राजेंद्र सिंह का छक्का लगेगा या बाटुल का चौका !

बेरमो विधानसभा क्षेत्र

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देवेंद्र गौतम

बेरमो विधानसभा क्षेत्र में इसबार यदि कांग्रेस के दिग्गज नेता और इंटक के महासचिव राजेंद्र सिंह ने जीत हासिल की तो वे छठी बार जीत का छक्का मारेंगे। वहीं तीन बार विधायक रह चुके भाजपा के योगेश्वर महतो बाटुल जीते तो चौका लगाएंगे। दोनों दिग्गज नेता हैं और आपस में कांटे के टक्कर में शामिल रहे हैं। 2005, 2009 और 20014 के चुनावों में मुख्य संघर्ष इन्हीं के बीच हुआ था जिसमें 2009 का चुनाव राजेंद्र प्रसाद सिंह जीते थे जबकि 2005 और 2014 के चुनाव में श्री बाटुल ने जीत हासिल की थी। उनके बीच जीत-हार का फासला कुछ हजार में ही रहा है। भाकपा के आफताब आलम दो बार चुनाव लड़ चुके हैं और तीसरे स्थान पर रहे हैं। इसबार भी संघर्ष इन्हीं तीनों के बीच होना तय है।

जहां तक राजेंद्र प्रसाद सिंह का सवाल है वे इंटक के संस्थापकों में एक, संयुक्त बिहार में मुख्य मंत्री रह चुके बिंदेश्वरी दुबे के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाते हैं। उन्हें दुबे जी से विरासत में ट्रेड यूनियन की राजनीति के साथ संसदीय राजनीति भी मिली थी। बेरमो बिंदेश्वरी दुबे का चुनाव क्षेत्र रहा है। उनके बाद राजेंद्र प्रसाद सिंह  कांग्रेस से लड़ते और जीतते रहे हैं। झारखंड राज्य के अलग होने के बाद स्थितियों में कुछ बदलाव आया। झारखंड राज्य का गठन चूंकि केंद्र में भाजपा सरकार के कार्यकाल में, उसकी पहल पर हुआ था इसलिए इसका राजनीतिक लाभ भाजपा को मिला। हालांकि केंद्र में कांग्रेस के सत्तारूढ़ रहने के दौरान कई बार ऐसे मौके आए जब झारखंडवासियों का अलग राज्य का सपना पूरा हो सकता था लेकिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद राज्य विभाजन के खिलाफ थे और झामुमो आलाकमान शिबू सोरेन भी मौके का लाभ उठाने से चूक गए। झारखंड के अलग होने के बाद भाजपा का जनाधार बढ़ा जबकि कांग्रेस की लोकप्रियता में गिरावट आई। इसका असर बेरमो की राजनीति पर भी पड़ा और राजेंद्र प्रसाद सिंह को भी एक हद तक इसका खमियाजा भुगतना पड़ा। संयुक्त बिहार के समय भाकपा के स्व. शफीक खान के साथ उनकी कांटे की टक्कर होती थी। उनके गुजरने के बाद उनके साहबजादे आफताब आलम मैदान में उतरे। तब वामपंथी आंदोलन में शिथिलता और आफताब आलम की अनुभवहीनता को देखते हुए राजेंद्र प्रसाद सिंह अपराजेय नेता हो सकते थे लेकिन भाजपा के योगेश्वर महतो उनके मुकाबले में उभर आए और 2005 में उन्हें परास्त भी कर दिया।

राजेंद्र प्रसाद सिंह एक मृदुभाषी और मिलनसार नेता रहे हैं। इंटक के अंतराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय नेता होने के नाते कोयला खदान क्षेत्रों के सभी वर्गों के बीच उनकी जबर्दस्त लोकप्रियता और पकड़ है। अपनी व्यवहार कुशलता और सबकी मदद को तत्पर रहने के स्वभाव के कारण तथा विधायक के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान विकास कार्यों के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में भी उनको जबर्दस्त समर्थन मिलता रहा है। योगेश्वर प्रसाद बाटुल को भाजपा के हिन्दुत्व और कुर्मी जाति का होने का लाभ मिलता है। इसी पूंजी की बदौलत वे राजेंद्र प्रसाद सिंह जैसे दिग्गज नेता के मुकाबले खड़े होने में सफल रहे। इसबार राजेंद्र प्रसाद सिंह का ग्रामीण समर्थन झामुमो के साथ गठबंधन होने के कारण और बढ़ जाएगा। उनके पुत्र अनूप सिंह काफी सूझ-बूझ वाले कर्मठ नेता हैं। वे स्वयं भी इस सीट के दावेदारों की सूची में रहे हैं। जाहिर तौर पर चुनाव की रणनीति अनूप ही तय करेंगे और पिता को छक्का लगाने में अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे।

हाल के हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों के संकेत बताते हैं कि हिन्दुत्व और सैन्य राष्ट्रवाद के कंधों पर भाजपा ज्यादा दिनों तक सवारी नहीं कर पाएगी। देश में उन्माद की लहर पहले से कमजोर पड़ी है। राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ होने पर भी उसका तापमान नहीं बढ़ा। झारखंड की रघुवर सरकार के विकास कार्यों का बेरमो में भाजपा को लाभ मिल सकता है लेकिन जीरो कट बिजली के मुद्दे पर उनकी विफलता का खमियाजा भी भुगतना पड़ेगा। यह मुद्दा हर खासो-आम को प्रभावित करने वाला है। इसलिए इसका प्रभाव चुनाव पर भी पड़ेगा। झारखंड में भाजपा का मोदी मैजिक ज्यादा कारगर नहीं हो सकता।

योगेश्वर महतो बाटुल को पार्टी से कोई खास लाभ नहीं मिलने वाला। उन्हें अपनी लड़ाई अपने ही दम-खम पर लड़नी होगी। वे जातीय मतों पर, स्थानीयता के मुद्दे पर, अपने कार्यकाल में किए गए कार्यों के बल पर मतदाताओं का आशीर्वाद मांगेंगे। राजेंद्र प्रसाद सिंह कोयला मजदूरों के बीच मोदी सरकार के सार्जनिक क्षेत्र के प्रति नकारात्मक रुख का मुद्दा भी उठाएंगे। इसके कारण कोयला उद्योग पर मंडराते संकट के प्रति लोगों को सचेत करेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में वे रघुवर सरकार की विफलताओं को चिन्हित करेंगे साथ ही अपने कार्यकाल में किए कार्यों की याद दिलाएंगे। दोनों नेताओं के बीच दिलचस्प कांटे का टक्कर होगा। कौन बाजी मारेगा कहना कठिन है।

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