रिया को भी अपनी बात कहने का अधिकार

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

लेकिन सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच के मामले में मीडिया की जांच सीबीआई से भी आगे चल रही है। रिया चक्रवर्ती को सीबीआई ने कितने बजे कहां बुलाया। कितने घंटों तक पूछताछ की। क्या-क्या सवाल किए। अभी तक किस-किस से पूछताछ हुई। ड्रग माफिया से लेकर अंडरवर्ल्ड तक की इसमें क्या भूमिका है। सबकुछ पूरे दिन के लिए खबरिया चैनलों के लिए मसाला बन रहा है। पूरे दो महीने से यह मामला सारे मुद्दों को पीछे धकेल चुका है। यह चैनलों की टीआरपी के लिए हॉट केक बना हुआ है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा गोदी मीडिया बना हुआ है और सत्तातंत्र कहीं न कहीं सुशांत मामले को सुर्खियों में रखना चाहता है। महाराष्ट्र और बिहार की राजनीति को इस मुद्दे की जरूरत है। बिहार में चुनाव और महाराष्ट्र में आदित्य ठाकरे को कटघरे में लाकर उद्धव ठाकरे को चुनौती देना राजनीति की जरूरत है।

टीवी मीडिया को देश में जनहित के गंभीर मुद्दों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। उन पर बहस कराने की कोई जरूरत नहीं है। अधिकांश चैनल सरकार के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। निषपक्षता से भी उनका कुछ लेना-देना नहीं है। रिया चक्रवर्ती ने देश के तीन सबसे बड़े न्यूज चैनलों को इंटरव्यू दिया और पहली बार अपना पक्ष साफ-साफ शब्दों में रखा तो सत्ता समर्थकों ने सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर दिया। साक्षात्कार लेने वाले पत्रकार और चैनलों पर रिश्वत लेने का आरोप मढ़ा जाने लगा। सीबीआई की जांच के नतीजे और कोर्ट का फैसला आने के पहले ही उसे हत्या का अभियुक्त करार दे दिया गया। 28 अगस्त को सीबीआई के सामने पेशी के पहले रिया ने दो अंग्रेजी चैनलों और एक हिंदी चैनल को इंटरव्यू दिया। पिछले दो महीनों से टीवी पर रिया के खिलाफ तरह-तरह के इल्जाम लगाए जा रहे हैं। उन्होंने सबसे लंबा इंटरव्यू हिंदी चैनल को दिया जिसके बाद उनके समर्थन में भी ट्विटर पर लोग उतर आए और कहा कि रिया को भी अपनी बात रखने का अधिकार है।

भारत में लंबे समय बाद इतने हाई प्रोफाइल क्राइम केस पर मीडिया में इतना बवाल मचा हुआ है। इससे पहले आरुषि तलवार-हेमराज हत्याकांड, नोएडा का निठारी कांड, निर्भया रेप और बलात्कार कांड, दिल्ली के एक परिवार की सामूहिक खुदकुशी के मामले ने भी खूब सुर्खियां बटोरी। लेकिन सुशांत सिंह का मामला इन सबसे ज्यादा सुर्ख हो गया क्योंकि इसमें राजनीति का एंगल जुड़ गया। यह मामला बॉलीवुड से जुड़ा है। इसमें पैसा है, ड्रग्स है। अंडरवर्ल्ड है। भाई-भतीजावाद है। रिया ने तीनों चैनलों को दिए इंटरव्यू में अपने आपको बेकसूर साबित करने की कोशिश की।

जब उनसे पूछा गया कि अब इतने दिनों बाद वो सामने क्यों आई है तो उन्होंने कहा कि क्योंकि मुझे अपनी कहानी बतानी थी। फेसबुक, व्हाट्सऐप चैट आदि की एकतरफा कहानी ने मेरे लिए सब कुछ बर्बाद कर दिया। यह मेरी अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी है।

पत्रकारिता का पहला उसूल है कि समाचार में सभी पक्षों की बात रखी जाए और समाचार में विचारों का घालमेल न किया जाए। सूचना को विशुद्ध रूप से सूचना रहने दिया जाए। विचारों के लिए लेख कॉलम आदि विधाएं हैं। लेकिन इस दौर का मीडिया पुलिस और अदालत की भूमिका में आ चुका है और समाचार में अपने विचारों का मिश्रण कर इसे चटखारेदार बनाता है। निष्पक्ष पत्रकारिता का दौर पूरी तरह खत्म हो चुका है। सच को सामने लाना अब मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है। उसे सिर्फ टीआरपी चाहिए। सत्ता के गलियारे में पैठ चाहिए। ताकि लाइजेनिंग का रास्ता बना रहे। तीन चैनलों को रिया द्वारा इंटरव्यू दिए जाने का विरोध सुशांत के परिवार और उनके वकील ने किया है। सुशांत के परिजनों को अपनी बात कहने का अधिकार है। जबसे मामला चल रहा है मीडिया में उन्हीं की बात आ भी रही है। लेकिन रिया के मुंह पर पट्टी नहीं बांधा जा सकता। लोकतंत्र में उसे भी अपना पक्ष रखने का उतना ही अधिकार है जितना उसपर आरोप लगाने वालों का। रिया ने अपनी बात कह दी तो क्या हो गया। जांच एजेंसियों को किसी पक्ष के तर्क प्रभावित नहीं कर सकते। अदालत की कार्रवाई एकतरफा नहीं होती। आम जनता दोनों पक्ष के तर्क सुनने के बाद ही अपनी राय बनाती है। अगर एकतरफा कार्रवाई करनी है तो जांच पड़ताल की जरूरत ही क्या है। मीडिया सज़ा सुनाए और रिया चक्रवर्ती को सीधे फांसी पर चढ़ा दे। परिजनों का आरोप है कि यह मीडिया पब्लिसिटी है। सवाल है कि एक पक्ष दो महीने से अपनी बातें कह रहा है तो वह मीडिया पब्लिसिटी नहीं है और रिया ने तीन चैनलों पर अपनी बात कह दी तो मीडिया पब्लिसिटी हो गई। न्यायपालिका किसी के चाह लेने से फांसी की सज़ा नहीं सुनाता। जांच रिपोर्ट में दोषी पाए जाने के बाद भी न्यायपालिका आरोपी को निर्दोष साबित करने के लिए पर्याप्त अवसर देता है। अदालत भावनाओं के आधार पर नहीं तथ्यों के आधार पर फैसला सुनाता है। यही निष्पक्ष न्याय प्रमाली का तकाज़ा है। सुशांत के मामले में अनावश्यक रूप से भावुकता की लहर पैदा करने की कोशिश की जा रही है। मीडिया इसका मंच बना हुआ है।

सुशांत सिंह की मौत के बाद पहली बार 28 अप्रैल को सीबीआई ने रिया से पूछताछ की। सुप्रीम कोर्ट ने 19 अगस्त को सुशांत सिंह केस की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया था। अब सीबीआई, ईडी और नार्कोटिक्स विभाग अलग-अलग एंगल से जांच कर रहा है। फिलहाल सीबीआई रिया और सुशांत के करीबी लोगों से इस केस की पूछताछ कर रही है और मौत की असली वजह जानने की कोशिश कर रही है। सुशांत सिंह राजपूत अपने मुंबई स्थित मकान में 14 जून को मृत पाए गए थे। बाद में पुलिस ने कहा था कि उन्होंने खुदकुशी कर ली है। हालांकि परिवार का आरोप है कि सुशांत की हत्या हुई है। सुशांत ने कोई सुसाइड नोट नहीं लिखा था। इससे हत्या भी हो सकती है लेकिन यह आत्महत्या का मामला है या हत्या का इसके लिए जांच एजेंसियों के निष्कर्ष का इंतजार करना चाहिए। लेकिन मीडिया और भाजपा समर्थकों ने रिया चक्रवर्ती को अभी से खलनायिका बना दिया है। यह निष्पक्ष न्याय प्रणाली की अवहेलना है। भारतीय संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्याय प्रणाली के लिए यह हितकर नहीं है।

 

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