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ग़ज़ल

कहां सो रहे थे कलम के सिपाही

-देवेंद्र गौतम तबाही... तबाही... तबाही... तबाही. ये किस मोड़ पर आ गए हम इलाही! मिटाई गई कैसे हर्फे-हक़ीकत कहां सो रहे थे कलम के सिपाही. कभी बादशाही के अंदर फकीरी फकीरी के अंदर कभी बादशाही.…

ग़ज़लः बादलों की ओट से बाहर निकलता क्यों नहीं

बादलों की ओट से बाहर निकलता क्यों नहीं. वो अगर सूरज है तो करवट बदलता क्यों नहीं. रास्ता फिसलन भरा है तो बदलता क्यों नहीं ठोकरें खाता है तो खाकर संभलता क्यों नहीं. क्यों हवा में बेसबब तलवारबाजी कर रहा है…

देवेंद्र गौतम की दो ग़ज़लें

1 हर घड़ी ग़म से आशनाई है. ज़िंदगी फिर भी रास आई है. आस्मां तक पहुंच नहीं लेकिन कुछ सितारों से आशनाई है. अपने दुख-दर्द बांटता कैसे उम्रभर की यही कमाई है. ख्वाब में भी नज़र नहीं आता नींद…