मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालकर चले गए अमित शाह

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रांची। अमित शाह केंद्रीय गृहमंत्री हैं। उनके पास देश के हर इलाके की इंटेलिजेंस रिपोर्ट रहती है। झारखंड में नक्सल समस्या की क्या स्थिति है उन्हें बखूबी जानकारी होनी चाहिए। फिर सबकुछ जानते हुए भी पता नहीं किस धुन में उन्होंने मनिका और लातेहार की सभा में नक्सलियों के खात्मे का दावा कर दिया। गृहमंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह हवा में बात नहीं करनी चाहिए। उनकी आवाज़ भारत सरकार की आवाज़ होती है। उसमें हल्कापन नहीं, गंभीरता होनी चाहिए। उनके इस दावे ने नक्सलियों को अपने खोल से बाहर निकलने को विवश कर दिया।

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

शाह के दावे की कीमत चार सुरक्षाकर्मियों को अपनी शहादत देकर चुकानी पड़ी। फिर लोहरदगा में सड़क निर्माण में लगी ठेका कंपनी को नक्सलियों के हाथों दो जेसीबी मशीनों को आग की लपटों की भेंट चढ़ते देखना पड़ा। पूरे आधे घंटे तक नक्सलवादी तांडव मचाते रहे। कोई उन्हें रोकने नहीं पहुंचा। कंपनी को काम बंद करने की सख्त चेतावनी देकर वे आराम से जंगल के रास्ते निकल गए। उधर पलामू में भाजपा नेता मोहन दत्ता  सहित दो लोगों को एके-47 से भून दिया गया। 10 लोग घायल हो गए। नक्सली दस्ते इसी तरह छापामार कार्रवाइयां करते हैं। वे कब कहां क्या करेंगे अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। सरकार कोई ऐसा सूचना तंत्र नहीं विकसित कर पाई है कि नक्सली दस्तों की गतिविधियों पर नज़र रख सके। वह तो उनके अस्तित्व से ही इनकार करती है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और सीएम रघुवर दास न सुरक्षाकर्मियों की जान बचा सके न ठेका कंपनी की 30 लाख की मशीनों को स्वाहा होने से रोक सके। सुरक्षाकर्मी तो फिर भी सर पर कफन बांधकर चलते हैं लेकिन व्यापारिक कंपनियां अकारण अपनी जान जोखिम में नहीं डाल सकतीं। जब सरकार सुरक्षा नहीं दे पाती तो आखिर ठेका कंपनी किस भरोसे सड़क निर्माण का काम जारी रख सकेगी। इस तरह की घटनाओं का व्यापक असर पड़ता है।

अपने बड़बोलेपन में भाजपा नेता नक्सली हिंसा को निमंत्रण दे बैठे। यदि उन्हें छेड़ा नहीं जाता तो मुमकिन था कि चुनाव के दौरान बहिष्कार का आह्वान कर वे शांत पड़े रहते। लेकिन सरकारी दावे के बाद अपनी उपस्थिति दर्ज कराना उनकी विवशता बन गई। उनके सक्रिय होते ही भाजपा सरकार के हवाई दावे पलक झपकते ध्वस्त हो गए। नेताओं की इस तरह की अनर्गल डींगबाजी से उनके पक्ष में कोई लहर नहीं पैदा होगी बल्कि इससे मतदाताओं पर नकारात्मक असर पड़ेगा। स्वयं चुनाव आयोग सरकार के दावे से इत्तेफाक नहीं रखता। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने साफ कह दिया है कि नक्सलवाद के खात्मे की कोई प्रशासनिक रिपोर्ट उन्हें नहीं मिली है।

भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले फायर ब्रांड नेता, स्टार प्रचारक अमित शाह झारखंड में आए तो थे भाजपा के वोटों में इजाफा करने। उसे 65 पार के लक्ष्य को पूरा करने में मदद करने। लेकिन मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालकर चले गए। अब भुगतना पड़ेगा राज्य सरकार और राज्य की जनता को। नक्सली शांत पड़े थे तो उन्हें शांत रहने देना चाहिए था। अकारण ललकारने या छेड़ने की जरूरत नहीं थी। अब सीएम रघुवर दास को बताना चाहिए कि उनकी सरकार ने नक्सलियों का सफाया कर दिया तो लातेहार और लोहरदगा में वे कहां से प्रकट हो गए।

चुनावों के दौरान अपनी उपलब्धियां बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाती हैं। इसमें कोई नई बात नहीं है लेकिन बड़बोलेपन में घर में आग नहीं लगाई जाती। अमित शाह जाने-अनजाने यही काम कर गए हैं।

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