दूसरे राज्यों में फंसे लोगों की घर वापसी को हरी झंडी

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लॉकडाउन में फंसे लोगों की घर वापसी के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए सशर्त अंतर्राज्यीय परिवहन की छूट दे दी है। उन्हें अपने घर में प्रवेश करने से पहले क्वांटराइन में रहना होगा। चलने के पहले और पहुंचने के बाद उनकी जांच होगी। इन प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद वे घर जा सकेंगे। 25 मार्च को लॉकडाउन शुरू होने के बाद भारी संख्या में लोग विभिन्न शहरों में फंसे हुए हैं। राज्य सरकारों और सामाजिक संगठनों ने उनके ठहरने और खाने की व्यवस्था की है। लॉकडाउन-2 3 मार्च को खत्म होने जा रहा है। कोरोना संक्रमण की स्थिति देश के कई इलाकों में नियंत्रण में है लेकिन कुछ महानगरों और शहरों में स्थिति विकट है। राजधानी दिल्ली में हॉटस्पाट की संख्या बढ़ती जा रही है। मुंबई, अहमदाबाद, मध्य प्रदेश, कोलकाता आदि में स्थिति गंभीर है। इस स्थिति में रेड जोन वाले इलाकों में 3 मई के बाद भी लॉकडाउन की अवधि बढ़ानी पड़ सकती है। लिहाजा फंसे हुए लोगों की घर वापसी जरूरी हो गई है। नियमतः 25 मार्च को लॉकडाउन लगू करने से पूर्व अथवा तुरंत बाद उनकी घर वापसी की व्यवस्था करनी चाहिए थी। इससे लॉकडाउन ज्यादा सफल रहता और वायरस का चेन तोड़ना ज्यादा आसान होता। बहरहाल अभी भी यह निर्णय उनके लिए राहत की बात है। अब यह राज्य सरकारों पर निर्भर है कि अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए क्या इंतजाम करते हैं।

अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए केंद्र सरकार की अनुमति लेने की कोई बाधा नहीं रही। 27 मार्च को पीएम मोदी के साथ वीडियो कांफ्रेंसिग के दौरान नीतीश जी ने केंद्र से इसके लिए स्पष्ट नीति की मांग की थी। इससे पूर्व नीतीश कुमार छात्रों और मजदूरों की गुहार सुनकर भी अनसुनी कर रहे थे। उनपर संवेदनहीनता, निष्ठुरता, बहानेबाजी आदि के आरोप लग रहे थे। बिहार सरकार दावा कर रही थी कि उन्होंने प्रवासी मजदूरों के खाते में एक-एक हजार रुपये डलवाए हैं और राज्य सरकारों के जरिए उनकी मदद कर रहे हैं। बिहार के ज्यादातर मजदूर उत्तर प्रदेश में फंसे थे। उनमें से कहीं से भी बिहार सरकार की मदद की कोई रिपोर्ट मीडिया में नहीं आई। खैर जो हुआ सो हुआ अब उन्हें अपने राज्य के प्रवासी मजदूरों, छात्रों और अन्य नागरिकों को वापस लाने की व्यवस्था करनी चाहिए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सहित कई राज्यों की सरकारें बसों की व्यवस्था कर अपने लोगों को नियम बनने से पहले ही बसें भेजकर वापस ला चुकी हैं। नीतीश जी ने इसकी आलोचना की थी। वे लॉकडाउन के सख्ती से पालन के पक्ष में थे। हेमंत सोरेन ने इस मुद्दे पर ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की थी। साधनों की कमी की बात जरूर की थी। केंद्र से इसके लिए मदद मांगी थी। छात्रों के संबंध में बेहतर होगा कि वे उनके अभिभावकों का आह्वान कर उनके बच्चों के संबंध में पूरी सूचना के साथ निबंधन की व्यवस्था करें अगर वे आर्थिक सहयोग करना चाहें तो से स्वीकार करें। मजदूरों की वापसी के लिए मुख्यमंत्री आपदा कोश में राज्य के नागरिकों और उद्योगपतियों से आर्थिक सहयोग लें और जन-सहयोग की एक मिसाल कायम करें।

बिहार झारखंड सरकारों को प्रवासी मजदूरों को उनके घर के पास रोजगार उपल्ब्ध कराने की व्यवस्था प्राथमिकता के आधार पर करनी होगी। अभी चीन से जो 1000 बड़ी कंपनियां वापस लौट रही हैं, उन्हें भारत में प्लांट लगाने की सुविधा देने के संबंध में केंद्र सरकार ने रविशंकर प्रसाद जैसे अनुभवी मंत्री को लगा रखा है। उनके प्लांट बेहतर आधारभूत संरचना वाले ग्रामीण इलाकों में लगें तो रोजगार के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अवसर उत्पन्न होंगे। नीतीश कुमार और हेमंत सोरेन को इस अवसर का लाभ उठाने के लिए तत्पर रहना चाहिए। इससे प्रवासी मजदूरों को रोजगार मिलेगा। इसके अलावा अन्य विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए।

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