पत्रकारों को अविलंब कोरोना वारियर्स घोषित करने की जरूरत

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नई दिल्ली। झारखंड में 35 से अधिक पत्रकार कोरोना की भेंट चढ़ चुके हैं। वे अपने पेशेगत दायित्व का निर्वहन करते हुए जनता तक सही सूचनाएं पहुंचाने का काम कर कर रहे थे। महामारी के समय उनकी सेवाओं को किसी हाल में कमतर नहीं आंका जा सकता। जिस तरह डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी, पुलिस-प्रशासन के लोग घरों में सुरक्षित नहीं रह सकते थे, उसी तरह पत्रकारों के लिए भी बाहर निकलना आवश्यक था। चाहे वे मुफस्सिल क्षेत्रों के स्ट्रिंगर रहे हों अथवा मीडिया हाउसों के वेतनभोगी रिपोर्टर अथवा संपादकीय, गैर संपादकीय विभागों के कर्मी। उन्हें ऑफिस अथवा फील्ड जहां भी तैनात किया गया हो, निकलना ही था।

सरकार ने उनके लिए विशेष अनुमति की व्यवस्था की थी। राज्य अथवा केंद्र सरकार का यह दायित्व बनता है कि महामारी के दौरान लॉकडाउन के बावजूद जिन पेशेवर लोगों का घरों से निकलना आवश्यक था फ्रंटलाइन वारियर्स का दर्जा दिया जाए। यदि अपनी ड्यूटी निभाते समय उनकी मौत हो गई तो उन्हें उचित मुआवजा दिया जाए। उनके परिवार के भरण-पोषण की उचित व्यवस्था की जाए। इस संबंध में अभी तक केंद्र अथवा राज्य सरकारों की ओर से कोई स्पष्ट नीति-निर्धारित नहीं की गई है। देशभर में 900 से अधिक डॉक्टरों की मौत हो चुकी है। विभिन्न राज्यों में सैकड़ों पत्रकार अपने कर्तव्यों की वेदी पर प्राणों की आहूति दे चुके हैं।

झारखंड में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी,  पूर्व विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, भाकपा के भुनेश्वर मेहता, भाजपा सांसद निशिकांत दुबे, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय ने भी हेमंत सोरेन से दिवंगत पत्रकारों को मुआवजा देने और पत्रकारों को फ्रंटलाइन वॉरियर्स घोषित करने की मांग की है। अभी तक इसपर कोई निर्णय लिए जाने की खबर नहीं है।

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