…तो बौद्धों की साकेत नगरी है अयोध्या!

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

सुप्रीम कोर्ट से हिंदुओं की पक्ष में फैसला आने के बाद अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण एक बार फिर विवादों में घिर गया। मंदिर निर्माण के लिए समतलीकरण के दौरान ऐसे पुरावशेष निकल आए जो इस स्थल के इतिहास को एक अलग आयाम पर खड़ा कर रहे हैं। हिन्दू लोग जिसे शिवलिंग बता रहे हैं उसे बौद्ध लोग बौद्ध स्तूप बता रहे हैं। अन्य पुरावशेष भी यह संकेत दे रहे हैं कि यहां सम्राट अशोक के कार्यकाल में बौद्ध विहार का निर्माण हुआ था। इनका स्थापत्य अशोक कालीन प्रतीत होता है। सम्राट अशोक 304 ईसा पूर्व में हुए थे। 262 से 261 ईसा पूर्व में कलिंग युद्ध हुआ था जिसके बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। उसने देश के विभिन्न स्थलों पर बौद्ध विहार बनवाए थे।185 ईसा पूर्व में पुष्यमित्र सुंग ने मौर्यवंश के अंतिम सम्राट बृहद्रथ की हत्या कर सेनापति से राजा बन बैठा। उस समय अयोध्या का नाम साकेत नगरी था। पुष्यमित्र बौद्धों का विरोधी था। साकेच का नाम बदलकर अयोध्या उसी ने रखा था। उसने बहुत सारे बौद्ध विहारों को ध्वस्त कर ब्राह्मणवादी धर्मस्थलों में बदल दिया था।

अब बौद्धों का कहना है साकेत के बौद्ध विहार को ध्वस्त कर राम मंदिर का निर्माण हुआ भी होगा तो पुष्यमित्र सुंग के कार्यकाल में हुआ होगा। फिर मुगलकाल में उसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई होगी। इस लिहाज से इस स्थल पर सबसे मजबूत दावा बौद्धों का ही बनता है। 10 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने भारत से बौद्ध धर्म को उखाड़ फेंका था। लेकिन विदेशों में इसकी जड़ें और मजबूत हुईं थीं। आज भी भारत में बौद्धों की संख्या कम है लेकिन दुनिया के कई देशों में यह राजधर्म का स्थान रखता है। विश्व में ईसाइयों और मुसलमानों के बाद बौद्ध धर्म संख्या के लिहाज से तीसरे स्थान पर हैं। भारत में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने अपने लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म को स्वीकार किया था। लिहाजा दलितों के बीच बौद्ध धर्म के मानने वालों की बड़ी संख्या है। इसके कई संगठन हैं जो जुझारू हैं और संख्याबल में भी ज्यादा हैं। उनमें से भीम आर्मी ने लॉकडाउन के बाद अयोध्या मुद्दे पर बड़े आंदोलन का एलान कर दिया है। आंबेडकर के पौत्र राजरत्न आंबेडकर ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर राम मंदिर के निर्माण पर अविलंब रोक लगाने की मांग की है। साथ ही यूनेस्को में भी अयोध्या पर बौद्धों के अधिकार के संदर्भ में आवश्यक पहल की अपील की है।

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर तरह-तरह के तर्क पेश किए जा रहे हैं। कट्टर हिंदुवादी संगठनों का कहना है कि राम बुद्ध से हजारों साल पहले हुए थे। हालांकि राम एक मिथकीय चरित्र हैं। उनका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है। जबकि बुद्ध, सम्राट अशोक, वृहद्रथ और पुष्यमित्र सुंग इतिहास के चरित्र हैं। ह्वेन सांग और फाहियान के यात्रा वृतांतों में भी साकेत का जिक्र आता है लेकिन अयोध्या नामक किसी नगर का जिक्र नहीं आता। यदि यह सच है कि साकेत नगर को अयोध्या नाम पुष्यमित्र सुंग ने दिया था तो बाल्मीकि रामायण से लेकर सारे रामायण इसके बाद के लिखे हुए साबित होते हैं। जब अयोध्या नामक कोई नगर पुष्यमित्र सुंग के पहले वजूद में ही नहीं था तो अयोध्या के राजा राम की कथा कपोल कल्पित प्रतीत होती है। लेकिन यह भाजपा का शासन काल है। उसके समर्थक तर्क और विज्ञान की भाषा नहीं समझते। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामजन्म भूमि के मुद्दे पर न्यायपालिका के फैसले पर ही भरोसा किया। लेकिन यह भाजपा का सबसे बड़ा मुद्दा रहा है। इसी मुद्दे के सहारे उसने ध्रुवीकरण की राजनीति की और सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाया। अब यदि राम मंदिर का निर्माण रोकने के लिए दलित वर्ग के लोग सड़कों पर उतरते हैं तो भाजपा और कट्टर हिन्दूवादी संगठनों का रुख क्या होगा कहना कठिन है। न्यायिक प्रक्रिया तो तुरंत शुरू हो जाएगी लेकिन आंदोलनात्मक कार्रवाई लॉकडाउन खत्म होने के बाद ही जोर पकड़ेगी और यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बन जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

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