किसान आंदोलन ने कई मिथक तोड़े

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

किसान आंदोलन के 14 दिन बीत चुके हैं। इस बीच किसान नेताओं और सरकार के बीच पांच चक्र की वार्ता हो चुकी है। छठे चक्र की वार्ता 9 दिसंबर को प्रस्तावित थी लेकिन 8 दिसंबर की रात केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने वार्ता में शामिल 40 प्रतिनिधियों में से 13 लोगों को बातचीत के लिए आमंत्रित किया और तीन कृषि सुधार कानूनों में संशोधन का एक प्रस्ताव देने की पेशकश की। यह प्रस्ताव 9 दिसंबर को दिया गया जिसपर सरकार के साथ वार्ता के लिए अधिकृत 40 किसान नेताओं ने विचार-विमर्श करने के बाद खारिज़ कर दिया।

इस बीच सरकार समर्थक मीडिया चैनल जिन्हें गोदी मीडिया कहा जाता है, दो तरह के अभियान चलाते रहे। पहला यह कि कुछ किसान संगठन मांग के अनुरूप संशोधन के बाद आंदोलन वापस लेने को राजी हैं जबकि कुछ तीनों कानूनों की वापसी पर अड़े हुए हैं। हालांकि संशोधन पर राजी होने संबंधी बात किसी बड़े किसान नेता ने या 40 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल किसी नेता ने नहीं कही थी। धरनास्थल पर कुछ आम कार्यकर्ताओं से यह बात कहलवाकर एजेंडा बनाने की कोशिश की गई जो अंततः टांय-टांय फिस्स हो गई। गृहमंत्री के प्रस्ताव को आपसी चर्चा के बाद किसान नेताओं ने अस्वीकृत कर दिया। गोदी मीडिया ने दूसरा अभियान यह चलाया गया कि इस आंदोलन के कारण दिल्ली की जनता को बहुत परेशानी हो रही है इसलिए इसे खत्म कराया जाना चाहिए। हालांकि इसके लिए किसी दिल्लीवासी की बाइट का सहारा नहीं लिया। अपनी तरफ से निष्कर्ष दे दिया। यह सरकार को दमनचक्र चलाने के की ज़मीन तैयार करने का प्रयास था। मोदी सरकार अभी तक  सारे आंदोलनों को लाठी-गोली के जरिए शांत करती रही है। पिछलो छह वर्षों के अंदर यह पहला आंदोलन है जो लाखों लोगों की मौजूदगी के बावजूद पूरी तरह अहिंसक और अनुशासित है। सरकार ने शुरुआत में पंजाब से दिल्ली आ रहे किसानों का हरियाणा में क्रूरतापूर्वक दमन करने का प्रयास किया लेकिन अब इसके लिए कोई बहाना नहीं मिल रहा है। दिल्ली की जनता अपनी परेशानी बयान नहीं कर रही है लेकिन गोदी मीडिया उनकी परेशानी से परेशान है। वह सरकार पर किसानों की मांग मानने का दबाव नहीं डाल सकती। उसे उकसा जरूर सकती है। इसके राजनीतिक लाभ-हानि से उसे कोई लेना-देना नहीं है।

सवाल है कि जिनका भला करने के नाम पर कोरोनाकाल में पिछले दरवाजे से यह कानून बनाए गए जब उन्हीं को ये मंजूर नहीं तो उन्हें वापस लेने में परेशानी क्या है। इन कानूनों की मांग किसी किसान संगठन ने नहीं की थी। फिर इन्हें सरकार प्रतिष्ठा का प्रश्न क्यों बना रही है। कानून वापस लेकर सरकार तत्काल आंदोलन को खत्म करवा सकती है। दिल्ली के लोगों की परेशानी दूर कर सकती है।

लेकिन कथित मुख्यधारा का मीडिया किसानों का पक्ष रखने को तैयार नहीं है। जाहिर है कि उसका एक हिस्सा पूरी निर्लज्जता के साथ सरकार का एजेंट बन चुका है। उसे न कृषि कानूनों से कुछ लेना-देना है न किसानों के प्रति कोई सहानुभूति है। उसे सिर्फ सरकार के समक्ष अपना नंबर बनाने से मतलब है। यह वही मीडिया है जो सरकार की ओर से आंदोलन पर तरह-तरह के लांछन लगाता रहा है। जब उनके लांछनों का किसानों के आंदोलन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो अब अपने ढंग से प्रोपगेंडा चला रहा है। उसका रवैया इतना शर्मनाक और जनविरोधी है कि किसान संगठनों ने उसका पूरी तरह बॉयकाट कर दिया और उन्हें अपने बीच आने से मना कर दिया है। यह मीडिया की विश्वसनीयता के संकट का चरम उदाहरण है। यदि सरकार की चापलूसी ही पत्रकारिता है और पत्रकारिता का जन सरोकार से कोई नाता नहीं तो बेहतर है कि वे सरकार के जन संपर्क विभाग का हिस्सा बन जाएं। मीडिया को क्यों रुसवा कर रहे हैं।

अब जबकि सरकार संशोधन का प्रस्ताव दे चुकी है तो स्पष्ट है कि वह यह बात मान रही है कि उसके कानून दोषपूर्ण और एकतरफा हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इनकी भर्त्सना की जा रही है। इसके बावजूद सरकार इन्हें वापस लेने को तैयार नहीं है। उसके धर्मसंकट का एक कारण यह भी है कि जिन कार्पोरेट मित्रों के लिए यह कानून लाए गए उन्होंने कानून बनने के कई महीने पहले से ही गोदाम और रिटेल चेन पर भारी-भरकम निवेश करना शुरू कर दिया था। उनकी काफी पूंजी फंस चुकी है। अगर उन्हें असीमित भंडारण अर्थात जमाखोरी और मनमाने भाव में बेचने की छूट नहीं मिली तो उनका सारा किया कराया मिट्टी में मिल जाएगा। वे भारी-भरकम राजनीतिक चंदा देते हैं। सरकार उन्हें नाराज नहीं कर सकती। किसानों के साथ समस्या यह है कि वे  संख्याबल में जरूर ज्यादा हैं लेकिन अभीतक वे कोई वोट बैंक नहीं बन सके हैं। इसलिए वे सरकार के लिए कोई चिंता का विषय नहीं हैं। भाजपा हिंदू-मुसलिम कार्ड के जरिए उनका वोट हासिल करने की कला जानती है। विपक्ष कमजोर है। लिहाजा सरकार की कुर्सी पर कोई खतरा दिखाई नहीं देता।

लेकिन एक और स्थिति यह है कि इस किसान आंदोलन ने देशभर के किसान संगठनों को एक प्लेटफार्म पर  ला दिया है। अगर उनका अखिल भारतीय प्लेटफार्म तैयार हो गया तो सत्ता की चाबी उन्हीं के हाथ में होगी। वे सत्ता की राजनीति की धुरी बनने की ताकत रखते हैं। वे एकजुट हो गए तो राजनीति और पूंजीपतियों की सांठगांठ पर इसका सीधा असर पड़ जाएगा। इसलिए सरकार को कोई भी कदम बहुत सोच समझकर उठाना चाहिए। मीडिया को भी अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करना चाहिए।

 

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