अवैध खबरिया चैनल भी चलाता है सन्मार्ग प्रबंधन

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

नई दिल्ली। रांची के सन्मार्ग अखबार का प्रबंधन कभी सन्मार्ग पर चलना पसंद नहीं करता। वह कुमार्ग की राह पर कोई क्या कर लेगा के अंदाज़ में सीना तानकर चलता रहा है। नियमों कानूनों की परवाह नहीं की। सूचना के अधिकार के तहत पूछ गए एक प्रश्न के जरिए ज्ञात हुआ है कि सन्मार्ग प्रबंधन तीन दैनिक अखबारों के अलावा सन्मार्ग लाइव नामक एक खबरिया चैनल भी चलाता है जिसके लिए वैधानिक औपचारिकताएं पूरी करने की कभी भी जरूरत नहीं समझी। सूचना एवं प्रसारण विभाग के अवर सचिव विजय कौशिक ने आरटीआई के तहत पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में कहा है कि मंत्रालय की ब्राडकास्ट सेवा की वेबसाईट पर प्राइवेट सैटेलाइट चैनल्स की सूची  में सन्मार्ग लाइव पंजीकृत नहीं है। उन्होंने बिहार-झारखंड के तीन चैनलों का गैरकानूनी ढंग से प्रसारण का उल्लेख किया है। सन्मार्ग पब्लिकेशन रांची प्राइवेट लिमिटेड के मालिक प्रेम अपने को सरकारी तंत्र से ऊपर समझते हैं।

उन्हें लगता है कि मीडिया हाउस में इतनी ताकत होती है कि कोई सरकारी विभाग उसपर हाथ नहीं डाल सकता। इसीलिए कंपनी लॉ और लेबर लॉ की उन्होंने कभी परवाह नहीं की। पीएफ मामले को भी वे हल्के में ले रहे थे। उन्हें लगता था कि वे मैनेज कर लेंगे। लेकिन जब नवल किशोर सिंह को द्वारा दर्ज कराए गए मामले की सुनवाई के बाद पीएफ कमिश्नर ने 97 लाख से अधिक का जुर्माना ठोक दिया तो उनके होश ठिकाने आ गए। इससे 21 कर्मियों को लाभ हो रहा है। इस फैसले के बाद संस्थान के अन्य कर्मी जिनकी संख्या 50 से भी ज्यादा है स्वयं को ठगा गया महसूस कर रहे हैं। कल तक मालिक के सामने भीगी बिल्ली बने रहने वाले वे कर्मी भी अब पीएफ कमिश्नर के समक्ष अपनी भविष्य निधि के दावे कर रहे हैं। इन्हीं कर्मियों ने मुकदमा दर्ज होने के बाद प्रबंधन के दबाव में आकर लिखित रूप से दे दिया था कि उन्हें पीएफ, ईएसआई आदि की तमाम सुविधाएं मिल रही हैं। वेतन वृद्धि भी हो गई है। उनकी मांगें पूरी हो चुकी हैं। जबकि पीएफ कार्यालय में संस्थान का कोई रिकार्ड ही उपलब्ध नहीं है। सच्चाई यही है कि सभी कर्मियों को दो-दो, तीन-तीन महीने के अंतराल पर बंधुआ मजदूरों की तरह कतार में खड़ा करके नकद भुगतान किया जाता रहा है। प्रेम साहब  को पहली बार कानून का जोरदार झटका लगा है। पहली बार पता चला है कि मीडिया को भी नियमों का पालन करना पड़ता है। अब अवैध रूप से खबरिया चैनल चलाने का मामला भी उनकी गर्दन पर तलवार की तरह लटक रहा है।

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