लालू प्रसाद बनेंगे महागठबंधन के खेवनहार

रिम्स में लालू से मिले हेमंत सोरेन, अब जेल से बनेगी चुनाव की रणनीति

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देवेंद्र गौतम

झारखंड में राजद का कुछेक सीमावर्ती इलाकों में जनाधार है। पार्टी दो फांक हो चुकी है। लेकिन जेल में सज़ा काट रहे लालू प्रसाद की राजनीतिक सूझ-बूझ का लोहा आज भी विपक्षी नेता मानते हैं। यही कारण है कि झारखंड में महागठबंधन के नेता हेमंत सोरेन ने रिम्स में इलाजरत लालू प्रसाद से मुलाकात की और उनसे महागठबंधन के फैसले लेने का अनुरोध किया। लालू प्रसाद संयुक्त बिहार के समय से शिबू सोरेन के अभिन्न राजनीतिक मित्रों में रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा से राजद और कांग्रेस का पुराना संबंध रहा है। यही कारण है कि हेमंत सोरेन लालू प्रसाद को अभिभावक तुल्य सम्मान देते हैं। लालू की गैर मौजूदगी के कारण लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में राजद को सफलता नहीं मिली। भाजपा जानती है कि वे चुनाव प्रचार में उतरे तो हवा बदलने की ताकत रखते हैं। इसीलिए उन्हें चुनाव के दौरान बाहर नहीं निकलने दिया जाता। चूंकि वे झारखंड की जेल में हैं इसलिए जेल में रहते हुए भाजपा के खिलाफ कारगर रणनीति बना सकते हैं। ऐसा कांग्रेस भी मानती है और झामुमो भी।

हालांकि इसबार झाविमो महागठबंधन से दूरी बनाकर चल रही है। बाबूलाल मरांडी ने साफ कह दिया है कि उनकी पार्टी सभी सीटों पर लड़ेगी। कांग्रेस उन्हें साथ लाने के पक्ष में हैं। इस संबंध में बात भी चल रही है लेकिन बाबूलाल अपनी बात पर अड़े हुए हैं। झामुमो के साथ बाबूलाल का छत्तीस का आंकड़ा रहा है। लोकसभा में साथ रहे लेकिन विधानसभा में वे हेमंत के नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर सकते। 2014 के विधानसभा चुनाव में झाविमो को आठ सीटों पर जीत हासिल हुई थी लेकिन उनमें से छह विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे। अब बाबूलाल विधानसभा चुनाव में अपना दम-खम दिखाना चाहते हैं। टिकट मिलने की उम्मीद को देखते हुए विभिन्न दलों के सौ से अधिक लोग रांची में आयोजित मेगा मिलन समारोह में झाविमो में शामिल हो चुके हैं। चुनाव में बाबूलाल के झाविमो को कितनी सफलता मिल पाती है, नतीजे बताएंगे। फिलहाल वे एनडीए और महागठबंधन के बीच तीसरा कोण बनाने की तैयारी में हैं। लालू प्रसाद वामपंथी दलों को पांच सीटें देने के पक्ष में हैं। इसपर शायद ही सहमति बने। भाकपा माले कम से कम 20 सीटों पर लड़ने की तैयारी में है। मासस, सीपीआई और सीपीआई एम के भी अपने दावे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी किसी गठबंधन में शामिल हुए बिना 80 फीसदी यानी करीब 60 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर चुके हैं। चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों के लिए और भी कई दरवाजे खुले मिलेंगे।

जहां तक चुनावी मुद्दों का सवाल है। महागठबंधन के लोग रघुवर सरकार के अधूरे विकास कार्यों के आधार पर उन्हें विफल साबित करने का प्रयास करेंगे। खासतौर पर जीरो कट बिजली की आपूर्ति के वायदे पर। मॉब लिंचिंग और विधि व्यवस्था का सवाल भी उठेगा। झामुमो नेता हेमंत सोरेन ने नक्सलवाद के मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू किया है। उनका सवाल है कि सीएम रघुवर दास झारखंड में नक्सलवाद के सफाए का दावा करते रहे हैं जबकि चुनाव आयोग राज्य के 19 जिलों और 50 से अधिक सीटों को नक्सल प्रभावित बता रहा है। पांच चरणों में चुनाव के औचित्य को सिद्ध करने के लिए चुनाव आयोग नक्सलवाद के संकट की ही दलील दे रहा है। चुनाव आयोग और सरकार के दावों का यह अंतर्विरोध भी चुनावी मुद्दा बनेगा और रघुवर सरकार के लिए इसका जवाब दे पाना कठिन होगा। पिछले चुनाव में एनडीए को 42 सीटें मिली थीं। झाविमो के छह विधायकों के पलटी मारने से यह आंकड़ा 48 का हो गया था। स्पष्ट बहुमत के कारण राज्य को पहली बार स्थिर सरकार मिली जिसने अपना कार्यकाल पूरा किया। तब विपक्षी दलों में झामुमो को 19 और कांग्रेस को 7 सीटें मिली थीं। 6 सीटों पर वामपंथी और निर्दलीय प्रत्याशी जीते थे। तब विपक्षी दलों के बीच कोई तालमेल नहीं हुआ था। उस समय कई सीटें ऐसी थीं जहां झामुमो और कांग्रेस के वोटों को मिला देने पर जीत का आंकड़ा बनता था। भाजपा मत विभाजन के कारण जीत सकी थी। इसबार उन सीटों पर भाजपा को परेशानी हो सकती है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व पाकिस्तान, अनुच्छेद-370 और हिन्दू-मुसलमान का राग अलापेगा जो हरियाणा और महाराष्ट्र में बेअसर साबित हुआ। झारखंड में संभवतः भाजपा स्थानीय मुद्दों पर जोर दे। धर्म परिवर्तन और ईसाई मिशनरियों पर भी हमलावर रुख अपना सकती है। झारखंड के नौकरशाहों का एक हिस्सा सीएम रघुवर दास के रूखे व्यवहार से क्षुब्ध बताया जाता है। उसका झुकाव महागठबंधन की ओर हो सकता है। कोयलांचल में हार्ड कोक भट्ठों को लिंकेज कोयला बंद करने के कारण हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी पर बुरे प्रभाव का खमियाज़ा भी भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। इन कमजोरियों को हिंदुत्व की चादर से शायद ही ढका जा सके।

 

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