पत्थलगड़ी आंदोलन की समीक्षा की जरूरत

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देवेंद्र गौतम

झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने अपने मंत्रिमंडस की पहली बैठक में सात अहम फैसले लिए। उनमें सबसे महत्वपूर्ण पत्थलगड़ी आंदोलन को लेकर दर्ज हुए मुकदमों को वापस लेना था। रघुवर दास की सरकार इस आंदोलन को देशद्रोह का मामला मानती थी जबकि यह कहीं से भी भारतीय संविधान के विरुद्ध नहीं था। यह अलग बात है जिस रूप में इसका इस्तेमाल किया गया उस रूप में आदिवासी समाज ने पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया था। बाहर के लोगों के ग्रामसभा की अनुमति के बिना गांव में प्रवेश पर रोक को रघुवर सरकार ने समानांतर शासन के रूप में देखा था। खासतौर पर पुलिस और प्रशासन का प्रवेश निषेध था।

आदिवासियों की पारंपरिक ग्रामसभा के इस निर्णय को भी संवैधानिक रूप से गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन ग्रामसभा यदि अपने अधिकार क्षेत्र में किसी तरह की गैरकानूनी गतिविधि नहीं चलने देती तो इसका औचित्य समझ में आता। पत्थलगड़ी प्रभावित इलाके नक्सली संगठनों के सुरक्षित अभयारण्य का रूप लेते जा रहे थे और वहां अफीम की खेती बड़े पैमाने पर होने की जानकारी मिल रही थी। यह खेती ग्रामीण नहीं कर रहे थे बल्कि नक्सली संगठन अपनी देखरेख में करा रहे थे। क्षेत्रीय सत्ता का संचालन पर्दे के पीछे से नक्सली कर रहे थे। बाहरी लोगों का प्रवेश निषेध होने के कारण उनपर अंकुश नहीं लग पा रहा था। ग्रामसभा को उनकी गतिविधियों पर आपत्ति नहीं थी। रघुवर सरकार ने इस आंदोलन को और इसके कानूनी पहलुओं को समझने की कोशिश नहीं की। आंदोलनकारियों से बातचीत की जरूरत नहीं समझी। सीधे तौर पर देशद्रोह करार देकर कार्रवाई शुरू कर दी। इस क्रम में ताबड़तोड़ मुकदमे दर्ज किए गए। वह तो तीन युवतियों के साथ सामुहिक बलात्कार की घटना के बाद भगदड़ मची और ग्रामीणों ने नक्सलियों और पत्थलगड़ी के नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। जिसके बाद पुलिस बल का गावों में प्रवेश संभव हुआ।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मुकदमे वापस लेकर संवाद का अनुकूल माहौल बना दिया है। उन्हें पत्थलगड़ी के नेताओं से बातचीत करनी चाहिए और इस बात को सुनिश्चित करनी चाहिए कि आदिवासी परंपरा की आड़ में कोई स्वार्थ की रोटियां नहीं सेंक सके। अफीम और मार्फीन जेसी नशीली वस्तुओं के कारोबार के लिए इसे ढाल की तरह इस्तेमाल न किया जाए। पर्दे के पीछे नक्सली गतिविधियों का संचालन न हो। आदिवासी संस्कृति का संरक्षण हो लेकिन परंपराओं का राजनीतिकरण न हो। श्री सोरेन के सर पर बड़ी जिम्मेदारी है। उन्हें सामाजिक संतुलन कायम रखते हुए राज्य को विकास और समृद्धि की ओर ले जाना है। भाजपा शासनकाल में मॉब लिंचिंग और सांप्रदायिकता के प्रसार पर अंकुश लगाना होगा।

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