न हेमंत जीते न नीतीश हारे, बात पहलकदमी की 

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

दूसरे राज्यों मे फंसे प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने अंततः स्पेशल ट्रेनें चलाने की इजाजत दे दी। एक मई जो ट्रेनें चलाई गईं उनमें हैदराबाद से रांची के लिए विशेष ट्रेन रवाना की गई जो एक हजार लोगों को लेकर चल पड़ी लेकिन बिहार के लिए कोई ट्रेन इसमें शामिल नहीं हुई। दूसरे राज्यों मे फंसे प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने अंततः स्पेशल ट्रेनें चलाने की इजाजत दे दी। एक मई जो ट्रेनें चलाई गईं उनमें हैदराबाद से रांची के लिए विशेष ट्रेन रवाना की गई जो एक हजार लोगों को लेकर चल पड़ी लेकिन बिहार के लिए कोई ट्रेन इसमें शामिल नहीं हुई। इसका अर्थ यह लगाया जा रहा है कि मोदी सरकार ने झारखंड की हेमंत सरकार को अहमियत दी और नीतीश कुमार की उपेक्षा की। नीतीश के कद को छोटा करने की कोशिश की।

लेकिन बात दरअसल यह नहीं है। नीतीश कुमार का बार-बार स्टैंड बदलता रहा जबकि हेमंत सोरेन पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ एक ही स्टैंड पर कायम रहे और उसी के अनुरूप केंद्र सरकार से अनुरोध करते रहे। जब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि की सरकारें आपस में बातचीत कर विशेष बसें भेजकर अपने छात्रों और मजदूरों को वापस ल रही थीं तो नीतीश कुमार का कहना था कि अंतर्राज्यीय परिवहन पर प्रतिबंध है कैसे बसें भेजें। इसका मतलब है कि वे यह कहना चाहते थे कि उनके पास बसें तो हैं अपने लोगों को वापस लाने की इच्छा भी है और क्षमता भी लेकिन लॉकडाउन के नियमों का वे उल्लंघन नहीं कर सकते। उनके हाथ बंधे हुए हैं।

प्रधानमंत्री के साथ वीडियो कांफ्रेंसिग में भी वे इस मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश की मांग की। केंद्रीय गृहमंत्रालय ने उनकी मांग मान ली और बसों से प्रवासियों को ले जाने की इजाजत दे दी। अब नीतीश कुमार ने पैंतरा बदला। अपनी ज़ुबान हार चुके थे इसलिए उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी से कहलवाया कि बिहार के पास बसें नहीं हैं इसलिए स्पेशल ट्रेनें चली जाएं। कई राज्यों ने पहले ही यह मांग की थी और रेलवे विभाग ने इसकी तैयारी भी कर रखी थी। बिहार का प्रस्ताव देर से आया। इसलिए वह फेहरिश्त मे पीछे हो गया। हेमंत शुरू में ही यह प्रस्ताव दे चुके थे इसलिए झारखंड को प्रतम चरण में ही इसका लाभ मिल गया। यह मामला प्राथमिकता या उपेक्षा का नहीं पहलकदमी का है। भारतीय रेलवे ने उसी के अनुरूप ट्रेनों की व्यवस्था की है।

नीतीश कुमार को छोटा करने की किसी ने कोशिश नहीं की है उन्होंने खुद ही अपने पावों पर कुल्हाड़ी मार ली है। उनके इस ढुलमुले और अमानवीय आचरण के कारण वे बिहार की जनता की नज़रों से गिर गए हैं जबकि लालू प्रसाद के उत्तराधिकारी एवं विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने प्रवासी मजदूरों और छात्रों की वापस के लिए जन सहयोग से एक घंटे के अंदर दो हजार बसों का इंतजाम करने का प्रस्ताव देकर बिहार के लोगों का दिल जीत लिया है। नीतीश कुमार के अंदर इतनी नैतिक शक्ति भी नहीं बची थी कि उन्हें इंतजाम कर दिखाने की चुनौती दे सकें। लोगों के अंदर यही संदेश गया कि बिहार में बसों की कमी नहीं है। नीतीश कुमार उन्हें भेजना नहीं चाहते। वे नहीं चाहते कि दूसरे प्रांतों में फंसे बिहार के लोग अपने घर वापस लौटें। उनके इस विकृत और अव्यवहारिक सोच के कारण उन्हें कितना बड़ा राजनीतिक नुकसान हुआ है, वे अंदाज़ा नहीं लगा सकते। वे बात समाजवाद की करते हैं लेकिन वे मूलतः जातीय समीकरण बनाकर सत्ता हासिल करने वाले एक जोगाड़ू नेता हैं। निश्चित रूप से जिन जातियों को वे अपना वोटबैंक समझते हैं उनके सदस्य भी दूसरे राज्यों में फंसे होंगे। नीतीश कुमार ने अपने विधायकों को तो वीवीआइपी लोगों को तो अपने बच्चों को निजी गाड़ियों से वापस लाने की विशेष अनुमति दी लेकिन अपने जातीय आधार का भी ध्यान नहीं रखा। बिहार के आम नागरिकों की तो बात ही अलग है।

इत्तेफाक की बात यह है कि इसी साल बिहार के चुनाव होने हैं। वे एनडीए के पाले में हैं। बिहार में भाजपा के लिए उन्हें साथ रखना मजबूरी है लेकिन जब उसके शीर्ष नेताओं को यह आभास हो जाएगा कि वे लोकप्रियता खो चुके हैं और उनके भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकेगा तो क्या होगा? उन्हें एनडीए में जो तर्जीह मिल रही थी वह नहीं मिल पाएगी। सच पूछ जाए तो संसदीय राजनीति में वोट बटोरू नेता की पूछ होती है। जनता से कटा हुआ नेता किसी काम का नहीं रह जाता। नीतीश कुमार जो राजनीतिक नुकसान कर चुके हैं उसकी भरपाई इतनी जल्द होने की कोई सूरत नहीं दिखाई देती।

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