पत्थलगड़ी को लेकर हिंसक टकराव क्यों

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देवेंद्र गौतम

सात लोगों की हत्या के साथ झारखंड में पत्थलगड़ी आंदोलन के समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसक जंग की शुरुआत हो चुकी है। दोनों ही तरफ आदिवासी समुदाय के लोग ही खड़े हैं। आदिवासी परंपरा से गैर आदिवासियों को भी आपत्ति नहीं हो सकती फिर समुदाय के अंदर यह हिंसक संघर्ष क्यों चल रहा है, इसे समझने की जरूरत है। संभवतः यह परंपरा के उपयोग और दुरुपयोग का मामला है।

पत्थलगड़ी की परंपरा पाषाणकालीन युग से चली आ रही है। अपने गांव के सीमांकन, किसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति अथवा पूर्वजों के प्रति श्रद्धा के तौर पर इसका उपयोग किया जाता रहा है। ब्रिटिश सरकार ने इस परंपरा को संवैधानिक संरक्षण दिया परंपरा तो बहुत पहले से चली आ रही है। आदिवासी समुदाय सदियों से इसका निर्वहन करता आ रहा है। इसको लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ। आज विवाद क्यों हो रहा है, इसे समझने की जरूरत है।

यह महज इत्तेफाक तो नहीं हो सकता कि जिन इलाकों में यह आंदोलन चल रहा है वहां नक्सलियों के संरक्षण में अफीम की खेती के दृष्टांत कई बार मिल चुके हैं। नक्सली हिंसा के लिए धन जुटाने में ड्रग तस्करों के साथ गठजोड़ की बात भी सामने आ चुकी है। पत्थलगड़ी की परंपरा में कहीं ग्रामसभा और उसकी संवैधानिक शक्तियों का समावेश नहीं रहा है। यह ब्रिटिश सरकार की देन है। विवाद का कारण परंपरा नहीं ब्रिटिश काल का कानून है जिसकी आड़ लेकर ग्रामसभा की अनुमति के बगैर किसी के आवागमन को प्रतिबंधित किया जा रहा है। यह प्रतिबंध अफीम के पौधों तक पुलिस प्रशासन की पहुंच को रोकने के लिए है। आदिवासी संस्कृति और परंपरा से इसका कोई लेना-देना नहीं है। पहले भोले-भाले आदिवासी ड्रग माफिया के असली खेल को समझ नहीं पा रहे थे। उनके बहकावे में आ गए थे। लेकिन पत्थलगड़ी के नाम पर जब चार युवतियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना ही तो आदिवासी समुदाय भड़क उठा। पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई में सहयोग किया और पत्थलगड़ी के नाम पर स्वार्थ की रोटियां सेंकनेवाले भाग खड़े हुए।

रघुवर दास की सरकार ने इस आंदोलन को देशद्रोह समझा और उसी सोच के तहत सौ से अधिक लोगों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया था। अंग्रेजों के बनाए कानून के नजरिए से देखें तो यह कहीं से गैर संवैधानिक नहीं था लेकिन परंपरा के लिहाज से देखें तो यह उसके दुरुपयोग का मामला था। जब हेमंत सोरेन की सरकार बनी तो उन्होंने आदिवासी परंपरा के मद्दे-नज़र देशद्रोह के मुकदमे वापस ले लिए। यह रघुवर सरकार की भूल का सुधार था। लेकिन परंपरा का दुरुपयोग करने वालों ने उनके आंदोलन को सरकार का संरक्षण समझा और उग्र हो गए। आम आदिवासी जो उनकी नीयत में खोट को समझ चुके थे उनका विरोध करते रहे। उन्हें चुप कराने के लिए हत्याएं की गईं।

हेमंत सरकार को परंपरा के उपयोग और दुरुपयोग के नजरिए से चीजों को देखना चाहिए और उसी के अनुरूप कार्रवाई करनी चाहिए। इस आंदोलन के संचालक काफी पढ़े-लिखे और धूर्त किस्म के लोग हैं। आम आदिवासी कभी भी इतना धूर्त और शातिर नहीं हो सकता।

 

3 Comments
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