बेरमो वासियों को एक सर्वसुलभ जन प्रतिनिधि की तलाश

बेरमो विधानसभा क्षेत्र

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देवेंद्र गौतम

बेरमो विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं के रूझान का अदाज़ा लगाना कठिन है। लेकिन एक बात साफ है कि वे एक सर्वसुलभ जन प्रतिनिधि चाहते हैं। चाहे वह लोकसभा में हो अथवा विधानसभा में। लोकसभा चुनाव के पूर्व कम से कम गिरिडीह के सांसद रवींद्र कुमार पांडेय कोयलांचल वासियों के लिए सुलभ थे। लोग उनसे मिलकर अपनी समस्याएं रख सकते थे। अब आजसू के चंद्रप्रकाश चौधरी सांसद हैं। वे रामगढ़ में रहते हैं। विधायक योगेश्वर महतो बाटुल जैना मोड़ में रहते हैं। अब विधायक से मिलने के लिए बेरमो के लोगों को कम से कम 16 किलोमीटर और सांसद से मिलने के लिए 60-65 किलोमीटर की यात्रा करनी होगी। औद्योगिक इलाकों में इतनी फुर्सत और इतना सब्र किसी के पास नहीं होता। मतदाताओं की इस चाहत का लाभ कांग्रेस प्रत्याशी राजेंद्र प्रसाद सिंह को मिल सकता है। वे पांच बार इस सीट से विधायक रह चुके हैं। वे बेरमो के ह्रदयस्थल ढोरी स्टाफ कॉलोनी में रहते हैं। उनसे कोई भी कभी भी मिल सकता है। इंटक के राष्ट्रीय महासचिव होने के नाते वे मजदूर वर्ग और प्रबंधन के बीच के अंतर्संबंधों को जानते हैं। वे युवा बेरोजगारों को रोजगार से जोड़ने का काम भी करते रहे हैं और मजदूरों के हितों के लिए परिणाममूलक संघर्ष भी करते रहे हैं। विधायक और मंत्री रहने के दौरान उन्होंने विकास कार्यों को बेहतर अंजाम दिया था। संयुक्त बिहार में तो वे अपराजेय रहे थे। झारखंड बनने के बाद उन्हें सिर्फ 2005 और 2014 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। 2005 में अलग झारखंड के गठन में अहम भूमिका निभाने के नाते भाजपा के प्रति लोगों का झुकाव था जबकि 3014 में मोदी फैक्टर अपने उफान पर था। अभी कोई लहर नहीं है। महागठबंधन का साझा प्रत्याशी होने के नाते झामुमो के परंपरागत मतों का झुकाव उनकी तरफ रहेगा। राजद का इस विधानसभा क्षेत्र में खास जनाधार नहीं है लेकिन जो भी है वह निःसंदेह कांग्रेस के खाते में ही जाएगा।

भाजपा उन्मीदवार योगेश्वर महतो बाटुल दो बार विधायक रह चुके हैं। उनके जनसंपर्क में कमी नहीं है लेकिन सत्ताधारी दल का विधायक होने के नाते क्षेत्र की जनता की उनसे जो उम्मीदें थीं उनपर वे पूरी तरह खरे नहीं उतर पाए हैं। कार्यकर्ताओं के एक हिस्से में भी उनके प्रति नाराजगी देख जा रही है। हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों के बाद मोदी मैजिक और अमित शाह की रणनीति की हवा निकल चुकी है। हिंदुत्व का एजेंडा भी घिस चुका है। ऐसे में योगेश्वर प्रसाद सिर्फ अपने जातिगत मतों पर भरोसा कर सकते हैं। बेरमो विधानसभा क्षेत्र में कुर्मी जाति के लोगों की खासी संख्या है। उनपर कुछ अंधभक्तों की कृपा भी हो सकती है। लेकिन पार्टी की तरफ से उन्हें विशेष मदद मिलने के आसार कम ही दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया है। हालांकि विभिन्न दलों और निर्दलियों को मिलाकर कुर्मी जाति के मतों के और भी हिस्सेदार मैदान में हैं। यह उनके लिए नुकसानदेह है। कोयला खदान क्षेत्रों में भारतीय मजदूर संघ की अच्छी पकड़ है लेकिन भाजपा की आर्थिक-औद्योगिक नीतियों से उसके नेता इत्तेफाक नहीं रखते। उनका संसदीय राजनीति से विशेष सरोकार नहीं रहता। खासतौर पर सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को बेचने और निजी कंपनियों को बढ़ावा देने की नीति से वे खफा हैं। लिहाजा उसका बड़ा हिस्सा तटस्थ रहेगा। उसकी तटस्थता का सीधा लाभ कांग्रेस को मिलेगा।

सीपीआई ने आफताब आलम को मैदान में उतारा है। वे अपने समय के एटक के धुरंधर श्रमिक नेता स्व. कामरेड शफीक खान के साहबजादे और उनके उत्तराधिकारी हैं। वामपंथी दलों और मजदूर संगठनों का उन्हें पूरा समर्थन मिलेगा। वे मुख्य संघर्ष में रहेंगे लेकिन चुनावी मैदान में बहुत सारे फैक्टर काम करते हैं उनके साथ वे कितना सामंजस्य बिठा पाते हैं उनका प्रदर्शन इसपर निर्भर करेगा। हालांकि चुनाव का ऊंट कब किस करवट बैठे, कब कौन सी हवा चलने लगे कोई नहीं जानता लेकिन फिलहाल मुख्य संघर्ष कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होता दिख रहा है। इसमें कौन बाजी मार ले जाएगा कहना कठिन है।

 

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