रावण जैसी शक्तियां किसी नेता को मिल जाए तो..

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

प्रायः देखा गया है कि लोकतंत्र में जिस किसी नेता या दल को चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिल जाता है वह मनमानी पर उतर आता है। तुरंत एडोल्फ हिटलर बनने का प्रयास शुरू कर देता है। जनादेश भले पांच साल के लिए मिला हो लेकिन वह समझता है कि यह पांच साल प्रलयकाल तक भी नहीं बीतेंगे। वह भूल जाता है कि वह एक नश्वर प्राणी है और उम्र की एक सीमा पार करने के बाद उसे मृत्युलोक से विदा हो जाना है। इसके बाद उसकी क्या गति होगी कोई नहीं जानता। फिर भी अत्याचार की सारी सीमाएं लांघने लगता है। सत्ता को आजीवन अपने अधीन रखने के इंतजाम में लग जाता है।

सोचने की बात है कि यदि उन्हें रावण जैसी विद्वता और शक्तियां प्राप्त हो जातीं तो वह क्या करता। रावण की नाभि में अमृत था। जबतक वहां चोट नहीं लगती उसे कोई नहीं मार सकता था। अर्थात वह अमर था। रावण के पास मायावी ताकतें थीं। सारी प्राकृतिक शक्तियों को उसने बंधक बना रखा था। इंद्र, वरुण आदि तमाम देवता उसके अधीन थे। उसके राजपाट की कोई समयसीमा नहीं थी। उसे हर पांच साल पर जनादेश प्राप्त करने की कोई विवशता नहीं थी। राम के साथ युद्ध में मारे जाने पर भी उसका अनुज विभीषण ही राजगद्दी पर बैठा। रावण निःसंदेह अहं ब्रहास्मि का प्रवक्ता था। उसके अंदर अहंकार था लेकिन वह एक कुशल राजा था। उसकी लंका सोने की थी। उसकी प्रजा खुशहाल थी। उसे अपनी प्रजा का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। यहां तक कि एक स्त्री के कारण पूरे देश को खतरे में डाल देने पर भी प्रजा ने कोई विद्रोह नहीं किया था। वह अपनी प्रजा को कभी प्रताड़ित नहीं करता था।

रावण कोई हत्या और अपहरण का उद्योग नहीं चलाता था। उसने सीता का अपहरण किया भी तो अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए और अपहरण के बाद भी सीता के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया था। इस दौर के किसी नेता को यदि रावण जैसी शक्तियां मिल जाएं तो वह अपनी ही जनता को तिगनी का नाच नचाकर रख दे। उसके गुर्गे रोज लड़कियों का अपहरण करें और उनके साथ सामूहिक बलात्कार को अंजाम दें। उसका पुष्पक विमान पूरे भूमंडल का चक्कर लगाता रहता। विभीषण के साथ रावण के वैचारिक मतभेद थे लेकिन इसके बावजूद उन्हें अपने दरबार में सम्मानित स्थान दिया था। वह विभीषण की सलाह मानता नहीं था लेकिन उन्हें अपनी बात कहने का पूरा मौका देता था। जब अति हो गई तो विभीषण को लात मारकर दरबार के बाहर निकाला। विभीषण उसके प्रबल शत्रु से जा मिला लेकिन उन्हें देशद्रोही नहीं सिर्फ कुलद्रोही कहा।

अगर हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृहमंत्री अमित शाह जैसे नेता को रावण जैसी शक्तियां और साम्राज्य प्राप्त हो जाता तो स्वेच्छाचारिता की ऐसी मिसाल पेश करते कि रावण भी अपना सर पीटने लगता। हिटलर तानाशाह था लेकिन जर्मन राष्ट्र के लिए घातक नहीं था। वह जो कुछ करता था राष्ट्र की अस्मिता के लिए। अपनी सुख सुविधा के पीछे नहीं भागता था। उसे यहूदी जाति से नफरत थी। उसके अस्तित्व को मिटाने के लिए उससे जो बन पड़ा किया। उसने जर्मनी को धार्मिक राष्ट्र नहीं बनाया था। चाहता तो बना सकता था। से रोकने की ताकत किसी में नहीं थी। वह नस्लभेदी था। स्वयं को आर्य अर्थात टार्टरिक नस्ल का मानता था और सिमेटिक नस्ल को समाप्त करने पर आमादा था। लेकिन उसने कोई छद्म धारण नहीं किया था। सने अपने चरित्र के किसी हिस्से को छुपा नहीं रखा था। अपने देश की जनता को बरगलाता नहीं था। जो कहता था, करता था।

रावण तो रावण अगर हिटलर जैसी शक्तियां भी भारत के किसी वर्तमान नेता को हासिल हो जाए तो वह क्या करेगा इसकी कल्पना करके देखें।

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