दस साल की उम्र में मैट्रिक पास  हुए सांसद निशिकांत!

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पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

-देवेंद्र गौतम

गोड्डा से तीन बार सांसद चुने गए भाजपा के निशिकांत दुबे का फर्जी डिग्री कांड चर्चा का विषय बना हुआ है। अगर उनके दावे सही हैं तो यह मानना पड़ेगा कि वे बड़े मेधावी छात्र रहे हैं। उन्होंने मात्र 10 साल की आयु में मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली थी। पता नहीं उनके इस हैरतअंगेज़ कारनामे को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में क्यों नहीं दर्ज किया गया। मीडिया की सुर्खियों में यह कारनामा क्यों नहीं आया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव सह राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने भारत सरकार के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र लिखकर मामले की जांच का अनुरोध किया है। सकी प्रतिलिपि लोकसभा अध्यक्ष को प्रेषित क गई है। पत्र में कहा गया कि 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान अपने नामांकन पत्र में दुबे जी ने अपनी उम्र 37 वर्ष दर्ज की है। इस लिहाज से उनका जन्म 1972 होना चाहिए। 1982 में उन्होंने मैट्रिक कर लिया। मात्र 10 वर्ष की उम्र में। यह करिश्मा कैसे हुआ शोध का विषय है। उन्होंने 1993 में दिल्ली विश्वविद्यालय से एमबीए करने का दावा किया है जबकि सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर बताया गया कि 1993 में निशिकांत दुबे नाम का न कोई छात्र था न पास आउट हुआ। जाहिर है कि दोनों की डिग्रियां फर्जी प्रतीत होती हैं। लिहाजा उनके नामांकन पत्र पत्र की गहन जांच कर उनकी सदस्यता की वैधता पर विचार करने का अनुरोध किया गया है।

भारत की संसदीय व्यवस्था में चुनाव लड़ने के लिए शिक्षा की कोई अनिवार्य शर्त नहीं हैं। एक निरक्षर व्यक्ति भी उसी शान से चुनाव लड़ सकता है जिस शान से बड़ी-बड़ी डिग्रीवाले। फिर इस तरह के फर्जीवाड़े की जरूरत क्यों पड़ती है, समझ से परे है। फर्जी डिग्री के सबसे ज्यादा मामले भाजपा में ही देखने को मिल रहे हैं। चुनाव आयोग को किसी तरह के दबाव में आए बिना इस मामले की सख्त जांच करनी चाहिए ताकि इस तरह के धोखेबाज लोग संसदीय संस्थाओं में नहीं पहुंच सकें।

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