और अब लोजपा ने भी पकड़ी अलग राह

एनडीए का बिखराव अपने चरम पर

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देवेंद्र गौतम

आजसू और जदयू के बाद भाजपा के एक और सहयोगी लोजपा ने भी एनडीए से अलग राह अपना ली। अब वह झारखंड विधानसभा की 50 सीटों पर प्रत्याशी उतारेगी। लोजपा ने झारखंड में जरमुंडी समेत छह सीटों की मांग की थीं। लेकिन भाजपा ने उसकी मांगी हुई सीटों पर भी उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। इससे क्षुब्ध होकर लोजपा नेता चिराग पासवान ने 50 सीटों पर लड़ने की घोषणा कर दी। पहले चरण की चार सीटों पर अपने उम्मीदवार भी घोषित कर दिए। यह उसकी पहली सूची है। हालांकि लोजपा झारखंड में तीन बार चुनाव लड़ चुकी है लेकिन एक भी सीट जीत नहीं सकी। भाजपा की 30 वर्ष पुरानी सहयोगी शिवसेना महाराष्ट्र में सरकार बनाने के सवाल पर पहले ही गठबंधन से अलग हो चुकी है। भाजपा वहां राष्ट्रपति शासन लागू कराने में सफल हो गई। महाराष्ट्र के राज्यपाल ने शिवसेना को बहुमत का आंकड़ा जुटाने के लिए मात्र 24 घंटे का समय दिया। इतने कम समय में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ सरकार गठन का फार्मूला तय करना और समर्थन पत्र पाना संभव नहीं था। राज्यपाल पहले ही राष्ट्रपति शासन के विकल्प पर विचार कर चुके थे। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा के दबाव में यह फैसला लिया गया है। इस तरह भाजपा ने शिवसेना के झटके का जवाब दे दिया।

उधर जदयू ने एनडीए में अपनी भागीदारी पहले ही बिहार तक सीमित कर दी थी। नीतीश कुमार झारखंड में 80 फीसदी अर्थात कम से कम 60 सीटों पर लड़ने की घोषणा कर चुके हैं। अगले वर्ष बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं। अति आत्मविश्वास से भरी भाजपा यदि इसी नीति पर चलती रही तो कोई आश्चर्य नहीं जदयू भी पूरी तरह एनडीए से बाहर निकल आए। बिहार में भाजपा जदयू के मुकाबले कमजोर स्थिति में है लेकिन मोदी मैजिक और शाह की रणनीति के आधार पर अपनी ताकत आजमा सकती है। साफ जाहिर है कि भाजपा को अब सहयोगी दलों की कोई जरूरत नहीं है। वह पूरी तरह एकला चलो की नीति अपना चुकी है।

झारखंड में भाजपा का अपना बड़ा जनाधार है। आजादी के बाद दूसरे प्रदेशों से झारखंड के औद्योगिक क्षेत्रों में आई आबादी पहले ही भाजपा की समर्थक रही है। आदिवासियों में सरना और हिंदू धर्मावलंबी काफी हद तक भाजपा के साथ हैं। सिर्फ ईसाई आदिवासी उसके खिलाफ विपक्षी दलों को वोट देंगे। मुसलिम समुदाय का भी एक बड़ा हिस्सा विपक्षी दलों के पक्ष में जा सकता है। आबादी का एक बड़ा हिस्सा सदानों का है जिसमें कुरमी वोटर प्रमुख हैं। भाजपा गठबंधन से जो भी दल बाहर हुए हैं उनमें से अधिकांश सदान मतों में भागीदारी करेंगे और विपक्षी दलों के वोटबैंक में सेंधमारी करेंगे। चुनावी मैदान में ज्यादा दलों की मौजूदगी के कारण संघर्ष बहुकोणीय हो जाएगा। इससे भाजपा को लाभ ही होगा। यदि भाजपा सहयोगी दलों की मांग पूरी करती तो बहुत सी सीटें बांट देनी पड़तीं। फिर 65 पार का लक्ष्य हासिल करना संभव नहीं होता। शायद इसीलिए भाजपा नेतृत्व ने एनडीए के बिखराव की चिंता नहीं की। हरियाणा और महाराष्ट्र को छोड़ दें तो अबतक के अनुभव यही बताते हैं कि भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल करती है और नाममात्र की सीटें लाने वाले दलों को सत्ता में भागीदारी देनी पड़ जाती है। जहां तक झारखंड का सवाल है रघुवर दास अब तक के सबसे मजबूत मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया है और उनके विकास कार्य दिखाई पड़ रहे हैं। कुछ वादे वे पूरा नहीं कर सके फिर भी अबतक की सरकारों से बेहतर उपलब्धियां हासिल कीं। उनकी सरकार के किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। भाजपा को चुनौती देने वाले विपक्षी दलों का गठबंधन भी अपना पूरा स्वरूप ग्रहण नहीं कर सका। झाविमो अलग रहा। वामपंथी दल भी अलग रहे। कांग्रेस और झामुमो की एकजुटता कुछ सीटों पर परेशानी खड़ी कर सकती है लेकिन इतनी बड़ी नहीं कि उससे निपटना संभव नहीं हो। भाजपा की रणनीति कितनी कारगर साबित होगी, चुनाव नतीजे बताएंगे। एनडीए का बिखराव भी कहीं जाकर थमेगा या इतिहास के गर्त में समा जाएगा, कहना मुश्किल है।

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