अर्नव की गिरफ्तारी पर हाय तौबा क्यों

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-देवेंद्र गौतम

अर्नव गोस्वामी की गिरफ्तारी को लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला, चौथे खंभे पर प्रहार बताया जा रहा है। जिस ढंग से उन्हें घसीटते हुए ले जाया गया है, उसकी निंदा अवश्य की जानी चाहिए। इस तरह का व्यवहार सामान्य जन के साथ भी नहीं किया जाना टाहिए। लेकिन जिस मामले में उनकी गिरफ्तारी हुई है उसका पत्रकारिता से कोई संबंध नहीं है। उन्हें डिजाइनर अन्वय नाइक और उनकी मां कुमुद नाइक की कथित आत्महत्या के मामले में उकसाने के आरोप में आईपीसी की धारा 306 के तहत अर्नब को गिरफ्तार किया गया है। मई 2018 में आत्महत्या से पहले लिखे एक खत में अन्वय नाइक ने आरोप लगाया था कि अर्नब गोस्वामी ने रिपब्लिक नेटवर्क के स्टूडियो का इंटीरियर डिजाइन कराने के बाद भुगतान नहीं किया था। काम कराकर भुगतान न करना पत्रकारिता का नहीं पत्रकारिता की धौंस का इस्तेमाल करने का मामला है।

जिस समय की यह घटना है उस समय महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार थी। अर्नव गोस्वामी पत्रकारिता के नाम पर भाजपा की जी हुजूरी करते रहे हैं। सत्ता की अनुकूलता के तहत उन्होंने डेकोरेटर को भुगतान नहीं दिया। सरकार ने भी दो आत्महत्याओं के मामले को बिना किसी जांच के ठंढे बस्ते में डाल दिया। यह सत्ता की छत्रछाया में किया गया अन्याय था। अन्वय नाइक और उनकी मां भी भारत के नागरिक थे और उन्हें न्याय पाने का अधिकार था। मुंबई पुलिस ने उस फाइल को दुबारा खोला तो निश्चित रूप से यह बदले की भावना के तहत किया गया। लेकिन सवाल फिर भी यह है कि क्या न्याय और अन्याय को सत्ता के आधार पर परिभाषित किया जाएगा। यह करोड़ों का भुगतान दबाने और आत्महत्या के लिए विवश कर देने का मामला है। लेकिन सच यह है कि मुफस्सिल से लेकर राजधानी तक पत्रकारिता का धौंस देकर मुफ्त सेवाएं प्राप्त करने की प्रवृत्ति देश के किसी भी हिस्से में देखी जा सकती है।

मुफस्सिल पत्रकार पुलिस-प्रशासन के साथ संबंधों के आधार पर अपनी धौंस चलाता है और अर्नव जैसे पत्रकार राज्य और केंद्र सरकार के साथ संबंधों के आधार पर। इस प्रवृत्ति के कारण पत्रकारिता का गौरव नहीं बढ़ता उसके खिलाफ आक्रोश उत्पन्न होता है। पत्रकारों ने कभी इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई। इसे चौथे खंभे का अपमान नहीं बताया। वास्तव में पत्रकार देश के सर्वाधिक जागरूक नागरिक होते हैं। उन्हें एक आदर्श नागरिक की तरह पेश आना चाहिए। उनका व्यक्तित्व अनुकरणीय होना चाहिए भयावह नहीं। सामान लेकर पैसे नहीं देना, काम कराकर मेहनताना नहीं देना पत्रकारिता नहीं गुंडागर्दी है। पत्रकार समुदाय पत्रकारों की गुंडागर्दी को भी जायज ठहराने लगे तो इससे चौथा खंभा गौरवान्वित नहीं होगा। मीडिया को चाहिए कि नाइक परिवार को भी इनसान और भारत का नागरिक समझकर अर्नव पर उनके परिजनों को बकाया भुगतान करने के लिए दबाव डाले। पत्रकारिता की गरिमा के लिए यह आवश्यक है कि सही और गलत के बीच निष्पक्षता के साथ फर्क करे। अपनी विरादरी का कोई व्यक्ति अगर कुल को कलंकित करता है तो उसे संरक्षण नहीं दंड मिलना चाहिए चाहे विरादरी दे अथवा हुकूमत। पत्रकार यदि सत्ता की दलाली नहीं छोड़ेंगे तो आने वाले समय में इस तरह के मामले सामने आते रहेंगे। इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए।

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