आदिवासियों को मिलेगी उनकी धार्मिक पहचान!

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

झारखंड में महागठबंधन की जीत इत्तेफाक से ऐसे समय में हुई है जब नागरिकता और धर्म को लेकर राष्ट्रव्यापी बहस चल रही है। साथ ही 2021 की जनगणना की भी तैयारी भी शुरू हो रही है। झारखंड का ताज एक गैर आदिवासी नेता रघुवर दास के सर से उतरकर आदिवासी नेता हेमंत सोरेन के सर पर सुशोभित होने जा रहा है। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर सरना कोड का मामला एकबार फिर जोर-शोर से उठेगा।

सरना एक प्रकृति आधारित धर्म है जिसे झारखंड के आदिवासी समाज का एक बड़ा हिस्सा मानता है। हालांकि इसका कोई धर्मशास्त्र उपलब्ध नहीं है। सदियों से यह वाचिक परंपरा के तहत संचालित होता रहा है। इसके अनुवाइयों की संख्या 60 लाख से अधिक होने का दावा किया जाता है। वे प्रकृति की उपासना करते हैं। सूरज को अपना सबसे बड़ा देवता मरांग बुरु मानते हैं। इसके अलावा भी कई देवता होते हैं जो जंगल पहाड़ से लेकर ग्राम तक में मौजूद रहते हैं।

अलग कोड नहीं होने के कारण जनगणना में उनकी आबादी हिंदू धर्म में शामिल हो जाती है। सरना धर्मावलंबी अपनी अलग पहचान के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं। उनका कहना है कि जो आदिवासी ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके हैं जनगणना के दौरान धर्म के कॉलम में वे ईसाई लिखते हैं। लेकिन वे सरना लिखते हैं तो हिंदू अथवा अन्य के खाते में चले जाते हैं। जबकि अनुसूचित जनजाति को मिलने वाले लाभ ईसाइयों को भी प्राप्त होते हैं। वे स्वयं को हिंदू धर्म के करीब मानते हैं लेकिन हिंदू नहीं मानते। उनके रीति-रिवाज, पर्व त्योहार, पूजा-पाठ के तौर तरीके सर्वथा अलग हैं। 2011 की जनगणना के समय भी सरना कोड को शामिल करने की मांग उठी थी। उस समय निर्देश दिया गया था कि छह धर्मो के अलावा जो कोई और धर्म मानते हैं वे बिना कोड नंबर के धर्म का नाम लिख दें। उस समय करीब 42 लाख लोगों ने सरना धर्म लिखा था। वे अन्य के खाते में चले गए।

  1951 में जब आजाद भारत की पहली जनगणना हुई तब समय आदिवासियों के लिए धर्म के कॉलम में नौवें नंबर पर ट्राइब  उपलब्ध था लेकिन उसे बाद में हटा दिया गया। अब आदिवासियों का कहना है कि इसे हटाने की वजह से आदिवासियों की गिनती अलग-अलग धर्मो में बंटती गई जिसके चलते उनके समुदाय को काफी नुकसान हुआ है। झारखंड विकास मोर्चा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में सरना कोड को शामिल किया है। झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने हेमंत सरकार को बिना शर्त समर्थन दिया है। हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्री पद का शपथ लेने के बाद यह मांग तेज़ी से उठेगी। राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा के धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने अपने स्तर पर सरना धर्मावलंबियों की गणना पहले ही शुरू करा रखी है। सरकार बन जाने के बाद वे कोड की मांग में तेजी लाएंगे। आदिवासी नेता होने के नाते हेमंत सोरेन भी इसका समर्थन करेंगे। कांग्रेस और राजद को भी इसपर आपत्ति नहीं होगी लेकिन भाजपा इसका विरोध कर सकती है क्योंकि इससे आदिवासियों के बीच उसका हिंदुत्व का एजेंडा खटाई में पड़ जाएगा।

हालांकि संघ और भाजपा के पास ईसाइयों और सरना धर्मावलंबियों के बीच के अंतर्विरोध को बढ़ाने का अवसर बना रहेगा। झारखंड में आदिवासी कल्याण केंद्र के बैनर तले संघ का ईसाई विरोधी आंदोलन बहुत पहले से चल रहा है। जिसमें धर्म परिवर्तन मुख्य मुद्दा रहा है। इसमें वे मिशनरियों के खिलाफ हिन्दुओं और सरना धर्मावलंबियों को एकजुट कर पा रहे थे। अब यदि कोड बन गया तो ईसाई मिशनरियों के खिलाफ वे सरना धर्मावलंबियों का इस्तेमाल तो कर पाएंगे लेकिन उनके भगवाकरण की गुंजाइश क्षीण हो जाएगी। देखना है कि झारखंड सरकार इस मांग को किस रूप में उठाती है और हिन्दुत्व की स्वयंभू झंडाबरदार बनी भाजपा सरकार उसे किस रूप में लेती है।

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