घर वापसी की तैयारी में बाबूलाल!

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देवेंद्र गौतम
झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की भाजपा में वापसी की खबर सुर्खियों में है। वे आरएसएस के पुराने कार्यकर्ता रह चुके हैं। उनकी छवि साफ सुथरी रही है। झारखंड राज्य के गठन के बाद वर्ष 2000 में उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया था। लेकिन उनके कुछ फैसलों को लेकर विवाद हुआ। खासतौर पर टाटा लीज मामले को लेकर भाजपा र दबाव पड़ा और आलाकमान नाराज हो गए। इस कारण 2006 में उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी। उनकी जगह अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने। बाबूलाल मरांडी पार्टी के इस निर्णय से नाराज हो गए और उन्होंने भाजपा से इस्तीफा देकर झारखंड विकास मोर्चा नामक अलग पार्टी बना ली। उन्हें उम्मीद थी कि उनकी छवि और विकास कार्यों को लेकर झारखंड के लोगों का उन्हें जबर्दस्त समर्थन मिलेगा और उनकी पार्टी की सरकार बन जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उनकी पार्टी किसी चुनाव में दहाई अंकों तक भी नहीं पहुंच सकी। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने विपक्षी महागठबंधन में शामिल होकर चुनाव लड़ा था। लेकिन एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सके थे। पिछला विधानसभा चुनाव उन्होंने अकेले लड़ा लेकिन मात्र तीन सीटें जीत सके। इसके बाद उनकी भाजपा में वापसी के चर्चे शुरू हो गए।
दरअसल भाजपा ने 2014 में गैरआदिवासी नेता रघुवर दास को मुख्यमंत्री बनाया था। 2019 का विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा गया। लेकिन भाजपा को पराजय का मुंह देखना पड़ा। हेमंत सोरेन के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बन गई। यह भाजपा के लिए बड़ा झटका था क्योंकि झारखंड राज्य के गठन के बाद अधिकतम अवधि तक भाजपानीत एनडीए की सरकारें रही हैं। मात्र तीन वर्षों तक यूपीए के हाथ में सत्ता रही थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी झारखंड में मजबूत रहा है। आदिवासी क्षेत्रों में उसकी जड़ें मजबूत रही हैं। बदली परिस्थितियों में भाजपा को झारखंड में एक आदिवासी चेहरे की जरूरत थी। वहां भाजपा के सबसे कद्दावर आदिवासी चेहरा अर्जुन मुंडा रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में खूटी से जीत हासिल कर वे केंद्र की राजनीति में आ गए और कैबिनेट मंत्री बन गए। उन्हें झारखंड की राजनीति में वापस भेजना उचित नहीं था। ऐसे में पार्टी का ध्यान उसी कद काठी के पूर्व भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी तरफ गया। बाबूलाल मरांडी अपनी पार्टी की ताकत कई बार आजमा चुके थे। झाविमो के बैनर तले मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना उनके लिए दिवा स्वप्न के बराबर था। विपक्षी महागठबंधन में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ उनका छत्तीस का रिश्ता रहा है। इसीलिए जब भाजपा ने घर वापसी का प्रस्ताव रखा तो उनका रुख सकारात्मक रहा। अब उन्हें विपक्ष का नेता बनाए जाने की उम्मीद जताई जा रही है। मकर संक्रांति के बाद इसका फैसला होगा।
यह भाजपा के लिए भी लाभदायक होगा और बाबूलाल मरांडी के लिए भी। वे अपने झाविमो का भाजपा में विलय कर सकते हैं। ऐसे में भविष्य में उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता खुल सकता है। संघ में रह चुकने के कारण उनकी संगठनात्मक क्षमता भी अच्छी रही है। उन्हें जो भी जिम्मेवारी मिले लेकिन उनकी मौजूदगी का भाजपा को अवश्य लाल मिलेगा। झारखंड के राजनीतिक समीकरण भी बदलेंगे। इतना तय है।

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