अंधेरी सुरंग में बढ़ते कदम

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

2014 के बाद व्यवस्था में जो बदलाव लाए गए उनकी या तो अतिरंजित प्रशंसा की जा रही है या फिर पूर्वाग्रह जनित आलोचना। उनकी समीक्षा नहीं के बराबर की जा रही है। तराजू का कोई एक पलड़ा जबरन झुकाया हुआ रहता है। इस बदलाव को इसकी खामियों को, इसकी खूबियों को समझने की जरूरत है।

लाख राष्ट्रवाद की दुहाई दी जाए, देशभक्ति के दावे किए जाएं, भारतीय संस्कृति की बात की जाए, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि जो बदलाव आ रहे हैं वह भारत की मिट्टी की उपज नहीं हैं। उन्हें यूरोप और अमेरिका से आयात किया जा रहा है। ठीक उसी तरह जैसे 60 के दशक में कनाडा से हरित क्रांति का आयात किया गया था। जिसके तात्कालिक परिणाम तो बेहद सुखद थे लेकिन दूरगामी परिणाम दुःखद।

आर्थिक विकास की बात करें तो महात्मा गांधी की ग्राम आधारित विकेंद्रित अर्थव्यवस्था की परिकल्पना को दरकिनार कर आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू ने मिश्रित अर्थ व्यवस्था का प्रयोग किया था। अर्थात निजी और सार्वजनिक क्षेत्र को एक साथ पनपने का मौका देना। यह दुनिया का अपने ढंग का पहला प्रयोग था। दुनिया के कुछ देश निजी क्षेत्र को बढ़ावा देते हैं तो कुछ सार्वजनिक क्षेत्र को। हालांकि दोनों पूंजी के केंद्रीकरण के मॉल हैं। एक पूंजी को राजसत्ता के हाथों में केंद्रित करता है तो दूसरा कुछ घरानों की तिजोरी में समेट देता है। आम आदमी तक उसका एक छोटा सा अंश ही पहुंच पाता है। जीवनयापन भर या उससे भी कम। 90 के दशक के बाद वैश्वीकरण के तहत निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की नीति अपनाई गई। 2014 तक उसकी गति धीमी थी। मोदी सरकार ने उसकी गति तेज़ कर दी। इसे देश को बेचने के रूप में देख गया। यह आर्थिक विकास का पश्चिमी मॉडल है। इसके नतीजे सुखद होते यदि निजी क्षेत्र की सभी कंपनियों को समान रूप से भागीदारी का मौका मिलता। देश में उद्यमशीलता का विकास होता। लेकिन गड़बड़ी यह हुई कि सरकार ने औद्योगिक विकास का जिम्मा कुछ करीबी उद्योगपतियों को सौंप दिया। सारी राष्ट्रीय पूंजी उनके खाते में जमा होने लगी। मुकेश अंबानी की पूंजी प्रति मिनट 4 करोड़ की रफ्तार से बढ़ रही है जबकि 80 करोड़ की आबादी प्रतिमाह पांच किलो अनाज के सरकारी अनुदान पर आश्रित है। कमाल तो यह है कि यह अनुदान आत्मनिर्भरता के आह्वान का हिस्सा है। आत्मनिर्भरता तो तब आती जब ये 80 करोड़ लोग अपने श्रम के जरिए अपने जीवन को बेहतर बनाने की कला से दीक्षित हो पाते। उन्हें अपने पांवों पर खड़ा करने की जगह परजीवी बनाया जा रहा है। जिन पूंजीपतियों पर नए भारत की अर्थव्यवस्था को रचने की जिम्मेदारी है वे इस मौके का लाभ उठाते हुए सिर्फ अपनी पूंजी का आकार बढ़ाने में लगे हैं। उन्हें युवा वर्ग को नियोजन देने की चिंता नहीं है। गरीबी मिटाने या शिक्षा को सर्वसुलभ कराने की फिक्र नहीं हैं। सिर्फ दोनों हाथ नोट बटोरने की चिंता है।

व्यवस्था परिवर्तन की इस चक्की में सबसे ज्यादा पिस रहा है मध्यम वर्ग लेकिन उसके मन-मस्तिष्क पर सांप्रदायिकता इस कदर हावी है कि उसे न अपना वर्तमान नज़र आ रहा है न भविष्य। वह शिक्षित है लेकिन शब्दों के महाजाल में फंसा हुआ है। भ्रमित है। उसे यह समझ नहीं आ रहा है कि इस व्यवस्था में उसकी कोई हैसियत क्या है। उसे सिर्फ कर-दोहन की मशीन बनाकर रखा गया है। वह इसी बात से खुश है कि एक समुदाय को उसकी औकात बताई जा रही है। इस खुशी के लिए वह किसी हद तक जाने को तैयार है।

यह सरकार अपने को परम राष्ट्रभक्त और अपने तमाम आलोचकों को देशद्रोही मानती है। यदि उसमें भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था होती तो वह सबसे पहले ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने का प्रयास करती। कुटीर उद्योगों का विस्तार करती। किसानों को प्रतिवर्ष छह हजार की सम्मान राशि खाते में देने की जगह कुटीर उद्योग लगाने की प्रेरणा और आवश्यक मशीनें देती। लेकिन वह समानता पर आधारित समाज बनाने की जगह एक असमान सामाजिक ढांचा तैयार कर रही है। जिसमें एक तरफ अडानी-अंबानी, बाबा रामदेव जैसे दो-तीन लोग हैं और दूसरी तरफ पांच किलो अनाज की खैरात पाने वाले 80 करोड़ बीपीएल। उन्हें काम नहीं, बिना काम के अनाज दिया जा रहा है। एक तरफ खरबों की ड्रग तस्करी करने वाले गिरोह हैं तो दूसरी तरफ गांजे की एक पुड़िया बरामद होने पर जेल की हवा खाने वाले लोग भी मौजूद हैं। यही नया भारत है। यह आयातित व्यवस्था देश और समाज को एक अंधेरी सुरंग में लेती चली जा रही है। सुरंग के दूसरे सिरे में क्या है, किसी को पता नहीं है।

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