शरद पवार की प्रतिष्ठा दांव पर

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देवेंद्र गौतम

महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे में एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार की प्रतिष्ठा पूरी तरह दांव पर लगी है। उनके भतीजे अजीत पवार ने उनकी पीठ में ऐसा छुरा घोंपा है कि वे न उफ कर सकते हैं न ओह। सियासी हल्कों में शरद पवार की भूमिका पर भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है। ऐसा संदेह व्यक्त किया जा रहा कि अजीत पवार ने उनकी सलाह पर भाजपा से हाथ मिलाया है। असली डील पीएम मोदी और शरद पवार के बीच पहले ही हो चुकी है। मोदी के साथ उनकी मुलाकात को लेकर यह कयास लगाया जा रहा है। लेकिन सवाल उटता है कि यदि शरद पवार भाजपा के साथ डील करना चाहते तो उन्हें इससे कौन रोक सकता था। उन्हें दो नावों की सवारी करने की कोई विवशता नहीं थी। गुपचुप डील करने की कोई जरूरत नहीं थी।

फडणवीस क सरकार बनानी होती तो वे कांग्रेस और शिवसेना के साथ गठबंधन पर बातचीत क्यों करते। शिवसेना के साथ कांग्रेस को समर्थन के लिए तैयार करने में शरद पवार की बड़ी भूमिका रही। काफी मशक्कत के बाद तीनों पार्टियों के बीच गठबंधन का फार्मूला तैयार हुआ। सहमति बनी। सरकार बनाने की पूरी तैयारी के बाद अचानक रातोंरात पासा पलटा कैसे। अजीत पवार ने देवेंद्र फडणवीस के साथ शपथ ग्रहण तो कर लिया लेकिन एनसीपी विधायकों के बड़े हिस्से को अपने पक्ष में नहीं कर पाए। अधिकांश लोग शरद पवार के पास लौट आए। सत्ता के मोह अथवा जांच एजेंसियों के भय से अजीत भाजपा के जाल में बुरी तरह फंस गए। उनके पास एकमात्र तुरूप का पत्ता विधायक दल का नेता होना है। दूसरी बात मोदी और शाह का साथ। सत्ता का संरक्षण।

लेकिन शरद पवार पार्टी के अध्यक्ष हैं। उनके पत्र के बिना फडणवीस सरकार को एनसीपी का समर्थन मान्य नहीं हो सकता। उन्होंने अजीत को विधायक दल के नेता पद से भी बर्खास्त कर दिया है और विधायकों की सहमति से नया नेता चुन लिया है। अजीत पवार ने इसके बाद स्वयं के एनसीपी में होने और शरद पवार के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करने का नया दांव खेला है जिसे शरद पवार ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। स्थिति ऐसी बन गई है कि या तो शरद पवार की जीवन भर की साख मिट्टी में मिल जाएगी या फिर अजीत पवार राजनीति के हाशिये में चले जाएंगे। शरद पवार मंझे हुए नेता हैं उनकी चाल को समझना कठिन रहा है लेकिन उन्होंने कभी वादा-खिलाफी या दगाबाजी की राजनीति नहीं की है।

शरद पवार अपने राजनीतिक जीवन की अंतिम पाली खेल रहे हैं। उनके समक्ष समस्या अपना उत्तराधिकार सौंपने की है। वे अपना उत्तराधिकार बेटी सुप्रिय सुले को सौंपें या भतीजे अजीत पवार को। जाहिर है कि बेटी भतीजे से ज्यादा अजीज़ होती है। यदि यह मैच फिक्सिंग नहीं है तो अपना अधिकार हाथ से निकलते देख ही अजीत पवार ने बगावत का रास्ता चुना होगा। यदि चाचा के मश्विरे के बिना उन्होंने यह कदम उठाया है तो वे उत्तराधिकारी बनने की पात्रता खो चुके हैं। अगर वे दल-बदल के दायरे में आ गए तो उनके राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। उनका कद अभी इतना बड़ा नहीं हुआ है कि शरद पवार को चुनौती दे सकें।

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