बेहद तर्कसंगत और संतुलित फैसला

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

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अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बेहद तर्कसंगत और संतुलित फैसला दिया है। सभी बिंदुओं को ध्यान में रखकर यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया है। सभी संबंधित पक्ष पहले से मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार थे कि जो भी फैसला आएगा वह उन्हें मान्य होगा। न कोई जश्न मनाएगा न शोक जाहिर करेगा। रामजन्मभूमि न्यास बोर्ड को विवादित भूमि पर मंदिर बनाने का अधिकार और सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ ज़मीन देने का आदेश न्यायसंगत है। कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी इसपर लगभग सभी पक्षों के बीच सहमति बन चुकी थी। कोई भी भारतीय चाहे जिस समुदाय से हो, इस फैसले से असहमत नहीं हो सकता।

पाकिस्तानी एजेंसियां कुछ शरारत करने का अवश्य प्रयास कर सकती हैं। उनपर कड़ी नज़र रखने की जरूरत है। चूंकि इस मुद्दे पर पूर्व के अनुभव मृदु नहीं रहे हैं इसलिए सरकार प्रशासनिक स्तर पर मामले को हल्के में नहीं ले सकती थी। इसलिए पूरे देश में सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त किया जाना लाजिमी था। सुरक्षा और चौकसी के पर्याप्त इंतजाम किए भी गए। अयोध्या को तो पूरी तरह सैनिक छावनी में तब्दील कर दिया गया। वहां पैरामिलिटरी की 60 कंपनियां, आरपीएफ और पीएसी और 1200 पुलिस कॉन्स्टेबल, 250 सब इंस्पेक्टर, 20 डेप्युटी एसपी और 2 एसपी तैनात किए गए हैं। दो चरणों में बैरिकेडिंग, जन सूचना व्यवस्था, 35 सीसीटीवी और 10 ड्रोन्स की मदद से सिक्यॉरिटी सर्वेलांस किया जा रहा है। हालांकि जन जीवन सामान्य है। बाजार खुले हैं। मंदिरों में श्रद्धालुओं का आना-जाना जारी है। सरकारी एहतियात के अलावा कहीं कुछ भी असामान्य नहीं है।

आमतौर पर इस तरह के मौकों पर सशस्त्र बल की तुलना में खुफिया एजेंसियां ज्यादा कारगर भूमिका निभाती हैं। वे अफवाह फैलाने की किसी भी कोशिश को मौके पर ही नाकाम कर देती हैं। सरकार यदि सुरक्षा व्यवस्था को गोपनीय रखती तो ज्यादा बेहतर होता। तैयारियों को सार्वजनिक करने से एक मनोवैज्ञानिक दबाव तो बनता है लेकिन अनावश्यक सा भय का माहौल भी बन जाता है। फैसला आने से पहले जब सभी पक्ष इस बात पर सहमति जता चुके हैं कि फैसला जो आए उन्हें स्वीकार होगा तो जगह-जगह हथियारबंद सुरक्षा बलों को तैनात करने की कोई जरूरत नहीं थी। उन्हें अलर्ट मोड पर रखा जाता और खुफिया एजेंसियों की सूचना के आधार पर उनका इस्तेमाल करने की नीति अपनाई जाती तो ज्यादा सही रहता। सभी पक्षों ने अपना पुराना अड़ियल रुख त्यागकर लचीला रुख अख्तियार कर लिया था और लोगों को शांति और सौहार्द्र से काम लेने की अपील कर रहे थे। 90 के दशक के बाद पहली बार मंदिर निर्माण के लिए पत्थरों को तराशने का काम रोक दिया गया था। लिहाजा डर मस्जिद और मंदिर समर्थकों से बिल्कुल नहीं था। डर था भी तो भाजपा प्रवक्ताओं और मोदी भक्तों से था। वे अनियंत्रित लोग हैं। भक्तगण तो गाली-गलौच के अलावा कोई भाषा जानते ही नहीं।

इसीलिए पीएम मोदी ने अपने प्रवक्ताओं, मंत्रियों और समर्थकों को संयम से काम लेने का निर्देश दिया था। आरएसएस ने भी फैसले पर किसी तरह का जश्न या शोक मनाने से परहेज़ करने की अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसले पर पुनर्विचार याचिका का विकल्प खुला रखा है। इसकी गुंजाइश देकर एक नई परंपरा की शुरुआत की। दरअसल हर कोई चाह रहा था कि इस चिर लंबित विवाद का शांति से निपटारा हो जाए। हो भी गया। कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा के दावे को खारिज कर दिया और रामभूमि न्यास बोर्ड के दावे पर मुहर लगा दी। ज़मीन पर मालिकाना अधिकार केंद्र सरकार का होगा और एक ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण का काम शुरू किया जाएगा। इस बीच सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ भूमि आवंटित हो जाएगी। मंदिर और मस्जिद का निर्माण लगभग एक साथ शुरू हो जाएगा। फिर भी अभी पाकिस्तान से सतर्क रहने की जरूरत है। देश के अंदर भाईचारा कायम है।

-देवेंद्र गौतम

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