चुनावी बिसात पर सजने लगे मोहरे, हवा का रुख भांपने लगे नेता

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देवेंद्र गौतम

झारखंड में चुनावी बिसात पर राजनीतिक दलों के मोहरे सजने लगे हैं। भाजपा ने अपने 52 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है। कांग्रेस ने पहले चरण के अपने 5 उम्मीदवारों की सूची जारी की है। कांग्रेस समय से पहले अपने पत्ते नहीं खोलने की नीति पर चल रही है। गठबंधन के प्रति कांग्रेस का रवैया जितना उदार है भाजपा का उतना ही हठधर्मिता भरा दिख रहा है। महाराष्ट्र में शिवसेना के दबाव के आगे नहीं झुकने का तेवर झारखंड में आजसू के प्रति अपनाया जा रहा है। आजसू सीट शेयरिंग में ज्यादा हिस्सेदारी मांग रहा है जो भाजपा को मंजूर नहीं है। चंदनक्यारी और लोहरदगा सीटों पर भी पेंच फंसा हुआ है। आजसू सुप्रीमो इन्हें अपने कोटे में मांग रहे हैं। भाजपा इसके लिए तैयार नहीं है। भाजपा अपने एकमात्र सहयोगी आजसू को अधिकतम 11 सीटें देना चाहती है जबकि आजसू का कम से कम 15 सीटों पर दावा है। दिल्ली में बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला। सुदेश महतो खाली हाथ रांची लौट आए हैं। गठबंधन टूटने तक के कयास लगाए जा रहे हैं।

हालांकि भाजपा जानती है कि आजसू एनडीए से बाहर नहीं जा सकता। महागठबंधन में उनके लिए कोई जगह बन नहीं सकती। कोई भी विपक्षी दल आजसू पर भरोसा नहीं कर सकता। आजसू का जनाधार भी इतना बड़ा नहीं कि अकेले झारखंड की सभी सीटों पर लड़ सके। दूसरी बात यह कि आजसू सत्ता के बगैर नहीं रह सकता। यह एकमात्र दल है जो झारखंड राज्य के गठन के बाद लगातार सत्ता में शामिल रहा है सरकार चाहे जिसकी भी बनी हो। भाजपा नेतृत्व भली-भांति समझ रहा है कि यह दबाव की राजनीति है अन्यथा वन का गीदड़ जाएगा किधर।

कांग्रेस में लोकसभा चुनाव के बाद जो मुर्दनी छाई हुई थी वह हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों के बाद टूट चुकी है। उन चुनावों में कांग्रेस हारे हुए खिलाड़ी की तरह मैदान में उतरी और बेहतर प्रदर्शन किया। वह समझ चुकी है कि यदि पूरे दम खम के साथ लड़े तो अपना अस्तित्व बचा सकती है। लेकिन वह अति उत्साह में आने से परहेज़ कर रही है। फूंक-फूंककर कदम रख रही है। झारखंड में उसने झामुमो के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया। झामुमो 43 तो वह 31 सीटों पर लड़ रही है। उसे पता है कि 2014 की सात सीटें बरकरार रह जाएं और उनमें कुछ बढ़ोत्तरी हो जाए तो उसे संजीवनी मिल जाएगी। फिर 2024 के आम चुनावों की वह बेहतर तैयारी कर सकेगी। लोकसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस ने राज्यों में क्षेत्रीय दलों और केंद्र में कांग्रेस की नीति अपनाई थी लेकिन उसका कोई लाभ नहीं मिल पाया। राष्ट्रीय स्तर पर सभी विपक्षी दलों को एकजुट नहीं किया जा सका। झारखंड में भी कांग्रेस, राजद और झामुमो की ही गठबंधन बन पाया। झाविमो अलग रहा। यह उसकी मजबूरी भी थी। झाविमो को अपना अस्तित्व बचाने के लिए वोटों का प्रतिशत चाहिए। यह महागठबंधन में रहकर संभव नहीं था। प्रत्याशी जितने भी जीतें, पार्टी की मान्यता बरकरार रखने भर वोट तो आ ही जाएंगे।

इतना तय है झारखंड में अधिकांश सीटों पर भाजपा और झामुमो के गठबंधनों के बीच ही मुख्य संघर्ष होगा। कहीं-कहीं त्रिकोणात्मक अथवा बहुकोणीय संघर्ष की स्थिति बनेगी। इसमें दो राय नहीं कि सबसे जबर्दस्त तैयारी भाजपा ने की है और वह रघुवर सरकार की पुनर्वापसी के प्रति आश्वस्थ है। रघुवर दास अबकी बार पैंसठ पार का नारा दे रहे हैं। हालांकि उन्हें इस बात का अहसास भी है कि झामुमो और कांग्रेस के वोटों का योग कम से कम 12 सीटों पर खेल बिगाड़ सकता है। अन्य सीटों पर भी कड़ा टक्कर दे सकता है। बहरहाल चुनाव में कब मतदाताओं का क्या मिजाज रहेगा की नहीं जानता। खेल बिगड़ते-बिगड़ते बन जाता है और बनते-बनते बिगड़ भी जाता है।

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