झारखंडः बीस वर्षों का सफरनामा

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

झारखंड राज्य के बालिग हुए दो वर्ष हो चुके हैं। अब यह 20 वर्ष का बांका जवान हो चुका है। 21 वीं सदी के पहले साल 2000 में तीन नए राज्यों का गठन हुआ था। झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़। इस बात के 20 साल हो गए। उनमें संसाधनों के लिहाज से सबसे समृद्ध राज्य झारखंड था। लेकिन आज यह अपने दो हमउम्रों के मुकाबले विकास की दौड़ में काफी पीछे छूट गया है। हर वर्ष की तरह झारखंड में 15 नवंबर को भगवान बिरसा की जयंती पर स्थापना दिवस मनाया गया। इस मौके पर भव्य सरकारी उत्सव मनाया जाता रहा है। लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि यह अभी तक यह जन-जन का उत्सव नहीं बन पाया। ऐसा क्यों है? इस बात पर भी मंथन होना चाहिए। अलग राज्य की मांग के पीछे जनता की जो आकांक्षाएं थीं 20 वर्षों के बाद उनकी कहां तक पूर्ति हो सकी है? अगर हम दो दशकों की इस यात्रा के पन्ने खोलें तो यह साफ नज़र आता है कि सत्तारूढ़ दलों की आकांक्षाएं तो पूरी हुईं। लेकिन आम झारखंडियों की बुनियादी जरूरतें अभी भी पूरी होनी बाकी है। जिस विकास के दावे किए जाते हैं वह अलग राज्य नहीं बनने पर भी पूरे होते। चार-छह लेन की सड़कें फिर भी बनतीं क्योंकि यह विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए जरूरी था। गांव-गांव बिजली फिर भी पहुंचाई जाती। भले उनमें करंट दौड़ता या नहीं। लेकिन पेयजल की व्यवस्था करना जरूरी नहीं था सो नहीं किया गया। जनता की बुनियादी जरूरतें पूरी करना जरूरी कभी नहीं समझा गया।

भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2019-20 के अनुसार अभी तक झारखंड में सामान्य परिवारों में मात्र 23.2 प्रतिशत घरों के अंदर पानी की सुविधा मिल सकी है। 44.9 प्रतिशत के घर के पास पानी का कोई न कोई प्राकृतिक स्त्रोत है। लेकिन 31.9 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिन्हें पानी के लिए दूर तक जाना होता है।

पेयजल को लेकर राज्य में जल जीवन मिशन योजना चल रही है। केंद्र और राज्य सरकार की इसमें 50-50 की हिस्सेदारी है। योजना के माध्यम से सभी जिलों में 2024 तक हर घर को नल से जल की सुविधा देनी है। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री मिथिलेश ठाकुर का कहना है कि जलसंकट का हर हाल में निदान करने का लक्ष्य है। मिशन के तहत हर परिवार पर 47 हजार रुपये खर्च होंगे। टोलों की बसावट एवं जल स्रोत की दूरी अधिक है। इसके चलते योजना की लागत लगभग 65 हजार से 75 हजार रुपये तक पहुंच जा रही है। ऐसे में शेष राशि का खर्च राज्य सरकार को ही वहन करना है।

झारखण्ड विडम्बनाओं का राज्य है। विडम्बना है कि यहाँ के पानी मे सबसे ज्यादा आयरन है, लेकिन यहाँ की 67 फीसद ग्रामीण महिलाएँ एनीमिया की शिकार हैं। विडम्बना है कि विश्व के सबसे बड़े कोयले के भण्डार में ही बिजली की सबसे ज्यादा कमी है। विडम्बना है कि जो धरती दुनिया में खनिज के लिए जानी जाती है,  वहाँ गरीबी है, भुखमरी है। विडम्बना है कि पर्यटन की असीम सम्भावना लिए यह राज्य पलायन का दंश झेल रहा है। दिलचस्प बात है कि ये विडम्बनाएं इत्तेफाक नहीं हैं। यह नतीजा है सरकारों के नकारेपन का, उनकी नीतियों का और उनकी लापरवाही का।

20 साल पहले जिन उद्देश्यों के साथ झारखण्ड राज्य की स्थापना हुई थी, उनमें से एक भी पूरा होता नजर नहीं आता। शिक्षा, स्वास्थ्य, इन्फ्रास्ट्रक्चर और रोजगार जैसे मूल मुद्दों पर सभी सरकारें विफल रही हैं। इतने सालों में तमाम सम्भावनाओं के बावजूद इस राज्य के पास एक भी बड़ी उपलब्धि नहीं है। कारणों पर जाने से पहले हमें सिलसिलेवार ढंग से सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को आंकड़ों के आधार पर समझने की जरूरत है।

झारखंड खनिज संपदा से भरा हुआ राज्य है। प्राकृतिक संसाधनों के मामले में यह देश का सर्वाधिक धनी राज्य रहा है। लेकिन प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो यह पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों की तुलना में आधी है। गरीबी की राष्ट्रीय औसत दर 22 प्रतिसत है जबकि झारखंड में यह 37 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी 37 प्रतिशत है। पिछले तीन साल में 23 से अधिक लोगों की भूख से मौत हो चुकी है। चिकित्सा सुविधा की बात करें तो रिम्स के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र का एक भी बड़ा अस्पताल नहीं बन पाया है। देवघर में एक  एम्स अवश्य निर्माणाधीन है। जिला स्तरीय अस्पतालों की हालत दयनीय है। वे जरा भी गंभीर मरीज होने पर सीधे रिम्स में रेफर करते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में झारखंड देश के सबसे बदतर राज्यों में शुमार होता है। 19 वर्षों तक तो सरकार किराये के भवनों से संचालित होती रही है। 2019 में विधानसभा के नए भवन का निर्माण संभव हुआ। शहरीकरण की रफ्तार भी बेहद धीमी है। आधारभूत संरचना की बात करें तो सड़कों को छोड़कर कुछ भी ठोस कार्य नहीं हो सका है। की शहरों में एयरपोर्ट बनाने की घोषणा हुई थी लेकिन अभी तक लोगों को हवाई यात्रा के लिए रांची पर ही निर्भर रहने की विवशता है। रांची जमशेदपुर हाइवे की स्थिति जर्जर है। सैकड़ों लोग सड़क दुर्घटना में जान गंवा चुके हैं। 1964 में बोकारो इस्पात संयंत्र के बाद कोई बड़ा कारखाना नहीं खुल सका है। एमओयू तो खूब हुए लेकिन सरज़मीन पर कोई उद्योग नहीं लगा। घर-घर बिजली पहुंचाने की बात थी लेकिन बिजली के संकट के कारण दर्जनों छोटे और मध्यम उद्योगों को दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ा। शिक्षा की हालत यह है कि 2018 में 4600 ऐसे स्कूल बंद कर दिए गए जिन्हें राज्य गठन के बाद खोला गया था। अब 6466 स्कूल बंद करने की योजना है। राज्य गठन के बाद राज्य की आबादी करीब एक करोड़ बढ़ी लेकिन स अनुपात में स्कूल नहीं खुले। की बड़ा शिक्षम संस्थान नहीं खुला। पिछले 20 साल में जेपीएससी की सिर्फ छह परीक्षाएं संपन्न हो सकीं उनमें भी चार विवादित रहीं। रोजगार की जगह काम के लिए 5 लाख से ज्यादा लोगों को दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ा है। कोरोना काल में उनमें से बड़ी संख्या में कष्टदायक यात्रा कर लोगों को घर वापस लौटना पड़ा। राज्य सरकार ने उन्हें उनके घर के पास रोजगार देने का वादा किया। इसकी पहल भी ही लेकिन कुछ ठोस परिणाम सामने नहीं आया। पलायन के अलावा मानव तस्करी की समस्या भी गहरी है लेकिन इसे जितनी गंभीरता से लेना चाहिए था, नहीं लिया गया। मानव तस्करी के राष्ट्रीय औसत में करीब 18 प्रतिशत मामले झारखंड के होते हैं। हर वर्ष करीब 8 लोग भुखमरी का शिकार होते हैं। भूख से मौत के अधिकांश मामले बीमारी से मौत के मद में जोड़ लिए जाते हैं।

झारखंड राज्य के गठन के बाद यदि रघुवर दास के कार्यकाल को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश समय आदिवासी मुख्यमंत्री रहे हैं लेकिन उनका ध्यान कोयला और दूसरे खनिजों की बिक्री और कमीशनखोरी की ओर रहा है। मधु कोड़ का कार्यकाल तो कोल ब्लॉक के आवंटन में भारी घोटाले के लिए चर्चित रहा है। झारखंड में पर्यटन विकास की भारी संभावना है लेकिन पर्यटन क्षेत्रों में आधारभूत संरचना के विकास पर ध्यान नहीं दिया गया। फिल्मों की शुटिंग के लिए रमणिक स्थल भरे पड़े हैं। कई फिल्मों की शुटिंग ही भी है। लेकिन सरकार ने इसे भी प्रोत्साहित नहीं किया। झारखंड के फिल्मकार फिल्म सिटी के निर्माण की मांग करते रहे लेकिन इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ। झारखंड में अवसरों की कमी नहीं है। कमी है हुक्मरानों की इच्छा शक्ति की। जनहित के कार्यों के प्रति सकारात्मक सोच की।

पिछले दो दशकों में विकास के नाम पर संसाधनों का दोहन होता रहा। सत्ताधीशों और उनकी छत्रछाया में बैठे माफिया सरदारों की तिजोरी भरती रही लेकिन झारखंड की जनता जहां 20 पहले खड़ी थी वहीं आज भी खड़ी है। ग्रामीण क्षेत्र सरकार की प्राथमिकता में कभी शामिल नहीं रहे। जल, जंगल, ज़मीन की लूट होती रही। सीएनटी, पत्थलगड़ी, लैंड बैंक. स्थानीयता, 5 वीं अनुसूची को लागू किया जाना आदि तमाम मुद्दे आज भी ज्यों के त्यों हैं। नक्सलवाद की समस्या फिलहाल कुछ नियंत्रण में दिखाई दे रही है लेकिन यह नक्सली संगठनों की कार्यशैली का एक हिस्सा हो सकती है। यह कब फिर भड़क उठेगी कहना कठिन है।

राज्य के गठन के मूल में आदिवासी समाज रहा है और वह आज भी अपनी बदहाली से उबर नहीं पाया है। जिस दिन वह खुशहाल होगा उस दिन राज्य स्थापना दिवस पर सरकार से ज्यादा समज में उत्सव होगा। लेकिन वह दिन कब आएगा कहना मुश्किल है।

 

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