प्रधानमंत्री के इशारे को समझिए

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

प्रधानमंत्री जब रात के 8 बजे देश को संबोधित करते हैं तो डर लगता है कि पता नहीं क्या फरमान जारी कर दें। लेकिन 12 मई को जब वे टावा स्क्रीन पर आए तो निराशा में डूबे देश को आशा की एक नई किरन दिखाई। लोगों को उम्मीद थी कि 12 मई की रात 8 बजे वे लॉकडाउन-4 की घोषणा करेंगे। कुछ नई छूट का एलान करेंगे लेकिन उन्होंने आत्मनिर्भर भारत अभियान के लिए 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा करके हैरान कर दिया। उन्होंने कहा कि इस योजना का विस्तृत खाका केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण रखेंगी। लेकिन प्रधानमंत्री की घोषणा से यह बात स्पष्ट हो गई कि वे देश को पूंजी के विकेंद्रीकरण की ओर ले जाना चाहते हैं। वे जापान और चीन के उस मॉडल को खड़ा करना चाहते हैं जिसमें कुटीर और घरेलू उद्योगों से लेकर लघु, मध्यम और वृहत उद्योगों के बीच एक समन्वयकारी संबंध होता है। जिसमें हर गांव, हर घर एक उत्पादक इकाई बन जाता है और हर नागरिक के अंदर उद्यमिता का विकास होता है। ऐसी व्यवस्था में रोजगार का संकट नहीं होता। हर किसी के पास स्वरोजगार का अवसर होता है। रोजी-रोटी के लिए महानगरों की ओर जाना मजबूरी नहीं शौक का पर्याय होता है। पैकेज में आधारभूत संरचना, मांग और पूर्ति की आधुनिकतम तकनीक पर आधारित श्रृंखला, लघु, मध्यम और वृहत हर तरह के उद्योगों के विकास की संभावना होगी।

भारत में वैश्वीकरण से पूर्व तक दस्तकारी, शिल्पकारी और कुटीर उद्योग जीवित थे। देश के ग्रामीण हाटों से लेकर शहरो के फुटपाथी बाजार तक स्थानीय स्तर पर निर्मित वस्तुएं ही बिकती थीं। कम आय वर्ग के लोगों का वह आदर्श बाजार था। लेकिन उदारीकरण के दौर में चीन के उत्पादों ने इस बाजार पर कब्जा कर लिया। उसके उत्पादों में मजबूती नहीं होती थी। उन्हें इस्तेमाल करो और फेंक दो की अवधारणा के तहत उत्पादित किया जाता था लेकिन चीन के उत्पादों की एकमात्र खूबी यह थी वे देखने में आकर्षक और हमारे देशी उत्पाद से ज्यादा सस्ते होते थे। नतीजतन महिलाओं के सिंदूर-टिकुली से लेकर बच्चों के खिलौने तक, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति से लेकर पतंग के मांझे तक तमाम चीजें चीन से आने लगीं। हमारा हस्तशिल्प का बाजार संकुचित हो गया। पुश्तैनी कारीगर दूसरे धंधे अपनाने को विवश हो गए। अब कोरोना काल में चीन और उसके उत्पादों के प्रति लोगों के अंदर एक वितृष्णा का भाव उभर आया है। ऐसे में देशी हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित करने का यह बेहतरीन अवसर है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस दिशा में प्रयास भी शुरू कर दिए थे। उनका संकल्प श्रमिकों के पलायन को रोकना और उन्हें उनके घर के पास रोजगार उपलब्ध कराना है। प्रधानमंत्री ने इस संबंध में गहन चिंतन किया और वृहत योजना बनाई। कोरोना काल ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत को महसूस करा दिया है। निश्चित रूप से अत्याधुनिक शहरों का विस्तार भी जरूरी है लेकिन यह ग्रामीण भारत की कीमत पर नहीं होना चाहिए। आजादी के बाद हमारे देश की विकास यात्रा शहर केंद्रीत रही और गांव उपेक्षित रहे। शहर अजगर की तरह गांवों को निगलते चले गए। अब इस धारा को दूसरी दिशा देने की जरूरत है।

भारत में संसाधनों का अभाव नहीं है। उनके सदुपयोग और प्रबंधकीय व्यवस्था की समस्या है। भारत गावों का देश रहा है। अभी भी 69 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है। यह 69 प्रतिशत आबादी अगर आत्मनिर्भर नहीं होगी। खुशहाल नहीं होगी तो भारत कैसे खुशहाल होगा? ब्रिटिश शासनकाल से पूर्व ग्रामीण भारत सिर्फ सामूहिक खेती, पशुपालन और कुटीर उद्योगों की बदौलत खुशहाल था। अपनी जरूरत की हर चीज का स्थानीय स्तर पर उत्पादन कर लेता था। सप्ताह में एक बार हाट लगती थी जिसमें आसपास के ग्रामीण जरूरत की चीजें खरीदते और बेचते थे। हाट-बाजार के लिए उन्हें कोई भी सामान बाहर से नहीं लाना पड़ता था। ग्रामीण भारत की यह आत्मनिर्भरता 1757 में ईस्ट इंडिया कंपनी को बिहार, बंगाल और उड़ीसा का दीवानी अधिकार मिलने के बाद भंग होने लगी। कंपनी के कार्यों की देखरेख के लिए भारी संख्या में इंग्लैंड से अंग्रेजों को बुलाया गया। उनके भोजन के लिए गायों और भेड़ों का बेतहाशा वध होने लगा। यह कृषि व्यवस्था में उर्वरकों की आपूर्ति का साधन थे। मवेशियों की संख्या घटने से उर्वरकों की कमी होने लगी। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने लगान इतना ज्यादा बढ़ा दिया कि किसानों की कृषि कार्य से अरुचि होने लगे। वे खेती करने की जगह खेतों को परती छोड़ देना बेहतर समझने लगे। इस प्रक्रिया में 1770 का दशक आते-आते देश में भाषण अकाल पड़ा। ससे निपटने के लिए कंपनी ने पहला दुर्भिक्ष आयोग बनाया। उसमें अतिथि देवो भवः की अवधारणा पर आधारित भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं का जमकर मखौल उड़ाया गया और तय किया गया गया कि दुर्भिक्ष से बचने के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष 200 क्विंटल खाद्यान्न की आवश्यकता है। तब से यही कृषि उपज का मापदंड बन गया। इसके बाद देश की कृषि कभी पटरी पर वापस नहीं आ सकी। आजादी के बाद एक दशक तक शहर केंद्रीत वृहत उद्योगों पर ध्यान केंद्रित रहा। कृषि की ओर सरकार का ध्यान नहीं गया। 60 के दशक मे जब खाद्यान्न का संकट गहराने लगा तो हरित क्रांति का नारा देकर कनाडा की तकनीक पर आधारित रासायनिक खेती की शुरुआत की गई। इससे तात्कालिक तौर पर खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता आई लेकिन दूरगामी प्रभाव नकारात्मक पड़ा। इसके बाद पुनः स्वामिनाथन आयोग क गठन हुआ और हरित क्रांति-2 का प्रारूप तैयार किया गया।

कुल मिलाकर अभी तक कृषि को पटरी पर वापस नहीं लाया जा सका। अब जरूरत इस बात की है कि पशुपालन के जरिए लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के साथ पशुधन का विस्तार किया जाए और पुनः वैज्ञानिक शोधों पर आधारित जीरो बजटवाली जैविक खेती की ओर वापस लौटा जाए। दस्तकारी, शिल्पकारी और कुटीर उद्योगों का विस्तार कर ग्राम आधारित आर्थिक गतिविधियों को गति दी जाए। चीन में विदेशी निवेश का बड़ा कारण वहां की मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी रही है। अब कोरोना काल के दौरान चीन की साख लगभग खत्म हो चुकी है। ऐसे में विदेशी कंपनियां वहां से पलायन करने की तैयारी में हैं। भारत में उन्हें बेहतर सहुलियत देकर रोकने की कोशिश हो रही है। उनके साथ बातचीत चल रही है। शहरी अर्थव्यवस्था को धार देने के लिए यह कंपनियां बेहतर भूमिका निभा सकती हैं। सरकार तमाम बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करती दिख रही है। यदि 20 लाख करोड़ के पैकेज का सही ढंग से इस्तेमाल किया गया तो हम एक बेहतर आर्थिक भविष्य और एक समृद्ध राष्ट्र बनने की दिशा मे तेजी से आगे बढ़ सकते हैं।

 

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