श्रमिकों के पलायन को रोकना समय की मांग

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

एक तरफ प्रवासी मजदूर अपने गृह प्रदेशों की ओर वापस लौटने के बेचैन हैं दूसरी तरफ नियोक्ता राज्य उन्हें समझा-बुझाकर रोकने का प्रयास कर रहे हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने मजदूरों को कोकने की पूरी कोशिश की। लेकिन गलत तरीका इस्तेमाल किया। तेलंगाना की चावल मिलों को शुरू करने के लिए बिहार के 1080 मजदूर विशेष ट्रेन से वापस बुलाए गए। तेलंगाना सरकार ने बिहार सरकार से उन्हें भेजने का अनुरोध किया। बिहार सरकार ने मजदूरों की स्वीकृति ली इसके बाद उन्हें वापस भेजा। वे होली के समय घर आए थे और लॉकडाउन में फंस गए थे। हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश गोवा आदि राज्य प्रवासी मजदूरों को रोकने के प्रयास में हैं। लॉकडाउन-3 में छूट के बाद निर्माण उद्योग और कल-कारखानों को चलाने के लिए उनकी जरूरत है। यह पहला मौका है जब नियोक्ता राज्यों को अर्थ व्यवस्था को गति देने में प्रवासी मजदूरों की भूमिका और अहमियत समझ में आई है। अभी तक उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता था। अब उन्हें मजदूरों को इतनी सुविधा और इतना मेहनताना देना चाहिए कि किसी भी संकटकाल को झेल सकें। उन्हें जिन परेशानियों से गुजरना पड़ा उसकी पुनरावृत्ति न हो। अभी तक बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, प. बंगाल, मध्य प्रदेश और ओड़ीशा जैसे राज्य पूरे देश को श्रमबल की आपूर्ति करते रहे हैं। वहां की सरकारों ने कभी श्रमिकों के पलायन को रोकने की कोशिश नहीं की। श्रमिकों का पलायन उनकी विवशता बनी रही। अब राज्य सरकारें पलायन की विवशता को खत्म करने पर विचार कर रही हैं। यदि ऐसा हा तो प्रवास में मजदूर जाएंगे भी तो शौक से अपनी शर्तों पर। जानवरों की तरह ज़िंदगी बिताने के लिए कत्तई नहीं जाएंगे।

उत्तर प्रदेश और झारखंड इन दो राज्यों के मुख्यमंत्री वापस लौट रहे प्रवासी मजदूरों को उनके घर के पास रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में गंभीरता से काम कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो बाजाप्ता कुशल और अकुशल मजदूरों की सूची बनाकर उनकी विशेषज्ञता के आधार पर काम दिलाने के लिए विशेषज्ञों की एक अलग टीम बना दी है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी लाह अनुसंधान केंद्र को पुनर्जीवित कर लाह उद्योग के जरिए श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराने के अलावा झारक्राफ्ट, खादी मिशन, आदि के सहयोग से कुटीर उद्योगों के जरिए रोजगार सृजन के प्रयास में लगे हैं। मत्स्य पालन, पशुपालन आदि विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। उन्होंने भी इसके लिए विशेषज्ञ अधिकारियों का एक पैनल गठित किया है। श्री सोरेन ने संकल्प लिया है कि श्रमिकों के पलायन पर रोक लगाएंगे। काम के लिए दूसरे प्रदेशों में जाने की विवशता खत्म कर देंगे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस संबंध में कुछ सोच रहे हैं या नहीं अभी तक इसकी कोई सूचना नहीं है। वे मजदूरों की घर वापसी के ही खिलाफ थे। काफी फजीहत और आलोचना के बाद वे इसके लिए तैयार हुए। उनके अंदर रोजगार सृजन की इच्छाशक्ति का पूरी तरह अभाव दिख रहा है। वे चाहेंगे कि मजदूर जिस तरह घर लौटे उसी तरह प्रवास पर वापस लौट जाएं। बिहार एक कृषि प्रधान देश है। यहां कृषि आधारित उद्योगों के विकास की पर्याप्त गुंजाइश है। कुटीर उद्योगों का विस्तार किया जा सकता है। लेकिन जब नेतृत्व ही अपंग हो तो कुछ नहीं हो सकता।

दरअसल यह फुटपाथी और खुदरा बाजार पर चीन के वर्चस्व को समाप्त कर देसी कुटीर उद्योगों के उत्पाद से भर देने का समय है। चीन से उपभोक्ताओं का विश्वास उठ चुका है। उसकी साख खत्म हो चुकी है। कुटीर उद्योगों के विकास के जरिए पूंजी का विकेंद्रीकरण कोरोना काल की मांग है। इसे समझने और इसपर अमल करने की जरूरत है। जो नेतृत्व समय की आवाज़ को नहीं सुन सकता उसे राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए।

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