क्या सचमुच हो चुका है नक्सलियों का खात्मा

फिर किसने किया लातेहार में सुरक्षा बलों पर हमला

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

रांची। झारखंड में नक्सलियों के संबंध में दो तरह की रिपोर्ट है। एक राजनीतिक, दूसरी प्रशासनिक। राजनीतिक रिपोर्ट सीएम रघुवर दास और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के पास है। प्रशासनिक रिपोर्ट चुनाव आयोग के पास है। दोनों ही रिपोर्टें एक दूसरे का खंडन करती हैं। राजनीतिक रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में नक्सली समस्या का अंत हो चुका है। यह रघुवर सरकार की बड़ी उपलब्धि है। सरकार ने कर दिखाया है। मुख्य चुनाव आयुक्त के पास उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के 18 जिले नक्सल प्रभावित हैं। इसी आधार पर पांच चरणों में विधानसभा चुनाव कराने का फैसला लिया गया।

राजनीतिक दृष्टि से झारखंड राज्य अलग होते और भाजपा की सरकार बनते ही नक्सल समस्या का खात्मा हो चुका था। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने अपनी जनसभाओं में इसका ऐलान भी करना शुरू कर दिया था। वे पूरे दावे के सात कहते थे कि नक्सलियों के पांव उखड़ चुके हैं। वे जंगलों में भागे फिर रहे रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जब-जब मरांडी जी यह दावा करते थे, नक्सली हिंसा की कोई बड़ी घटना होती थी। वे निरपराधों का खून बहाकर अपनी मौजूदगी का अहसास कराते थे। सरकार फिर भी अपना राग अलापती थी। अभी भी यही हो रहा है। सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ होती रहती है। नक्सली हिंसक वारदातों को अंजाम देते रहते हैं।

22 नवंबर को गृह मंत्री अमित शाह और सीएम रघुवर दास ने चुनावी अभियान का आगाज करते हुए मनिका और लातेहार में फख्र के साथ कहा कि उनकी सरकार ने नक्सलियों का सफाया कर दिया। विपक्षी सरकारें यह काम नहीं कर पाईं। हमने कर दिखाया। इस ऐलान के दूसरे ही दिन लातेहार स्थित नेशनल हाइवे 22 पर सुरक्षा बलों के वाहन पर नक्सली हमला हुआ जिसमें एक एएसआई और तीन होमगार्ड के जवान शहीद हो गए।  सीएम रघुवर दास इससे पहले भी इस तरह के दावे करते रहे हैं और इसी तरह नक्सली हिंसा की घटनाएं होती रही हैं। इस तरह का दावा वही कर सकते हैं जो नक्सलियों की रणनीति और उनकी कार्यशैली के बारे में नहीं जानते। जो इस समस्या के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं को समझने की कोशिश नहीं करते। इसे सीधे विधि-व्यवस्था की समस्या मान लेते हैं और बंदूक के बल पर समाधान निकालने का प्रयास करते हैं। बाबूलाल के समय में नक्सलियों के आत्मसमर्पण के नाटक भी खूब हुए थे। उसमें पुलिस रिकार्ड में ग्रामीणों के आपसी वैमनस्य के कारण नक्सली सूची में शामिल लोगों का आत्मसमर्पण कराकर वाहवाही लूटी गई थी। इस तरह के हवाई दावे कभी सच्चाई बयान नहीं करते बल्कि नक्सलियों को उकसाने का काम करते हैं। डींग हांकने से सच्चाई नहीं बदल जाती।

स्वयं मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने पत्रकारों के सवाल पर कहा कि प्रशासन की तरफ से उन्हें नक्सलवाद के खात्मे की कोई रिपोर्ट नहीं मिली है। इस तरह के हवाई और खोखले दावे करना भाजपा की राजनीतिक शैली रही है। 19 साल पहले बाबूलाल मरांडी भी जब भाजपा में थे तो ऐसे दावे करते थे। इस क्रम में उन्हें अपने परिजनों को गंवाना पड़ा और स्वयं भी नक्सलियों की हिट लिस्ट में शामिल हुए। भाजपा छोड़ने के बाद वे नक्सलियों का विरोध तो करते हैं लेकिन उनके खात्मे की बात नहीं करते। सत्ता से बाहर होने पर उन्हें ज़मीनी हक़ीकत दिखाई देने लगी है। डींगें हांकने का समय निकल गया।

दरअसल नक्सली समय-समय पर एक रणनीति के तहत कुछ समय शांत रहते हैं फिर दुगनी ताकत के साथ वापस लौट आते हैं। उनकी कार्यशैली को समाजवादी और मध्यमार्गी दलों के नेता समझते हैं इसलिए इस तरह के हवाई दावे नहीं करते। 70 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने प. बंगाल में नक्सलवाद की सफलतापूर्वक कमर तोड़ी थी लेकिन उन्होंने अपनी पीठ स्वयं नहीं थपथपाई थी। डींगें नहीं हांकी थीं। उन्हें पता था कि यह समस्या प.बंगाल में हल होगी मगर दूसरे इलाकों में फिर पनपेगी। हुआ भी यही। इसके बाद यह समस्या मध्य बिहार में उभरी और लंबे समय हिंसा के तांडव क गवाह बनी। नरसंहारों की एक लंबी सूची बन गई। दक्षिणपंथियों के साथ समस्या यह है कि वे नक्सलवाद से घृणा करते हैं लेकिन उसके स्वरूप को समझने की चेष्टा नहीं करते। उसके पनपने और फैलने के कारणों की पड़ताल नहीं करते। इसे प्रशासनिक स्तर पर हल करने की चेष्टा करते हैं और थोड़ी सफलता मिलने पर डींगें हांकने लगते हैं।

भाजपा के हवाई दावों का यह सिलसिला जम्मू-कश्मीर, पाकिस्तान और अयोध्या पर भी लागू होता है। मोदी सरकार के मुताबिक अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाकर आतंकवाद का खात्मा कर दिया गया है। 70 वर्षों से लंबित कश्मीर समस्या का निदान कर दिया गया है। कांग्रेस नहीं कर सकी। मोदी सरकार ने कर दिखाया। सवाल है कि यदि कश्मीर घाटी में आतंकवाद और अलगाववाद का खात्मा हो चुका है तो एक लाख से अधिक सुरक्षा बलों को क्यों तैनात रखा गया है? वहां साढ़े तीन महीने बाद भी जन-जीवन सामान्य क्यों नहीं हो पा रहा है? आतंकी गोला-बारूद लेकर घाटी में कैसे घूम रहे हैं? दिनदहाड़े हत्याएं कौन कर रहा है? हाट-बाजार क्यों नहीं खुल पा रहे हैं? सोपोर मंडी में सन्नाटा क्यों है? कौन लोग हैं जो धमकी भरे पोस्टर साटकर दहशत फैला रहे हैं?

अयोध्या मुद्दे पर देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले पर सवालिया निशान क्यों खड़े किए जा रहे हैं। मुसलिम समाज का एक हिस्सा फैसले को स्वीकार कर रहा है तो दूसरा हिस्सा इसे न्याय मानने से इनकार कर रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है। न व्यापक समर्थन दिख रहा है न व्यापक विरोध।

आतंकवाद का खात्मा होने और कश्मीर समस्या का हल होने के बाद यह सब तो नहीं होना चाहिए। वहां अमन चैन कायम हो जाना चाहिए। गंभीर सरकारें काम करती हैं काम का ढिंढोरा नहीं पीटतीं। लेकिन मोदी सरकार 25 फीसज काम करती है तो 100 फीसद ढिंढोरा पीटती है। थोड़ी गंभीरता आ जाती तो यह सरकार सचमुच इतिहास बना जाती।

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