जनआस्था का राजनीतिकरण गलतः सुबोधकांत सहाय

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नब्बे के दशक में जब राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था उन दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय देश के गृहमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री थे। उन्होंने इस आंदोलन के दौरान दोनों पक्षों के बीच समन्वय कायम करने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने राजीव गांधी, चंद्रशेखर, वीपी सिंह और नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में किए गए प्रयासों का जिक्र करते हुए कहा कि बावरी मस्जिद ढांचे का टूटना एक दुर्भाग्य पूर्ण घटना थी। उनका कहना है कि यह घटना नहीं भी होती तो विभिन्न पक्षों के बीच बातचीत के जरिए रास्ता निकल सकता था। वे उस दौर को याद करते हुए कहते हैं कि मुसलिम संप्रदाय में बहुत से लोग इस पक्ष में थे कि राम का मंदिर बने और वहीं बने जहां उनका जन्म हुआ था।

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

श्री सहाय के मुताबिक राम मंदिर के लिए भूमि पूजन हो रहा है, इसका स्वागत करना चाहिए। लेकिन राम को राजनीति का विषय नहीं बनाना चाहिए। सरकार का काम धर्मस्थलों का संचालन करना नहीं होता। यह जिम्मेदारी ट्रस्ट के लोगों के हाथ में रहने देना चाहिए। राम हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक हैं। उन्हें सिर्फ उनकी आस्था का प्रतीक रहने देना चाहिए। भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है। इसके धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बनाए रखना चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल को इसे वोटों की राजनीति का माध्यम नहीं बनाना चाहिए।

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