कोरोनाः हर मोर्चे पर सतर्कता की जरूरत

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

लॉकडाउन में बिहार और झारखंड के हजारों दिहाड़ी मजदूर उत्तर प्रदेश में फंसे हुए हैं। वहां की राज्य सरकार मानवता के नाते उनके रहने-खाने की व्यवस्था कर रही है। उनकी मदद का दायित्व योगी सरकार का नहीं बल्कि उस राज्य है जहां वे काम करते थे या फिर उस राज्य का जहां के वे निवासी हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए 100 करोड़ रुपये खर्च करने की बात कही थी। लेकिन जब केंद्र सरकार ने यातायात के सारे साधन बंद कर दिए और वे जहां हैं वहीं उन्हें रोक लेने और उनके रहने खाने की व्यवस्था करने का आदेश जारी किया तबतक उनका अधिकांश हिस्सा उत्तर प्रदेश के इलाकों से गुजर रहा था। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें घर तक पहुंचाने के लिए दिल्ली-यूपी बार्डर पर एक हजार बसें भेज दी थीं। केंद्र सरकार के आदेश के बाद योगी सरकार उन्हें उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाने का वादा तो पूरा नहीं कर सकी लेकिन उनकी और जो रास्ते में पैदल चले जा रहे थे, उनकी भी पूरी व्यवस्था की।

इसमें स्थानीय नागरिकों और संस्थाओं की मदद भी मिली लेकिन बिहार की नीतीश सरकार या झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने उनकी मदद के लिए कोई व्यवस्था नहीं की बल्कि उल्टे बार्डर सील करके जो बार्डर तक पहुंच चुके थे उन्हें भी राज्य में प्रवेश करने से रोक दिया। झारखंड तक तो वे पहुंच ही नहीं सके। प. बंगाल से  जो दिहाड़ी मजदूर झारखंड की ओर चले झारखंड सरकार ने उन्हें सीमा पर रोक लिया। नियमानुसार झारखंड और बिहार सरकार को चाहिए था कि उनके प्रदेश के जो मजदूर पड़ोसी राज्यों में फंसे हुए हैं उनकी मदद के लिए संबंधित राज्यों की सरकारों से बात कर राहत सामग्री भेजतीं। लेकिन उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। वे अपने राज्य में कोरोना के प्रसार को रोकने में लगी रहीं लेकिन दूसरे राज्यों में फंसे अपने राज्य के मजदूरों की चिंता नहीं की।

दरअसल आपातकाल में समय पर हर मोर्चे पर नजर रखना और सटीक निर्णय लेना सरकार की दूरदर्शिता और कुशल प्रशासनिक क्षमता का द्योतक होता है। इस मामले में सरकारी स्तर पर कई चूकें हुई हैं। अभी उनकी समीक्षा का सही समय नहीं है लेकिन अभी भी सचेत होने का समय अवश्य है। अब जबकि लॉकडाउन का दूसरा चरण शुरू हो चुका है जो 3 मई तक चलेगा, इसपर ध्यान देने की जरूरत है। इस चरण में देश के विभिन्न इलाकों को तीन जोन में बांटा गया है। हॉटस्पाट, रेड जोन और ग्रीन जोन। 20 अप्रैल के बाद ग्रीन जोन वाले इलाकों में पाबंदियों में कुछ छूट दी जा रही है जिसकी घोषणा हो चुकी है। हॉटस्पाटों में कोरोना के खिलाफ सघन अभियान चलेगा। रेड जोन में सतर्कता बरती जाएगी और ग्रीन जोन में कुछ आर्थिक गतिविधियां शुरू हो जाएंगी।

कोरोना के खिलाफ यह रणनीति ज्यादा व्यवहारिक और कारगर साबित हो सकती है। बिहार और झारखंड में ग्रीन जोन ज्यादा हैं और ह़ॉटस्पाट नगण्य हैं। लिहाजा झारखंड और बिहार की सरकारों को चाहिए कि अपने नागरिकों की चिंता करें। उनकी जो राज्य के अंदर हैं और उनकी भी जो राज्य के बाहर फंसे हुए हैं। इन सरकारों को चाहिए कि उन्हें वापस बुलाकर उनकी जांच कराए क्वारंटाइन में डाले और ग्रामीण इलाकों में कुटीर उद्योगों के विस्तार की व्यापक मुहिम चलाए ताकि भविष्य में मजदूरों के पलायन की जरूरत न पड़ें। उन्हें अपने घर पर ही स्वरोजगार के साधन मिल जाएं।

बिहार और झारखंड के लोगों में होम सिकनेस यानी गृहमोह कम रहा है। इसीलिए वे दुनिया के विभिन्न इलाकों में रोजगार कमाने चले जाते हैं। यह उनकी विवशता भी है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संकटग्रस्त होने के कारण ऐसा होता रहा है। अब कोरोना काल के बाद गांवों को खुशहाल बनाने वहां रोजगार का सृजन करने की आवश्यकता है। यह नरेगा और अन्य योजनाओं के भरोसे नहीं हो सकता। इसपर गहन चिंतन और योजनाबद्ध तरीके से काम करने की आवश्यकता है। संसाधनों की कोई कमी नहीं है। सिर्फ उनके प्रबंधन की जरूरत है।

1 Comment
  1. अरुण सिन्हा says

    बहुत सही आकलन है।झारखंड और बिहार सरकार के मुख्य मंत्रियों को यह अवश्य भेजना चाहिए

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