहीं सकता। बोला तो सीधे देशद्रोही करार दिया जाएगा। उसे जेल की हवा खानी पड़ेगी। सरकार की निजी सेना उसे पार्थीव शरीर से मुक्ति भी दिला सकती ङै।

अब सरकार ने तीन कृषि सुधार कानून बनाकर कृषि क्षेत्र को अपने कार्पोरेट जगत के मित्रों के हवाले करने का फैसला ले चुकी है। कहती है ये किसानों के भले के लिए है। कैसे है, इसकी कोई व्याख्या नहीं है। बस कह दिया कि है तो मान लीजिए कि है। अब हालत यह है कि तीन महीने से किसान लाखों की संख्या में दिल्ली की सभी सीमाएं घेरकर शांति के साथ बैठे हैं। सरकार उनसे 10 चक्र की वार्ता कर चुकी है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला है। सरकार उनमें संशोधन के लिए तैयार है लेकिन किसान उनकी वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी के कानून की मांग पर अड़े हुए हैं। उनका साफ कहना है कि जबतक कानून रद्द नहीं होंगे उनका आंदोलन जारी रहेगा। सरकार उन्हें रद्द करने के पक्ष में नहीं है। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है।

अब कानून बनाने की प्रक्रिया भी बदल चुकी है। पहले इसके संबंध में विधेयक तैयार किया जाता था। उसे सदन के पटल पर रखा जाता था। उसपर स्त्तापक्ष और विपक्ष के बीच चर्चा होती थी, इसके बाद वोटिंग होती थी। इसके बाद उसे उच्च सदन में लाया जाता था। फिर बहुमत से पारित कराकर राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए जाता था। अब इसकी की जरूरत नहीं। सरकार एक अध्यादेश लाती है। आपातकालीन सत्र बुलाया जाता है और उसे जबरन पारित करा लिया जाता है। कृषि कानूनों को लोकसभा में जहां सत्तापक्ष की बहुमत थी बिना बहस और वोटिंग के उन्हें पारित करा लिया। राज्यसभा में बहुमत कम था तो शोर मचाकर ध्वनि मत से पारित करा लिया गया।

किसान संगठनों के साथ वार्ता के दौरान केंद्र सरकार के मंत्रियों ने स्वीकार किया कि इसमें बहुत सारी खामियां हैं। मंत्रियों ने उसे पढ़ा भी नहीं था। कुछ लोगों का मानना है उनका ड्राफ्ट सरकारी अफसरों या नेताओं ने नहीं बल्कि कार्पोरेट के मित्रों के आफिस में तैयार किया गया था। मित्र पहले ही इसका लाभ उठाने की तैयारी कर चुके थे। कानून बनने के एक साल पहले ही गौतम अडानी ने भंडारण गृहों का विस्तार शुरू कर दिया था और मुकेश अंबानी रिटेल चेन तैयार करने में लग गए थे। इनमें हजारों करोड़ का निवेश भी किया जा चुका था। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि इन्हें पारित करने में कोई अड़चन नहीं आएगी। इसका सीधा लाभ उनकी झोली में आएगा। अब उनका भारी भरकम निवेश कराने के बाद सरकार कानून वापस ले तो कैसे। कृषि मंत्री की ज़ुबान फिसलने से यह बात सामने गई कि सरकार को कार्पोरेट की चिंता ज्यादा है। किसान इतनी लंबी लड़ाई लड़ेंगे किसी ने सोचा नहीं था। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बहाने डेढ़ साल तक कानून स्थगित करने का प्रस्ताव दिया। किसानों ने उसे नामंजूर कर दिया। मामला अभी भी उलझा हुआ है।

भारतीय संविधान की धड़ल्ले से अवहेलना की जा रही है तो इसका कारण है। अभी भाजपा की सरकार है। इसकी मातृ संस्था आरएसएस है। आरएसएस भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है। भाजपा उसी एजेंडे पर काम कर रही है। हमारा संविधान धर्म निरपेक्षता अथवा सर्वधर्म समभाव की अवधारणा पर आधारित है। इसमें धर्म आधारित सत्ता का कोई प्रावधान नहीं है। संभवतः इसीलिए संविधान को लगातार कमजोर किया जा रहा है। अगर भाजपा अपने एजेंडे में सफल रहती है तो कोई आश्चर्य नहीं कि वह नई संविधान सभा गठित करे और नया संविधान बनाए जो धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए फांसी के फंदे के समान हो। धर्म निरपेक्ष लोग तो अभी से गद्दार, पाकिस्तान परस्त आदि तमगों से नवाज़े जा चुके हैं। जो जितना सांप्रदायिक होगा उसे उतना ही बड़ा देशभक्त माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद बाजपा ने राम मंदिर का शिलान्यास कराया। उसमें किसी शंकराचार्य को नहीं बुलाया गया। साधुओं के किसी अखाड़े से बात नहीं की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कुछेक सहयोगियों के साथ मिलकर शिलान्यास करा लिया। अब हिंदू समाज के सम्मानित लोगों में शंकराचार्यों की कोई भूमिका नहीं रह गई। जो सत्ता में है वही शंकराचार्य है। वही धर्म का रक्षक है। वही भगवान है। सचमुच हमारा भारत महान है।

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