चीन का वाटरलू बनेगा ताइवान!

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

चीन अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे अमीर देश बन चुका है। पड़ोसी देशों की ज़मीन पर अतिक्रमण भी कर रहा है। लेकिन पुराने कब्जे की ज़मीन हाथ से निकलने का खतरा भी सता रहा है। शायद इसीलिए वह तिब्बत पर शिकंजा कसता जा रहा है। ताइवान की सीमाओं में अपने लड़ाकू विमान भेज रहा है। यह अपनी तरह का नया उपनिवेशवाद है। पाकिस्तान को चीन का उपनिवेश बनने में भी कोई समस्या नहीं है लेकिन भुटान इसे कुबूल नहीं कर सकता। ताइवान को उसकी अधीनता स्वीकार्य नहीं है। भारत अपनी पुरानी गलतियां दुहराने के मूड में नहीं है। तिब्बत पर कब्जे के समय भारत ने प्रतिरोध नहीं किया था। आजाद भारत की सरकारों ने तिब्बत को बफर स्टेट की दर्जा वापस दिलाने की कभी चिंता नहीं की। पंडित नेहरू की एक भूल को सुधारने की जरूरत नहीं समझी। अब चीन तिब्बत का नाम, उसकी पहचान और उसकी संस्कृति तक को नष्ट कर देने पर आमादा है। तिब्बत एक धार्मिक राष्ट्र रहा है जिसे चीन नास्तिक बनाने पर तुला है। तिब्बत चीन की कमजोर नस है जिसपर जरा सा दबाव पड़ने पर भी वह बिलबिला उठता है। भारत चीन सीमा तनाव के मूल में भी तिब्बत पर चीन का अवैध कब्जा है जो सात दशकों से कायम है। भारत की सीमाएं चीन से नहीं तिब्बत से मिलती हैं। जिसपर वह अवैध कब्जा बनाए हुए है। जिस दिन तिब्बत आजाद होगा सीमा विवाद भी समाप्त हो जाएगा।

चीन जबरन तिब्बत पर अपना हक़ जमाता रहा है। तिब्बत की जनता उसकी तानाशाही से परेशान है। दुनिया के अधिकांश देशों को तिब्बतियों से सहानुभूति है लेकिन पता नहीं क्यों चीन की दादागीरी का कोई माकूल जवाब नहीं देता। तिब्बतियों की मदद के लिए कोई भी देश खुलकर सामने नहीं आता। लेकिन कोविड प्रकरण के बाद स्थिति बदली है। अब चीन पश्चिमी देशों के निशाने पर है। अमेरिका ने दलाई लामा की निर्वासित सरकार को पहले से कहीं ज्यादा तरजीह देनी शुरू की है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने पिछली भारत यात्रा के दौरान दिल्ली में दलाई लामा के प्रतिनिधि से मुलाकात की थी। उनके बीच क्या बात हुई इसका खुलासा नहीं हुआ। लेकिन यह पहला मौका था जब इस मुलाकात पर चीन ने हमेशा की तरह विरोध दर्ज नहीं कराया। कोरोना के प्रसार के लिए दुनिया के अधिकांश देश चीन को दोषी मान रहे हैं। भले इसे साबित नहीं कर पा रहे हैं लेकिन मानसिक रूप में उन्होंने चीन को कटघरे में खड़ा कर रखा है। चीन भी इस बात को समझ रहा है कि अपने बचाव में वह जो तर्क पेश कर रहा है या विश्व स्वास्थ्य संगठन से करवा रहा है उसमें कोई दम नहीं है। कहीं न कहीं वह भी अपराध बोध से ग्रसित है। से लग रहा है कि सकी चोरी पकड़ी जा चुकी है भले ही इसका साक्ष्य किसी के पास नहीं है। विश्वास और धारणाएं साक्ष्य का मुहताज नहीं होतीं। सच पूछें तो चीन ने पाकिस्तान, रूस और हाल के दिनों में अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को छोड़कर सबका विश्वास खो दिया है।

नब्बे के दशक में शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद समाजवाद नेपथ्य में चला गया और एकध्रुवीय विश्व में पूंजीवाद का अमेरिकी मॉडल दुनिया की अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा बन बैठा। तीन दशकों से यह धारा दुनिया में अपना सिक्का जमाने के प्रयास में लगी रही। इससे विभिन्न देशों के बीच भौगोलिक सीमाएं जरूर कम हुईं लेकिन जीवन की जटिलताएं बढ़ती चली गईं। चीन ने खुले दरवाजे की नीति अपनाकर पूंजीवादी तंत्र का अपने तरीके से इस्तेमाल किया और उसी के हथियारों से उसे ध्वस्त करने की नीति अपनाई। धीरे-धीरे इस्लामी देशों के साथ मिलकर उसने अमेरिकी विश्व व्यवस्था के खिलाफ दूसरा ध्रुव तैयार कर लिया। हालांकि पाकिस्तान को छोड़कर कोई भी इस्लामी देश फिलहाल उसके साथ खुलकर सामने नहीं आ रहा है। चीन दुनिया पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है लेकिन अर्थव्यवस्था का वैकल्पिक मॉडल तैयार नहीं कर सका है। कोरोना वायरस को उसका जैविक हथियार माना जा रहा है। आज अमेरिका और योरोपीय देशों समेत पूरी दुनिया कोरोना काल जनित मंदी से उबरने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन जब-जब संकट से उबरने की अनुभूति होती है, वायरस की एक नई लहर आकर सबकुछ मटियामेट कर देती है। चीन ने खुले दरवाजे की नीति जरूर अपनाई है, निजी संपत्ति की छूट जरूर दी है। पूंजीवाद को बढ़ावा भी दिया है लेकिन समाजवाद से नाता नहीं तोड़ा है। अमेरिकी चौधराहट को उसने कभी स्वीकार नहीं किया बल्कि उससे बड़ी ताकत बनने के प्रयास में लगा रहा। उसके शुभचिंतक कम हैं, दुश्मन ज्यादा। लेकिन वह किसी की परवाह नहीं करता। देश की शासन प्रणाली पर कम्युनिस्ट पार्टी का नियंत्रण पूरी तरह बरकरार है।

सोवियत संघ के भंग होने के बाद रूस खामोशी के साथ अपनी ताकत बढ़ाता रहा है। चीन के साथ पार्टी लाइन पर उसके पुराने मतभेद रहे हैं जो अब एक हद तक समाप्त हो चले हैं। चीन अमेरिका के खिलाफ एक बड़ी लॉबी तैयार कर चुका है। पश्चिमी देशों को लगातार चुनौती दे रहा है। उसे सिर्फ रूस से खटका है। अगर जंग छिड़ी तो कहीं उसके विरोध में न खड़ा हो जाए। हालांकि रूस यह संकेत दे चुका है कि वह वह तटस्थ बने रहने की नीति पर चलेगा या फिर चीन के साथ खड़ा हो जाएगा। पश्चिमी देशों के साथ कभी नहीं जाएगा।  यदि परमाणु और जैविक हथियारों का डर नहीं होता तो अबतक तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ चुका होता। चीन इसकी शुरुआत कर चुका होता। लेकिन सच यह है कि परमाणु युद्ध मानव सभ्यता का अंत करने या धरती को चंद्रमा या मंगल की तरह वीरान करने वाला साबित होगा। इसका अपराधी बनना कोई नहीं चाहता। चीन भी नहीं।

फिर भी तनाव तो बढ़ता जा रहा है। चीन के सारे पड़ोसी देश उसकी विस्तारवादी नीति से नाराज़ हैं। चीन ताइवान पर जबरन कब्जा करने के फिराक में है। अमेरिका को बीच में नहीं पड़ने की खुली चुनौती दे चुका है। लेकिन अमेरिका ताइवान के साथ खड़ा है। उसकी पूरी मदद कर रहा है। भारत, जापान और यूरोपीय देश भी ताइवान के समर्थन में हैं। ताइवान खुद भी एक मजबूत और लड़ाकू देश है। वह तिब्बत की तरह बोद्ध लामाओं का देश नहीं है जो शांति से पलायन कर जाएगा या हाथ खड़े कर देगा। चीन के लिए ताइवान पर कब्जा करना तिब्बत की तरह आसान नहीं होगा। बल्कि डर इस बात का है कि कहीं वह चीन का वाटर-लू न साबित हो।

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