संबंधों की नई परिभाषा गढ़ता कोरोना

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नई दिल्ली। कोरोना वायरस सामाजिक रिश्तों में संदेह और अविश्वास का बीजारोपण कर रहा है। मानवीय संबंधों की एक नई परिभाषा गढ़ रहा है। अब लंबे अरसे से सुख-दुख में भागीदार रहे पड़ोसी भी अब एक-दूसरे को संदेह की निगाहों से देख रहे हैं। हद तो यह है कि अब कोरोना संक्रमित पिता की मौत पर उसके बेटे मुखाग्नि देने से भी बच रहे हैं। समाजशास्त्रियों का कहना है कि कोरोना पर तो देर-सबेर अंकुश लग जाएगा लेकिन इस वजह से सामाजिक रिश्तों में जो बदलाव आ रहे हैं वे शायद ही पहले की स्थिति में लौटेंगे।

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले में जब 65 साल के एक व्यक्ति की कोरोना संक्रमण से मौत हो गई तो घरवालों ने उसका शव लेने या अस्पताल जाने तक से इंकार कर दिया। यही नहीं, उसके पुत्रों ने उसे मुखाग्नि देने से भी मना कर दिया। बाद में विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रोटोकॉल के अनुसार सरकारी कर्मचारियों ने उसका अंतिम संस्कार किया। प्रोटोकॉल के मुताबिक कोरोना के मरीजों के शव उनके घरवालों को सौंपने पर पाबंदी है। लेकिन परिजनों के शवयात्रा में शामिल होने या मुखाग्नि देने पर कोई पाबंदी नहीं हैं। सरकार बार-बार कहती रही है कि सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन करते हुए ऐसा किया जा सकता है। लेकिन डर के मारे घर वाले शव के आस-पास भी नहीं फटक रहे हैं। ऐसी कई घटनाएं सामने

ऐसे लगभग तमाम मामलों में घरवाले मृतक की अस्थियां तक नहीं ले रहे हैं। यह स्थिति पूरे देश की है। कल तक जो व्यक्ति मोहल्ले या इलाके में सबके दुख-सुख में भागीदार था उसके मरते ही लोगों की निगाहें बदल रही हैं। कई इलाकों में लोग ऐसे शवों के अंतिम संस्कार पर भी आपत्ति उठा चुके हैं। इस मुद्दे पर कई जगह पुलिसवालों के साथ हिंसक झड़पें तक हो चुकी हैं। इन झड़पों को ध्यान में रखते हुए बंगाल सरकार ने तो दो शवदाहगृहों और एक कब्रिस्तान को ऐसे मृतकों के लिए आरक्षित ही कर दिया है। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कोरोना जैसे लक्षण वाले दूसरे मरीजों को भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। दिल, गुर्दे और किडनी की गंभीर बीमारियो से जूझ रहे मरीजों के लिए तो स्थिति और गंभीर हो गई है। कई अस्पताल इलाज से पहले कोरोनामुक्त होने का प्रमाणपत्र मांग रहे हैं। इसकी वजह यह है कि कोलकाता के एक निजी अस्पताल में डायलिसिस कराने वाले तीन लोग बाद में कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। कोलकाता में दर्जनों स्वास्थ्यकर्मी इसकी चपेट में आ चुके हैं और इस वजह से कई अस्पतालों को सील किया जा चुका है। किसी के घर को सामने एंबुलेंस रुकते ही सैकड़ों लोग सवालियां निगाहों से झांकने लगते हैं। पूरा मोहल्ला उसका सामाजिक बहिष्कार कर देता है।

दमदम इलाके के एक बुजुर्ग में कोरोना का लक्षण मिलने के बाद उसके संयुक्त परिवार के 20 लोगों की जांच की गई थी। लेकिन उनका नतीजा नेगेटिव निकला। बावजूद इसके घर लौटने पर उनको बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। उस घर के लोगों से मोहल्ले में कोई बात तक नहीं करता। लोग सब्जी और दूध विक्रेताओं को भी उनके घर नहीं आने दे रहे हैं। मदद तो दूर की बात है, लोग तरह-तरह की अफवाहें फैला रहे हैं। उनकी सुरक्षा के लिए तैनात पुलिसवाला भी मोहल्ले के लोगों की परेशानी के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहरा रहा है मानों उन्होंने जान-बूझ कर कोरोना को न्योता दिया हो। इसी तरह टालीगंज के सुकुमार बनर्जी जब किडनी की डाइलिसिस के लिए एंबुलेंस से निजी अस्पताल में गए तो पड़ोसियों ने उनके परिवार से रिश्ता ही काट लिया। बनर्जी के पुत्र ने लोगों को समझाया कि पिता को कोरोना नहीं है लेकिन किसी को उसकी बातों पर भरोसा नहीं हुआ।

देश के कोने-कोने से रोजाना अखबारों और टीवी चैनलों के जरिए ऐसी कितनी ही कहानियां सामने आ रही हैं। समाजविज्ञानियों का कहना है कि कोरोना पर किसी स्पष्ट जानकारी के अभाव और सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों ने स्थिति को दूभर बना दिया है। कोरोना के खत्म होने के बाद भी यह सामाजिक दूरी समाप्त होने में कई पीढ़ियां लग जाएंगी।

 

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