प्रसंग : कोरोना ।प्रवासी दिहाड़ी मजदूरों को मेरी शब्दाजंलि ———————————————- मां , मैं आता हूं – सुशील भारती

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प्रसंग : कोरोना ।प्रवासी दिहाड़ी मजदूरों को मेरी शब्दाजंलि
———————————————-
मां , मैं आता हूं
– सुशील भारती

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

तुम क्यों घबराती हो /
मैं यहां , तुम वहां /
इससे क्या ?
माँ ! मैं आता हूं –
सवारी व सही /
हौसला तो है –
तुम्हीं ने तो बोया था /
अरे इतना , उतना ,
नहीं – नहीं –
कितना – कितना /
पेट की आग –
और बाप की बीमारी –
छोटंकी की शादी –
तभी –
गोइठी ,कटनी और कमौनी /
ओह , याद आया /
मां , स्कूली बस्ता से तोड़ा था –
नाता /
हर दिन – कोरोना ही तो था /
अब यह क्या बिगाड़ेगा –
साथ मे निर्मलिया और –
कोंख में शायद –
तेरी पोती भी उसकी गोद मे है /
मां , मत घबराना /
दिहाड़ी के साधन /
कोरोना ने निगल लिया /
मालिकों ने हाँथ खड़ा कर लिया /
गांव की अपनी चौखट /
खींचने लगी है –
मत घबड़ा /
मैं आता हूं –
दो हज़ार किलोमीटर की दूरी /
उसके बाद सर पर तेरा हाँथ /
मां , रास्ते के गाँव /
थकने पर –
आसपास /
बैठने भी नहीं देते /
रोटी – पानी तो दूर /
पर सच बताऊं – मां /
तेरा दिया हौसला –
खर्च होने लगा है /
माँ , कहीं रास्ते मे –
मैं पहले दम तोड़ दूंगा तो –
निर्मलिया पहुंचेगी /
और निर्मलिया चूक गई –
तो , मैं पहुंचूंगा /
पता नहीं –
हम दोनों ही रह गए तो –
अपना ख्याल रखना /
कोरोना जाते – जाते –
अनगिनत कहानियां दे जायेगी /
मां , मानव सृजित उन्हीं /
कहानियों में मैं भी रहूंगा /
पड़ोस की सीता चाची से –
रोज किस्से – कहानियों में /
मुझे याद करना / माँ –
घबराना मत / गांव के बोंगा देवता से आँचर जोड़ कर –
कहना / कोरोना कभी किसी की/
ज़िंदगी मे न आए –
आए भी तो –
कोरोना नक्षत्र में –
पैदा हुए / हमलोगों पर –
रहम रखे –
मां , अगर न आ सका तो –
आंगन के पिंजरे के तोता को /
आज़ाद कर देना /
कबूतरों के दरबे –
खोल देना /
मैं जान गया हूं –
बन्द और बंधे ज़िंदगी की –
फफकती पीड़ा – बेबसी /
मां –
याद रखना / अलग – अलग बैठना –
सर पर आंख तक घूंघट –
रखने की संस्कृति /
मां , अब कोरोना ने /
तुमसे , भले ही तेरा बेटा छीन ले /
पर अब अपनी संस्कृति में तुम /
जाहिलपन – गंवार की अभिशाप से /
मुक्त हो चुकी हो /
मां – अगर घर न आ पाया तो –
तुम याद करोगी न /
मां , मै वापस लौटने के लिये /
कदम तो बढ़ाया न –
आना न आना –
मेरे वश में /
नहीं था – मां /
एक बार फिर मिले तो –
तेरी गोद में रो -रोकर /
फिर तुमसे चुरा लूंगा –
ढेर सारा / हौसला –
माँ – माँ – मां /
अपना ख्याल रखना /
सबसे दूर – दूर रहना ।।

तेरी छावं के लिये –

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