नीतीश कुमार के दामन में दाग़ लगा गए मेवालाल

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पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

-देवेंद्र गौतम

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने डॉ मेवालाल चौधरी को शिक्षामंत्री बनाकर सेवा करने और मेवा खाने का भरपूर मौका दिया लेकिन विपक्ष का ऐसा दबाव पड़ा कि उन्हें 24 घंटे के अंदर इस्तीफा देना पड़ गया। उन्हें माया मिली न राम। डॉ मेवालाल चौधरी सबौर कृषि विद्यालय में नियुक्ति घोटाले के आरोपी हैं और फिलहाल जमानत पर हैं। वे जदयू के कोटे से चुनाव जीतकर आए हैं। नीतीश कुमार उनके विवादास्पद व्यक्तित्व से वाकिफ न हों यह संभव नहीं है। फिर उन्हें मंत्री बनाकर अपनी साफ सुथरी छवि को दागदार बनाने की क्या विवशता थी नीतीश जी को ही पता होगा।

इतना तय है कि उन्हें मंत्री बनाने का भाजपा की तरफ से कोई दबाव नहीं हो सकता। यह निर्णय पूरी तरह नीतीश जी का ही हो सकता है। इसका मतलब है कि तेजस्वी की यह बात बिल्कुल सही है कि वे थक चुके हैं और सही निर्णय नहीं ले पा रहे हैं। सचमुच नीतीश कुमार ने रेलमंत्री के रूप में या पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी जो छवि स्थापित की थी, अब वे स्वयं से धूमिल करते जा रहे हैं। ठीक उसके विपरीत काम कर रहे हैं। बिहार चुनाव में जब उनकी पार्टी 43 सीटों पर सिमट गई तो अव्वल तो उन्हें मुख्यमंत्री पद को स्वीकार ही नहीं करना चाहिए था। यदि वे सीएम पद की शपथ नहीं लेते तो उनके प्रति लोगों के मन में श्रद्धा का भाव उपजता। उनका कद बढ़ता। उनकी छवि में जबर्दस्त निखार आता। 2015 में भी जब वे मुख्यमंत्री बने थे तो उनकी सीटें राजद से कम थीं लेकिन इतना अंतर नहीं था। दूसरी बात यह कि लालू प्रसाद ने उन्हें तेजस्वी के अभिभावक का दर्जा देते हुए कुर्सी पर बिठाया था। यह अलग बात है कि वे कुछ ही समय बाद पलटी मार कर भाजपा से हाथ मिला बैठे थे। उस समय उन्हें राजद के साथ काम करने में परेशानी हो रही थी। वे भ्रष्टाचार मुक्त शासन चाहते थे। हालांकि बिहार उनके शासनकाल में कितना भ्रष्टाचारमुक्त रह पाया यह जांच का विषय है। यदि जनादेश के साथ छेड़छाड़ नहीं होता और महागठबंधन की सरकार बन जाती तो उनके कार्यकाल के सारे रहस्य सामने आ जाते। भाजपा के समक्ष समर्पण कर शपथ लेने के साथ यह बात साबित हो गई कि वे सत्ता के बगैर न रहे हैं न रह सकते हैं। समाजवादी चोले को तो उन्होंने उतार फेंका ही है अब उन्हें पूरी तरह संघी मानसिकता के साथ भाजपा के दबाव में काम करना होगा। यह राजद से कहीं ज्यादा बड़ा दबाव होगा। हालांकि अब शायद उन्हें परेशानी न हो क्योंकि उनके व्यक्तित्व में कई तरह के बदलाव आ चुके हैं। बदला का ही संकेत उन्होंने डॉ मेवालाल को मंत्री बनाकर दिया है। बिहार के लोगों को समझ लेना चाहिए कि अब वे पहले वाले नीतीश कुमार नहीं हैं।

वे बिहार के पैदल आ रहे मजदूरों को राज्य की सीमा में प्रवेश करने से रोक देने का फरमान जारी करने वाले नीतीश कुमार हैं। अमित शाह के निर्देश पर प्रशांत किशोर को संगठन के दूसरे सबसे ताकतवर नेता का दर्जा देने वाले नीतीश कुमार हैं। भाजपा की नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाने पर प्रशांत किशोर को पार्टी के बाहर निकाल देने वाले नीतीश कुमार हैं। मतगणना में धांधली कर जीत हासिल करने वाले नीतीश कुमार हैं। वे सचमुच बदल चुके हैं।

बहरहाल नीतीश कुमार ने सत्तासुख का बंदोबस्त तो कर लिया लेकिन उन्हें संभवतः यह अहसास नहीं है कि अब बिहार में रोजगार बड़ा मुद्दा बन चुका है। उनके सर पर भाजपा का 19 लाख रोजगार देने के वादे को पूरा करने की जिम्मेदारी है। उनका कहना था कि वे रोजगार नहीं दे सकते। लेकिन भाजपा ने वादा किया है तो उन्हें देना पड़ेगा। अन्यथा सड़क पर बड़े जनांदोलन का सामना करना पड़ेगा। विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी राजद है लेकिन उसके साथ भाकपा माले, भाजपा और माकपा भी हैं जो जनांदोलन के विशेषज्ञ हैं। संसदीय राजनीति में उनका जैसा भी प्रदर्शन रहा हो लेकिन वे कार्यकर्ता आधारित दल हैं और उनकी रैलियों में लाखों की संख्या में लोग जुटते हैं। राजद के पास भी बड़ा और लड़ाकू जनाधार है। तेजस्वी ने ऐलान कर दिया कि यदि जनवरी तक रोजगार की दिशा में कोई ठोस शुरुआत नहीं हुई तो बिहार के युवा सड़कों पर उतरने को विवश हो जाएंगे। यदि इस मुद्दे को लेकर आंदोलन हुआ तो यह जंगल की आग की तरह पूरे देश में फैल जाएगा। मोदी सरकार लाठी और गोली के बल पर युवा वर्ग की आवाज़ को दबा नहीं सकेगी। उसने 2014 में प्रतिवर्ष दो करोड़ नौकरी देने का वादा किया था। इसे पूरा करने की जगह उसने नौकरी छीनने का काम किया और बेरोजगारी की दर को 45 वर्षों के उच्चतम स्तर तक पहुंचा दिया। भाजपा सिर्फ नफरत की राजनीति कर सकती है। अर्थव्यवस्था को सुधारने और रोजगार का सृजन करने की समझ उसके पास नहीं है। पिछले छह वर्षों का अनुभव यही बताता है कि वह लोगों को मूर्ख बना सकती है लेकिन कोई सकारात्मक कार्य नहीं कर सकती।

अब नीतीश कुमार की सत्तालोलुपता ने उन्हें विभाजनकारी राजनीति के विध्वंसक रथ पर सवार कर दिया है। उनका कहना है कि 2020 का चुनाव उनका अंतिम चुनाव है। हालांकि चुनाव लड़ना तो वे पहले ही छोड़ चुके थे और विधान परिषद के रास्ते सत्ता हासिल करते रहे हैं। अगर उनके अंदर जरा भी स्वाभिमान बचा होगा तो वे ज्यादा समय तक भाजपा की कठपुतली बने रहना पसंद नहीं करेंगे। लेकिन सत्तासुख ही उनके जीवन का मकसद बन चुका हो तो बात अलग है।

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