अनेकता में एकता का संदेश देता है मकर सक्रांति का पर्व

मकर क्रांति पर विशेष

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पूनम सिंह

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में मनाया जाने वाला वह उत्सव है, जब प्रकृति हमें शीतलता से राहत देना शुरु कर देती है। फसले या तो कटने योग्य हो जाती है या कट चुकी होती है। मकर सक्रांति के दिन से ही दिन बड़े होने लगते हैं। सक्रांति का अर्थ है संधि यानी जोड़ना। समय को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण काल है यह मकर सक्रांति। इस त्यौहार का आनंद सभी राज्यों में अपनी-अपनी परंपराओं के अनुरूप आनंद के साथ मनाया जाता है। मकर सक्रांति का सीधा संबंध पृथ्वी के भूगोल और सूरज की स्थिति से भी है। नक्षत्र विज्ञान के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस दिन सूर्य देव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और इसी दिन से सूर्य देव उत्तरायण हो जाते हैं। स्थानीय लोक कथाओं और रीति-रिवाजों के अनुसार इस पर्व को मनाने का तरीका और इस दिन बनने वाले पकवान भिन्न-भिन्न भले ही हो सकते हैं, लेकिन हम भारतीयों की उत्सवधर्मिता इस पर्व की भावना को एक सूत्र में पिरोए रखती है। यह अनेकता में एकता का पर्व माना जाता है। मान्यता है कि मकर सक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में विलीन हो गई थी। महाराजा भागीरथ ने इसी दिन अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया था। इसलिए इस दिन गंगा सागर का विशेष महत्व हो जाता है। मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में मनाया जाने वाला सर्वमान्य त्यौहार है। स्थानीय भौगोलिक,सामाजिक और आर्थिक स्थितियां इसके रूप में थोड़ी भिन्नता तो लाती है, लेकिन इस उत्सव का मूल भाव, दर्शन और कारण एक ही है। खेतों में लहलहाती सरसों और अन्य फसलें अन्नदाता को एक तरफ सुकून देती हैं, तो दूसरी तरफ सूर्यदेव की उत्तरायणी उष्मा हमारी आत्मा को तृप्त करती हैं। मकर सक्रांति के दिन से धीरे-धीरे दिन लंबे और रातें छोटी होने लगती है। हाड़ कंपाती ठंड को सूरज की उष्मा निगलना शुरु कर देती है। इस मौसम में सुबह का सूरज प्रकाश त्वचा, हड्डियों और पूरे शरीर के लिए लाभकारी होता है। बिहार और झारखंड में लोग सुबह उठकर पवित्र नदियों में स्नान कर सूर्य देवता को अर्ध्य देते हैं। देश के अन्य भागों की तरह यहां भी गुंड़ और तिल से बने पकवानों पर अधिक जोर रहता है। लेकिन कुछ स्थानों पर दही चूड़ा और तिल से बने पकवान भी पसंद किया जाता है। इस त्यौहार के अवसर पर विशेष भोजन और पकवान महिलाएं समूह में भी बनाती हैं। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश की प्रक्रिया को शुभ माना जाता है। मकर सक्रांति के दिन मित्रता का विशेष भाव पूर्वी राज्यों में भी देखने को मिलता है।यह त्योहार सूर्यदेव के पूजन को समर्पित है। तिल-गूड़ ,चूड़ा -दही, खिचड़ी पर महकता देसी घी भोजन के दिव्यता की अनुभूति कराती है। इस दिन सफेद काले तिल और लाई के लड्डू बनाकर भेंट दिए जाने की परंपरा है। कुल मिलाकर मकर सक्रांति का पर्व हमें अनेकता में एकता का संदेश देता है।

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