हमने कोरोना को नहीं, कोरोना ने हमें हरा दिया

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च की रात आठ बजे 21 दिनों के अंदर कोरोना को पराजित करने का दावा किया था। कोरोना को हराने के नाम पर देशवासियों से तरह-तरह के टोने-टोटके भी करवाये। थाली-ताली बजवाने से लेकर टार्च और मोबाइल का फ्लैशलाइट तक जलवाया। इतने अवैज्ञानिक तरीके से दुनिया के किसी देश ने कोरोना के साथ जंग नहीं लड़ी। यूरोप में कभी भारत को सपेरों और जादूगरों का देश माना जाता था। स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों ने इस धारणा को तोड़ा लेकिन प्रधानमंत्री जी ने दुनिया को यह संदेश दिया कि उनकी धारणा सही थी। हम थाली बजाकर महामारी को भगानेवाले लोग हैं। आज प्रधानमंत्री के दावे के छह महीने से भी अधिक बीत चुके। कोरोना हारा नहीं बल्कि उसने हमें बुरी तरह हरा दिया है। हमारे यहां संक्रमण की रफ्तार विश्व में सबसे तेज है। हम दुनिया में अपने नाम का डंका बजने की खुशफहमी में मुब्तिला थे और हमारे यहां संक्रमण का आंकड़ा 35 लाख के पार निकल गया। 65 हजार से अधिक लोग जान गवां बैठे। दुनिया में तीसरे स्थान पर पहुंच गए और ब्राजिल को पीछे धकेलकर दूसरे स्थान की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं। हमारी अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। करोड़ों लोगों की नौकरी चली गई। मोदी सरकार प्रतिवर्ष 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने के वादे के साथ सत्ता में आई थी और रोजगार देने की जगह उससे ज्यादा लोगों का रोजगार छीन लिया। प्रधानमंत्री जी ने फैसले अच्छे किए लेकिन उनका क्रियान्वयन इतने बेढंगे तरीके से किया कि सारा गुड़ गोबर हो गया। काम करने का कोई सलीका इस सरकार के पास है ही नहीं। सबसे पहले हमारे प्रधानमंत्री जी को स्वयं का कौशल विकास करने की जरूरत थी। लेकिन नहीं किया गया। आज हमारे प्रधानमंत्री हर मोर्चे पर विफल हो चुके हैं। उनके अंदर अहंकार तो भरपूर है लेकिन इतना आत्मबल नहीं है कि अपनी हार और अपनी विफलता स्वीकार कर लें। उन्होंने सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है। तानाशाह बनने की पूरी तैयारी कर ली है लेकिन उन्होंने जब कोई काम सलीके से नहीं किया तो तानाशाह भी नहीं बन सकते। अभी देशवासी त्राहिमाम कर रहे हैं। सांप्रदायिकता की अफीम चटाकर उन्हें मुख्य मुद्दों से भटकाकर रखा गया है। लेकिन जब वे पूरी तरह तानाशाही पर उतरेंगे तो कुछ न कुछ ऐसा बेढंगा काम कर बैठेंगे कि देश में विद्रोह हो जाएगा। तब अंतर्राष्ट्रीय दबाव पड़ेगा और पड़ोसी देश मौका पाकर चढ़ बैठेंगे। उन्होंने तीनों सेनाओं का एक साझा अधिकारी बना दिया है लेकिन उन्हें पता नहीं कि सेना के जवान व्यक्तिपूजक नहीं बल्कि असली देशभक्त हैं। वे देश के लिए कुर्बानी का जज़्बा रखते हैं तो देश के खिलाफ आचरण भी बर्दाश्त नहीं करेंगे। जब उन्हें समझ में आएगा कि एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा के लिए देश के खिलाफ उनका इस्तेमाल किया जा रहा है तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है।

अभी प्रधानमंत्री जी को देश की, देशवासियों की और देश की सीमाओं की सुरक्षा की कोई चिंता नहीं है। वे आराम से कभी मोर नचा रहे हैं तो कभी मंदिर की सीढ़ियों से उतरते बरसात के पानी का दृश्य देखकर मुग्ध हो रहे हैं। जीडीपी गतालखाने में है और अपने लिए 8 हजार करोड़ का पुस्पक विमान मंगा रहे हैं। उसपर ढाई हजार करोड़ की एक्सेसरीज लगी हुई हैं। अमेरिका के प्रेसीडेंट की बराबरी कर रहे हैं और भारत की आर्थिक स्थिति की कोई चिंता नहीं है। 20 हजार करोड़ की लागत से नया पार्लियामेंट बनवा रहे हैं। सरकार चलाना आए न आए लेकिन केंद्र के साथ सभी प्रदेशों की सत्ता उन्हें चाहिए। चाहे कुछ लोगों की कुर्बानी देकर हासिल हो या विधायकों को खरीदकर अथवा कोई टोना-टोटका करके। उन्हें यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि कोरोना से निपटना और देश को चलाना उनके वश की बात नहीं है। वे भारत के अबतक के सबसे असफल प्रधानमंत्री के रूप में अपना नाम दर्ज कराने जा रहे हैं।

जहां तक कोरोना का सवाल है देश हर्ड इम्युनिटी की ओर बढ़ रहा है। बेहतर है कि लॉकडाउन और अनलॉक का प्रहसन बंद करें और अर्थव्यवस्था को पूरी तरह खोल दें। देश के संसाधनों को कौड़ी के मोल अपने मित्रों के नाम करने का खेल बंद करें। कुछ निर्माम नहीं कर सकते तो विध्वंस न करें। देशवासियों ने मोर नचाने के लिए और पुष्पक विमान उड़ाने के ले सत्ता नहीं सौंपी है। धीरे-धीरे अंधभक्तों की आंखें भी खुलने लगी हैं। वे समझने लगे हैं कि वे जिसे अपना आराध्य समझ रहे थे वह एक नकारा इनसान है और देश को बर्बाद करने पर तुला हुआ है। उसे सिर्फ अपने ऐश मौज से मतलब है। देशवासियों से और हिंदू धर्म से उसके कुछ भी लेना देना नहीं है। बुढ़ापे में बचपन से जवानी तक के उसके सारे शौक उभर आए हैं और इसके लिए देश के खजाने को दोनों हाथ लुटा रहा है। आत्ममुग्धता और बड़बोलेपन से देश नहीं चलता।

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