दिल्ली का दंगा बना मोदी सरकार के गले की फांस

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देवेंद्र गौतम

दिल्ली की उत्तर पूर्वी इलाके तीन दिनों तक दंगे की आग में झुलसता रहा और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह इसे नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल रहे। कई मौकों पर दिल्ली पुलिस भी सांप्रदायिकता के जहर से सराबोर नज़र आई। एक पुलिसकर्मी ने घटना का कवरेज कर रहे रिपोर्टर से पूछा कि वह हिन्दू है या मुस्लिम। रिपोर्टर ने कहा कि वह रिपोर्टर है। इसपर पुलिसकर्मी ने कहा कि तुम्हारा पैंट खोलकर पता कर लेंगे कि तुम क्या हो। दंगाइयों के बीच हिंसक मुठभेड़ और लूटपाट के दौरान दिल्ली पुलिस धर्म के आधार पर लोगों को उकसाती अथवा हड़काती नज़र आई। हालांकि दिल्ली पुलिस के एक हेड कांस्टेबल दंगाइयों के हाथों शहीद हो गए और एक डीसीपी स्तर के अधिकारी बुरी तरह जख्मी हुए। कई अन्य पुलिसकर्मी भी घायल हुए। लेकिन पुलिस दंगे के दौरान तमाशबीन बनी रही।

फिलहाल दंगा प्रभावित के इलाकों में हिंसा की आंधी थम चुकी है। बाहर से लाए गए दंगाई वापस लौट चुके हैं। चार दिनों तक चले इस दंगे में अभी तक 34 लोगों की जान जा चुकी है। 200 से अधिक लोग घायल होकर अस्पतालों में पड़े हैं। पूरे इलाके की सड़कों पर पत्थरों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं जिन्हें हटाने का काम चल रहा है। जगह-जगह आगजनी के निशान देखे जा रहे हैं। अब दोनों पक्ष के लोग शांत पड़े हैं। दुकानें खुल चुकी हैं। जनजीवन सामान्य होता जा रहा है। लेकिन स्कूल अभी भी बंद हैं। जिन नेताओं के विवादित बयानों के कारण दंगा भड़का हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की भूमिका को लेकर जवाब-तलब किया है।

हिंसा को शांत करने में हाईकोर्ट के निर्देश और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की पहल की मुख्य भूमिका रही। दिल्ली पुलिस और गृहमंत्रालय इसे नियंत्रित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। गृहमंत्री अमित शाह ने हिंसा भड़कने के बाद चार-चार आपात बैठकें कीं लेकिन इसका नतीजा कुछ नहीं निकला। हिंसक घटनाएं पूर्ववत जारी रहीं। दिल्ली पुलिस हाथ पर हाथ धरकर बैठी रही। वह खुद दंगाइयों का निशाना बनती रही। ऐसी आशंका व्यक्त की गई कि पुलिस को ऊपर से आदेश नहीं मिले थे। इसले वह सुरक्षात्मक स्थिति में थी।  पुलिस की निष्पक्षता पर भी सवाल उठे।

हाईकोर्ट के जस्टिस एस मुरलीधरन के निर्देशों के बाद हिंसा को रोकने और घायलों के इलाज तथा मृतकों के परिजनों को राहत पर ध्यान दिया गया। इसके बाद ही एनएसए अजीत डोभाल को शांति कायम करने की जिम्मेदारी सौंपी गई और दिल्ली पुलिस के कई अधिकारियों का तबादला कर एक सक्षम आइपीएस अधिकारी की प्रतिनियुक्ति की गई। इसके साथ ही दंगे के लिए सरकार को फटकार लगाने वाले हाईकोर्ट के जज एस मुरलीधरन का तत्काल पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में तबादला कर दिया गया। इसे बदले की कार्रवाई माना जा रहा है।

सरकार का कहना है कि कोलेजियम ने 12 फरवरी को उनके तबादले की सिफारिश की थी। लेकिन ऐसे समय जब दिल्ली दंगों की आग में धधक रही थी और से शांत करने में उनके निर्देशों की अहम भूमिका थी, आधी रात को उनके तबादले का नोटिफिकेशन निकालने का संदेश अच्छा नहीं गया है। इसे सरकार को फटकार लगाने और पूरे तंत्र पर टिप्पणी करने से जोड़कर देखा जा रहा है। जस्टिस मुरलीधरन ने यहां तक कह दिया था कि वे दिल्ली में 1984 के दंगों की पुनरावृत्ति नहीं होने देंगे।

अभी मामले की जांच होनी है। दोषियों की पड़ताल की जानी है। लेकिन इसे संयोग कहें या साजिश कि भाजपा नेता और पूर्व विधायक कपील मिश्रा के भड़काऊ भाषण और चेतावनी के अनुरूप ही दंगे ने आकार लिया। सरकार ने पिछले दिनों शरजील इमाम के देशविरोधी बयान के कुछ ही समय के अंदर उसे ढूंढ निकाला और हिरासत में ले लिया। लेकिन वारिश पठान, कपिल मिश्रा जैसे भड़काऊ बयान देने वाले नेताओं के खिलाफ एक प्राथमिकी तक नहीं दर्ज की गई। अब कोर्ट के आदेश के बाद संभवतः जहरीले बयान देने वालों के खिलाफ कुछ कार्रवाई हो।

सीएए के विरोध में प्रदर्शन दो माह से अधिक समय से शांतिपूर्वक चल रहे हैं। सरकार प्रदर्शनकारियों से कोई वार्ता करने के पक्ष में दिखाई नहीं दे रही है। वह इसे लागू करने की जिद पर अड़ी है। इसे अचानक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के ठीक पहले हिंसक बनाने के पीछे उन्हें भारत की स्थिति से अवगत कराने की मंशा हो सकती है। या फिर शाहीनबाग को खाली कराने की पूर्व भूमिका। अभी तक जो जानकारी सामने आई है उसके मुताबिक हिंसक घटनाओं को अंजाम देनेवाले लोग स्थानीय नहीं थे। उन्हें बाहर से लाया गया था। स्थानीय लोगों ने तो एक दूसरे की मदद करने की मिसालें पेश की हैं। जाहिर है कि दंगा सुनियोजित था और इसका कुछ खास मकसद था। यह देशभर के सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के लिए एक चेतावनी थी।

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